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द लास्ट कोच: नीली जैकेट

...ऐसी सुख की नींद दे सकोगे नीलाभ? उसने पूछा था। एक पल के लिए खो गया था नीलाभ, इस लड़की को क्या जवाब दे? साथ सोएं और कुछ न हो, यह कैसे संभव है? अपराजिता ने ही एक दिन कहा था, कुछ मैं आप में रहूं और कुछ मुझ में रह जाएं आप। तो जब इतने साथ हैं तो यह अहसास ही काफी है। यकीनन वह खुद को नीलाभ में डुबो चुकी थी। यह प्रेम की अतल गहराई थी, जहां नीलाभ उतरता तो वहां से निकलने में वह खुद को असहाय पाता। ...इस बार द लास्ट कोच शृंखला में अविरल कहानी लेकर आए हैं संजय स्वतंत्र

The Last Coach, The Last Coach Series, The Last Coach Series by Sanjay Swatantra, The Last Coach Series has Story, aberrant story, blue jacketप्रतीकात्मक तस्वीर (Illustration: Subrata Dhar)

अपराजिता लंबी छुट्टी पर चली गई थी। टीवी चैनल की नौकरी करते करते वह उकता गई थी। रिपोर्टिंग के लिए दिल्ली से बाहर की भागदौड़ के दौरान वह अकसर कहती, यह नौकरी करते हुए तो मेरे सपने कभी पूरे नहीं होंगे। समझ रहे हैं न आप? कब तक दौड़ती रहूंगी। दिन में चैन न रात में सुख की नींद। ठीक से पढ़ भी कहां पाती हूं। … हालांकि फिर भी वह पढ़ रही थी। उसने यूपीएससी की तैयारी के लिए सुबह और रात को मिला कर कम से कम पांच घंटे पढ़ने का नियम बना लिया था। एक नियम और था। वह था सोने से पहले अंग्रेजी में रोज एक कविता लिखना। फिर एक बेहतरीन तस्वीर के साथ नीलाभ को भेज देना। यह इतना तय ही था जैसे रोज चांद का निकलना। मगर उसकी कल्पना में अकेली स्त्री की कामना कहीं अधिक दिखती।

एक दिन उसने कहा, न जाने कौन सी जिद है मुझे हराने की, ये जिंदगी है कि रोज पैंतरे बदलती है। मगर मैं हार नहीं मानूंगी। तब नीलाभ ने कहा था कि इसीलिए तो अपराजिता हो तुम। देख लेना तुम्हारी हर कोशिश के आगे हार मान जाएगी सभी चुनौतियां। क्योंकि जो संघर्ष कर रही है वह अपराजेय है। इस पर उसने बड़ी मासूमियत से कहा, आप मुझे लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी तक छोड़ने जाएंगे न? … जरूर चलूंगा, लेकिन पहले मेंस तो निकाल लो, नीलाभ ने उसका कंधा थपथपा कर हौसला बढ़ाया। उसने मुस्कुरा कर नीलाभ को अपनी आंखों में भर लिया।

अपराजिता की तैयारियां चल रही थीं। खामोशियां उसकी कामयाबी का शोर मचाने के लिए तैयार थीं। खुशी हो या गम। मुश्किलों का दौर हो या बहुत बुरा समय, नीलाभ हमेशा उसके साथ खड़ा रहा। हालांकि कई बार यह चर्चा का विषय रहा, लेकिन अपराजिता ने कभी उसका साथ नहीं छोड़ा। वह स्त्री-पुरुष संबंध की नई परिभाषा गढ़ चुकी थी। कोई रिश्ता नहीं था उनके बीच, मगर वह एक चुटकी सिंदूर के रिश्ते से भी बढ़ कर था। इंतिहा ये कि वह साथ रहने के लिए भी तैयार थी। इसलिए नहीं कि वह अनन्य कामिनी थी या उसे अपनी दमित इच्छा पूरी करनी थी। बल्कि इसलिए कि वह सुख का एक कतरा उस पुरुष से बटोरना चाहती थी जिसकी नजर में नारी भोग्या नहीं सहचर है।

