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लोकजीवन के चटक रंग

भोपाल में पिछले दिनों लोकरंग महोत्सव का आयोजन किया गया। इसमें कई तरह के रंगारंग कार्यक्रम संपन्न हुए। इसकी एक झलक प्रस्तुत कर रही हैं शशिप्रभा तिवारी। इस वर्ष यह समारोह सोलह शृंगार की अवधारणा पर आधारित था। सोलह शृंगार पर आधारित प्रदर्शनी ‘नायिका’ में शृंगार के विविध अवयवों को प्रदर्शित किया गया था।

The brightly colored OF folk singer, JANSATTA ARTICLE, JANSATTA STORY, JANSATTA RAVIVARI, JANSATTA OPINIONलोकगीत प्रस्तुत करते कलाकार

लोकजीवन की अपनी खुशी, उमंग और उत्साह है। वहां गांव की मिट्टी की सोंधी खुशबू है। इसमें चटख रंग, गीतों की मिठास, नृत्य की लयात्मक गतियां हैं। वैश्वीकरण और आधुनिकता की दौड़ में लोकजीवन और लोकाचार बहुत कुछ आज के समाज से कहीं पीछे छूटता जा रहा है। इसे किसी न किसी रूप में हर कोई महसूस कर रहा है। शायद, इसी के मद्देनजर लोक की खुशबू को बरकरार रखने की कोशिश लोकरंग उत्सव है।
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल हर साल जनवरी के अंतिम सप्ताह में गुलजार हो उठता है। भोपाल में गणतंत्र दिवस के अवसर पर लोक सांस्कृतिक महोत्सव लोकरंग का आयोजन होता है। संस्कृति विभाग और आदिवासी लोककला एवं बोली विकास अकादमी के इस महती आयोजन को लगभग तीस साल हो गए हैं।
लोकरंग की शुरुआत 1985 में हुई थी। इसमें प्रदेश के शिल्पकार, प्रदर्शनकारी कलाकारों को भोपाल में निमंत्रित करके एक मेले का स्वरूप दिया गया था। यह विविधताओं और नवाचारों के साथ लोकरंग समारोह अब विश्व का सांस्कृतिक पर्व बन गया है। कुछ सालों से इस समारोह में विश्व स्तर के कलाकारों की शिरकत हो रही है। इस वर्ष यह समारोह सोलह शृंगार की अवधारणा पर आधारित था। सोलह शृंगार पर आधारित प्रदर्शनी ‘नायिका’ में शृंगार के विविध अवयवों को प्रदर्शित किया गया था। इस संदर्भ में आदिवासी लोक कला एवं बोली विकास अकादमी की निदेशक ने बताया कि हमें अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और उसके लोक व्यवहार का त्याग करने के पहले उनके वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करना चाहिए। सदियों से अपने प्रतिकूल समयों को अतिक्रमित करती और अपनी रक्षा स्वयं करती परंपराएं हम तक आई हैं, तो निश्चित ही हम उनकी शक्ति संपन्नता को अनुभूत कर सकते हैं। कम से कम आज परंपराओं पर हमला बाहर से नहीं है। ऐसे में, हमें अपनी पंरपराओं की सामर्थ्य, उसकी सहिष्णुता और मर्यादा के प्रति पुनर्विचार की जरूरत हैै- लोकरंग परंपरा के व्यवहार का स्मरण मात्र कराने का प्रयास करता है।
भोपाल के रवींद्र भवन परिसर में आयोजित लोकरंग में इस बार बच्चों के लिए दस श्रेष्ठ फिल्मों का प्रदर्शन आयोजन किया गया। पच्चीस जनवरी को नाट्य मंचन का आयोजन भी किया गया। बुंदेलखंड के वीर योद्धा छत्रसाल की गाथा पर आधारित नाटक का निर्देशन लोकेंद्र त्रिवेदी ने किया था। त्रिवेदी ने अपने नाटक की परिकल्पना के बारे में बताया कि महाबली छत्रसाल के बारे में शोध करते हुए पन्ना, छतरपुर और सागर में असंख्य जानकारी मिली। छत्रसाल कुशल प्रशासक, कवि, सामाजिक चिंतक और बुंदेलखंड की आजादी का सपना देखने वाले महानायक थे। अभिनेता रघुवीर यादव सहर्ष इसके सूत्रधार और लोक गायकी के लिए तैयार हो गए।

समारोह में भारतीय शास्त्रीय नृत्यों पर आधारित नृत्य रचना पेश की गई। इसका निर्देशन भरतनाट्यम नृत्यांगना गीता चंद्रन ने किया था। भरतनाट्यम नृत्यांगना लता सिंह की नृत्य रचना ‘मुग्धा’ पेश की गई। इसमें भरतनाट्यम, कथक और मध्यप्रदेश के लोक नृत्य-नौरता, गणगौर और मटकी को शामिल किया गया था। ग्वालियर के अनंत पुरंदरे ने नृत्य-संगीत के प्रयोगों के साथ बसंत के वैभव की झलक ‘मंजरी’ में पेश की।
लोक प्रदर्शनकारी कलाओं में मणिपुर के थांगटा मार्शल आर्ट, गरबा, मणिपुरी, पुंगचोलम को कलाकारों ने प्रस्तुत किया। असम, मिजोरम, त्रिपुरा, मिजोरम, पंजाब, ओडिशा, मध्यप्रदेश के परंपरागत नृत्यों को कलाकारों ने मोहक अंदाज में प्रस्तुत किया। देशांतर शृंखला के तहत इंटरनेशनल सिंफनी बैंड की महिला कलाकारों के दल ने संगीत पेश किया। समारोह का समापन सूफी गायिका ऋचा शर्मा के संगीत स्वरांजलि से हुआ। उन्होंने बापू के लोकप्रिय भजन के साथ-साथ सूफी रचनाओं को सुरों में पिरोया।
बदलते परिवेश में लोक का आलोक सांस्कृतिक आयोजनों में भी धूमिल होता जा रहा है। ऐसे में इन आयोजनों में शुद्ध लोक जीवन का अंश मात्र ही नजर आ रहा है। मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग की सराहना की जानी चाहिए कि वह लगातार अपने आयोजनों के जरिए लोक कला और लोक कलाकारों को मंच प्रदान करता रहा है ताकि, ये कलाएं जीवित रहें और फलें-फूलें। ०

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