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हमारी याद आएगी: रेहाना ने ‘चेतना’ में काम करने से मना कर दिया था

हिमाचल के एक गांव से अपने चाचा की संदूक से 14 सौ रुपए चुरा कर भागे बीआर इशारा (रोशन लाल शर्मा) के हाथ में कोई हुनर नहीं था, लिहाजा मुंबई में उन्होंने लोगों के घरों में काम किया। बर्तन मांजना, आटा पिसवाना, पानी भर लाना, सब्जी लाना... इस दौरान इशारा ने मध्यमवर्गीय परिवारों में पलने वाले पाखंड और दोमुंहेपन को खूब नजदीक से देखा। गायक मुकेश की फिल्म ‘अनुरोध’ में वे प्रशिक्षु थे। फिर लेखन का मौका मिला। सहायक बन कर निर्देशन भी सीखा। बासु भट्टाचार्य की ‘तीसरी कसम’ में वह सहायक निर्देशक बने। उन्होंने चेतना, चरित्र, जरूरत, एक नजर जैसी लगभग तीन दर्जन फिल्में बनाईं। आज बीआर इशारा की जयंती है।

बीआर इशारा। (7 सितंबर 1934-25 जुलाई 2012

किस्सा 1970 का है। बीआर इशारा एक निर्माता को ‘चेतना’ की कहानी सुना रहे थे। 20 साल की एक कॉलेज छात्रा उच्च वर्ग की चकाचौंध से प्रभावित होकर हाई सोसाइटी कॉलगर्ल बन जाती है। अपने से प्रेम करने वाले एक युवक से वह शादी करती है मगर अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ता। हालात ऐसे बन जाते हैं कि उसे जहर खाना पड़ता है। कहानी सुनकर निर्माता ने इशारा की ओर ऐसे देखा मानो रात में सूरज देख लिया हो। कहा, नहीं भाई इतनी बोल्ड फिल्म नहीं बनानी। इशारा ने एक और निर्माता को जब यह कहानी सुनाई तो उसने इशारा को दफ्तर से ही निकाल दिया। यहां तक कि इशारा ने जब पुणे फिल्म संस्थान से निकली और राजेंद्र सिंह बेदी की फिल्म ‘दस्तक’ की शूटिंग कर रही रेहाना सुल्तान को ‘चेतना’ सुनाई तो उन्होंने इसमें काम करने से इनकार कर दिया क्योंकि फिल्म में अंगप्रदर्शन के साथ ही बोल्ड डायलाग्स भी बोलने थे। बाद में जब उन्होंने कहानी समझी, तो फिल्म करने के लिए तैयार हो गईं। मगर कोई निर्माता इस जलते आलू को उठाने के लिए तैयार नहीं था।

तब राजस्थान के टोंक जिले से आए फिल्म संपादक आइएम कुन्नू इसमें पैसा लगाने के लिए आगे आए। इस शर्त पर कि फिल्म महीने भर और लाख रुपए में बन जानी चाहिए। बाबूदा मान गए। मगर उनके सामने परेशानी थी ‘दस्तक’। रेहाना सुलतान (जिससे बाबूदा ने बाद में शादी की) राजेंद्र सिंह बेदी की ‘दस्तक’ हर कीमत पर करना चाहती थीं। मगर दोनों फिल्मों की तारीखें टकरा रही थीं। तब संजीव कुमार के सेक्रेटरी ने कहा कि वह ‘चेतना’ कर लें। तारीखों का मामला वह संभाल लेंगे। वह बेदी को संजीव कुमार की तारीखें ही नहीं देंगे। इस तरह इशारा ने युद्धस्तर पर ‘चेतना’ की शूटिंग शुरू कर दी। उन्होंने सुबह साढ़े पांच बजे से रात के 11 बजे तक शूटिंग कर 28 दिनों में फिल्म पूरी कर दी। सेंसर ने भी फिल्म पास कर दी।

मगर जब मुंबई में फिल्म के पोस्टर लगे, तो हंगामा हो गया। पोस्टर में एक लड़की उघड़ी टांगों के साथ खड़ी थी और दूर उसकी टांगों के बीच एक मर्द हैरान-परेशान नजर आता है। सेंसर बोर्ड की मजबूरी थी उसने फिल्म में यह सीन रहने दिया था, क्योंकि कहानी में यह टर्निंग पाइंट था। नायिका के प्रेमी को पहली बार पता चलता है कि उसकी प्रेमिका हाई सोसाइटी कॉलगर्ल है। इशारा ने इसी दृश्य को पोस्टर बना दिया था, जिसने फिल्मजगत में भी हंगामा मचा दिया था। पोस्टर देखने वालों को झटका लगता था क्योंकि इस तरह के बिंदास पोस्टर आमतौर पर नजर नहीं आते थे। जब फिल्म रिलीज हुई तो और हंगामा हुआ।

फिल्म में ऐसे बोल्ड डायलॉग थे, जो इससे पहले किसी फिल्म में नहीं सुने गए थे। फिल्म मध्यमवर्गीय नैतिकता के परखच्चे उड़ाते हुए कहती थी कि नैतिकता का फितूर उच्च और निम्न वर्ग में नहीं सिर्फ मध्यवर्ग में ही होता। उच्च वर्ग इसे मानता नहीं और निम्न वर्ग इसकी परवाह नहीं करता। नैतिकता संभालने का दायित्व मध्यवर्ग ने अपने ऊपर लाद लिया। दर्शक ही नहीं फिल्मजगत तक ‘चेतना’ से बौखला गया था। फिल्मजगत के नामीगिरामी निर्माता जिनकी संख्या चालीस से ऊपर थी, ‘चेतना’ पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने लगे थे। मगर फिल्म को जनता ने पसंद किया था।

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