उस रात अपना काम खत्म कर गाड़ी में बैठा तो हमेशा की तरह अपराजिता की कोई कविता दिखी। बिस्तर पर लेटे पुरुष के सीने पर हाथ रखे एक स्त्री के मनोभाव व्यक्त किया था उसने-मैं सोना चाहती हूं तुम्हारे साथ, इसका मतलब सेक्स नहीं, सुख की एक नींद भर है। जहां कोई संवाद न हो, खिड़कियों पर हौले-हौले धुंध उतर रही हो। एक बिस्तर पर एक कंबल में तुम्हारे साथ बुनती रहूं स्वप्न। एक अपने लिए/एक तुम्हारे लिए।

… ऐसी सुख की नींद दे सकोगे नीलाभ? उसने पूछा था। एक पल के लिए खो गया था वह। इस लड़की को क्या जवाब दे? साथ सोएं और कुछ न हो, यह कैसे संभव है? अपराजिता ने ही एक दिन कहा था, कुछ मैं आप में रहूं और कुछ मुझ में रह जाएं आप। तो जब इतने साथ हैं तो यह अहसास ही काफी है। यकीनन वह खुद को नीलाभ में डुबो चुकी थी। यह प्रेम की अतल गहराई थी, जहां नीलाभ उतरता तो वहां से निकलने में वह खुद को असहाय पाता।

अपराजिता जितनी दबाव में होती, उतनी ही उसकी भावना गहरी होती जाती। रात की शोखियों में वह अपनी दैहिक चाहतों को घोल देती। फिर यह व्यक्त होता उसकी अंग्रेजी कविताओं में। उनमें काम भावों की सघनता नालाभ को विचलित कर देती। उसे फ्रायड याद आने लगते। वह नारी मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करता।अपराजिता शब्दों का ऐसा चयन करती कि उसका सिर घूम जाता। आॅक्सफोर्ड की डिक्शनरी ढूंढ़नी पड़ती। फिर पूरी रात नींद नहीं आती। यही तो वह चाहती थी। अगर मैं जाग रही हूं, तो तुम भी जागो। मेरे साथ सपने बुनो। देर रात फोन कर पूछ लेती अब तक जाग रहे हैं? सोए क्यों नहीं आप? फिर देर से उठो तो एक मीठी फटकार- कितना सोते हैं आप। सुबह उठिए। जॉगिंग कीजिए।

एक रात उसने स्त्री-पुरुष के आत्मीय पल की तस्वीर साझा करते हुए लिखा- तुम अधरों पर मुझे ढूंढ़ो और वहां छोड़ दो अपने प्यार का सच कि कभी तुम थे यहां… और जब जाना तो मेरी जीभ पर/ अपने प्यार का शहद छोड़ जाना। …तुम्हें ये कविताएं गंदी तो नहीं लगती नीलाभ? वह अकसर पूछती तो वह जवाब देता, दूसरों की नजरों में ये कविताएं इरोटिक हो सकती हैं, मगर मेरे लिए क्लासिक हैं। तुम लिखती रहो। … इसके बाद एक बार फिर कहीं खो गई थी अपराजिता। कुछ समय से वह अकसर गुम रहने लगी थी। इन दिनों छुट्टियां ज्यादा लेने लगी थी। यूपीएससी की तैयारी का तर्क देकर एचआर को उसने मना लिया था। जरूरत पड़ने पर लीव विदाउट पे पर भी जाने को तैयार थी।

एक हफ्ते तक उसने कोई बात नहीं की। न कोई कॉल और न कोई संदेश। मगर एक दिन उसका एक मैसेज वाट्सऐप पर चमका- सिविल सर्विस मेंस क्लीयर्ड। …अरे कब? इस लड़की ने तो गजब कर दिया। मगर कभी नहीं बताया था कि उसने प्रीलिम्स पास कर लिया है। और मेंस की तैयारी कर रही है। क्या उसे बताने के लायक नहीं समझा या वह सरप्राइज देना चाहती थी?

नीलाभ ने तुरंत उसे कॉल किया? उधर से उसका मीठा सा स्वर- हुजूर को आखिर हम याद आ ही गए। नीलाभ ने तल्खी से कहा, तुम ये पहले नहीं बता सकती थी। मुझे अपना नहीं समझा तुमने। ….क्या कह रहे हैं आप? अपराजिता रुंआसी होते हुए बोली, आपके सिवाय कौन है मेरा। यह बात तो मैंने अभी मां को भी नहीं बताई। कहीं रिश्तेदारों में न फैल जाए। और जो बात फैल जाती है तो फिर कुछ होता नहीं। आप समझ रहे हैं न। इंटरव्यू दे लेने दीजिए। वह क्लीयर कर लूं तो सब को पता चल जाएगा। और सबसे पहले आपको रिजल्ट बताऊंगी। और सबसे पहले आपका मुंह मीठा करूंगी। उसने चहकते हुए कहा।

नीलाभ ने पूछा, अच्छा अब इंटरव्यू के लिए कितनी छुट्टी चाहिए। अपरा ने कहा, बस एक महीना और। एक महीना? नीलाभ चौंका। …हां। क्या करूं। बहुत सिलेबस है। सब एक बार फिर से पढ़ना है। छुट्टी लूंगी, तभी कुछ कर पाऊंगी। इस दौरान सब से कट जाऊंगी, उसने कहा। मुझसे भी बात नहीं करोगी? नीलाभ ने कहा तो अपरा ने कहा, हां कुछ दिनों तक। बहुत जरूरी हो तो आप कॉल कर सकते हैं। आपको किसने रोका है। आप बहती हवाओं की तरह हैं। हर पल अपनी सांस में आपको भरती हूं। आप हरदम मुझमें हैं। …अच्छा ये दार्शनिक बातें छोड़ो। एक कप चाय पिलाओगी? नीलाभ ने यूं ही पूछा। अपरा बोली- कल ही आ जाइए। रविवार है न। उसने जवाब दिया, तो कल का दिन तुम्हारे नाम। ….और जिंदगी? सहसा अपरा ने कहा तो नीलाभ ने जवाब दिया- हां ये बची जिंदगी भी तुम्हारी।

छुट्टी का दिन। नीलाभ ने आफिस की गाड़ी वापस भेज दी है। हमेशा की तरह मेट्रो से जाना बेहतर लग रहा है। लास्ट कोच में बैठ कर यात्रा कितनी सुखद लगती है। कोने की सीट पर बैठे नीलाभ ने आंखें बंद कर ली हैं। अपराजिता की कविताएं याद आ रही हैं। उसका मुस्कुराता चेहरा सामने है। एक से बढ़ कर एक क्लासिक पोएट्री- तुमने मुझे दिया सूर्य/ और मैं धूप को/ सुनहरी रोशनाई बना कर/ रच रही हूं कविता….। नीलाभ को सारी बातें याद आ रही है। उसकी वो हौसलाअफजाई भी। जब वह कहती कि आप इन दिनों लिख क्यों नहीं रहे। आपकी कविताएं कहां खो गर्इं जिनसे सुबह के उगते सूरज की रश्मियां मुझे मिलती थी, जिन पर सवार होकर अंबर को छूने की हिम्मत जुटाती थी।

…अपराजिता के बारे में सोचते हुए कब दो स्टेशन निकल गए पता ही नहीं चला। उद्घोषणा हो रही है-अगला स्टेशन गुरुतेग बहादुर नगर है। दरवाजे बायीं तरफ खुलेंगे। ……सीढ़ियों से होते हुए नीलाभ बाहर निकला तो मार्च की गुनगुनी धूप ने उसे छूकर अहसास कराया कि सर्दी बस विदा लेने वाली है। पैदल चलते हुए वह सागररत्ना के सामने की सड़क पर खड़ा हो गया। तभी अपराजिता ने कॉल किया- इंतजार कीजिए। मैं आ रही हूं। … थोड़ी देर में वह आॅटो से उतर कर सामने से आती दिखाई दी। सफेद कमीज-नीली जींस के साथ नीले रंग के जैकेट में वह खूब फब रही है। आंखों पर नीला गॉगल्स भी है। वह एकदम मॉडल ही लग रही है। उसके ललाट पर चंदन का टीका बताता है कि वह आधुनिका जरूर है मगर परंपराओं का भी बोध है। नीलाभ को देख कर उसने गुलाबी मुस्कान बिखेर दी है। वह तेज कदमों से आ रही है। पास आते ही उसने उसकी दोनों हथेलियों को थाम लिया है। अपरा की देह की गरमाहट नीलाभ के भीतर उतर आई है। वह उसका हाथ थाम कर रेस्तरां की ओर बढ़ चली…।

कोने की टेबल और सामने शीशे से उतरती धूप। अपराजिता वहीं एक बुक खोल कर बैठ गई। यह राउज आइएएएस स्टडी सर्किल की यूपीएससी इंटरव्यू पर आधारित हैंडबुक है। तभी वेटर आ गया। उसने कहा सिर्फ चाय पिएंगे या कुछ खाएंगे भी। नीलाभ ने कहा, कुछ नहीं। तुम क्या लोगी? तो मैं भी कुछ नहीं, उसने जवाब दिया। इस पर नीलाभ ने कहा, कुछ तो लो। इसरार करने पर उसने वेटर से कहा- एक प्लेट सिजलर गुलाब जामुन ले आओ। फिर कुछ देर बाद दो कप ब्लैक टी। वेटर आर्डर लेकर चला गया है।

नीलाभ ने मुस्कुराते हुए पूछा ये सिजलर गुलाब जामुन क्या होता है जी? उसने हंस कर कहा, आपको तो बस काम और काम? और कुछ सूझता ही नहीं। फैशन बदल गया। लोग बदल गए। उनकी फितरत बदल गई। खाने पीने का अंदाज बदल गया। रेस्तरां में कितनी रेसिपी आ गई। मगर इन सब चीजों की खबर ही नहीं रहती। बस खबरों की खबर रहती है आपको। वेटर लेकर आ रहा है। पता चल जाएगा आपको।

भोला बना नीलाभ सिर झुकाए उसकी बातें सुनता रहा। आखिर अपराजिता आइएएस बनने जा रही है। कुछ बोल कर उसका आत्मविशास नहीं तोड़ना है मुझे। जो कहे एक बच्चे की तरह सुन लेना है। खयालों में गुम नीलाभ ने अचानक कहा, यस मैम… यस मैम। अपराजिता यह सुन कर हंस पड़ी है। उसके गुलाबी अधरों के बीच मोतियों जैसी दंतपंक्तियां झिलमिला उठी हैं। अरे आप मेरे बॉस हैं। मुझे मैम न कहिए। और मैं आपकी दोस्त भी हूं। आत्मीय हूं आपकी। आप सब कुछ हैं मेरे, उसने नीलाभ की हथेलियों को थामते हुए कहा।

वेटर लकड़ी की प्लेट में हरे पत्तों पर परोसा गया सिजलर गुलाबजामुन ले आया है। वनिला आइसक्रीम पर दो बड़े गुलाबजामुन। ऐसा लग रहा था जैसे आइसक्रीम को तड़का लगा दिया गया हो गरमागरम गुलाबजामुन से। प्लेट से धुआं उठ रहा है। अपराजिता तस्वीर खींच रही है मोबाइल कैमरे से। नीलाभ के लिए यह अजूबा है। उसे आश्चर्य में देख अपराजिता ने कहा-ऐसे क्या देख रहे हैं? शुरू करिए हुजूर। गरम और ठंडे का एक साथ अहसास होगा आपको। जैसे मेरी कविताएं और वो तस्वीरें। उसने शरारती मुस्कान बिखेरी। नीलाभ ने उसके पैर पर पैर रखते हुए कहा, चुपचाप खाओ और उसकी याद मत दिलाओ। ये सचमुच अनोखा है। गरम और ठंडा दोनों का मजा। मुंह मिठास से भर गया है।

….. वेटर ब्लैक टी ले आया है। तभी अपराजिता के मोबाइल की घंटी बज उठी है। वह कॉल पिक करते हुए बोली- हां आरती। कहां है तू। क्या मुखर्जीनगर में? बुक मिल गई? अच्छा मैं आती हूं। अपराजिता हड़बड़ी में हैं। ऐसी हड़बड़ी में वह कभी नहीं रहती। मगर अब बात उसके सपने की है। उसने जल्दी-जल्दी चाय पी और बुक समेट कर बोली, मैं निकलती हूं। आप आराम से चाय पीजिए। जल्दी ही मिलेंगे। वह नीलाभ के बालों को सहला कर निकल गई। कुछ देर में वह सड़क पर थी। नीलाभ उसे शीशे के पार उसे जाते हुए देखता रहा। तभी उसकी नजर सामने की कुर्सी पर पड़ी। अरे वह अपनी नीली जैकेट भूल गई।
नीलाभ ने तुरंत कॉल किया- तुम अपनी जैकेट तो यहीं छोड़ गई। …जी, बाहर निकल गई तो अहसास हुआ। अब लौटूंगी नहीं।आप संभाल कर रख लीजिए। जब तक मैं नहीं, वह तो आपके पास रहेगी, उसने हंसते हुए कहा। अगली बार आइएगा तो लेते आइएगा। …नीलाभ ने उसकी जैकेट को पीठ की ओर कर गले से बांध लिया है। एक पल के लिए ऐसा लगा कि जैसे अपराजिता ही उसके गले से लिपट गई है। वही मोगरे वाली खुशबू के साथ। ओह, कितनी मोहक सुगंध है। यही तो पहचान है उसकी। आंखें बंद कर लूं, तो भी बता सकता हूं कि यहां से अभी-अभी अपराजिता गई है।
रेस्तरां लगभग खाली है। जैकेट से आती भीनी खुशबू में डूब गया है नीलाभ। उसके चेहरे पर मुस्कान तैर गई है। वह बची हुई ब्लैक टी पीते हुए कविता लिख रहा है-

तुम्हारे ललाट पर
चंदन का जो टीका है न,
यह कोई और नहीं
मैं हूं तुम्हारा मित्र।
सुवासित करता हूं
तुम्हारे हृदय को,
चमकता हूं प्रतिपल
तुम्हारी आंखों में
नारंगी सूरज बन।
हर दिन प्रखर करता हूं
तुम्हारे लक्ष्य और
तुम्हारे संकल्प।
हर सुबह लिखता हूं
तुम्हारे लिए विजयगाथा।

कागज पर लिखी कविता को अपनी जेब में रख कर नीलाभ रेस्तरां से लौट चला है। अपराजिता की नीली जैकेट उसके कंधे पर झूल रही है। मानो वह साथ चल रही हो। और कह रही हो कि पार्टनर तुम मेरे लिए हमेशा विजयगाथा लिखते हो। अब साकार करने की मेरी बारी आई है। तुम हमेशा मेरे साथ रहना। ….. हवा में झूलते जैकेट का एक बाजू बार-बार उसके चेहरे के आगे आ रहा है। नीलाभ हर बार उसे चूम लेता है। अपरा उसके कानों में कहती है- तुम इसे चूम कर मेरे सपने को नीला कर रहे हो और मैं अंबर को चूमने के लिए मचल रही हूं। तुम्हारे इस चुंबन में मेरे लिए दुआएं हैं। सच है ये तुम्हारी मुहब्बत नहीं, इबादत है।

… सूरज डूब रहा है। मगर नीलाभ और अपराजिता के सपने फिर से उग रहे हैं। … सामने ही मेट्रो स्टेशन है। सीढ़ियों से उतरते हुए नीलाभ यात्रियों की भीड़ में गुम हो गया है।

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