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मुद्दा : सड़क परियोजनाओं पर बढ़ता पड़ोसी मुल्कों से तनाव

चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान इलाके से होकर गुजरता है। भारत इस परियोजना पर आपत्ति जताता रहा है। अब जबकि, भारतीय मौसम विभाग ने जम्मू-कश्मीर सब-डिवीजन को अब ‘जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद’ कहना शुरू कर दिया है, चीन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया नाकु ला झड़प के तौर पर सामने आई है। दूसरी ओर, लिपुलेख तक भारतीय सड़क के विरोध में नेपाल खड़ा हो गया है। इसे वह अतिक्रमण का रंग दे रहा है।

पड़ोसी देशों से सीमा विवाद को लेकर तनाव फिर से बढ़ रहे हैं।

नाकु ला में भारतीय-चीनी सैनिकों में टकराव की वजह को सैन्य विशेषज्ञ गिलगित-बाल्टिस्तान की खींचतान और चीनी सड़क परियोजना में अड़गे की आशंका बता रहे हैं। दूसरी ओर, भारत ने मानसरोवर यात्रा मार्ग में लिपुलेख तक जिस सड़क का निर्माण किया है, उस परियोजना में जमीन दखल का आरोप लगाते हुए नेपाल विरोध में उतर आया है।

राजनयिक खींतचान के ये दोनों नए अध्याय खुल गए हैं। भारत-चीन के बीच जिस ‘वुहान भावना’ की बात की जाती है, उसके विपरीत भारत और चीन के सैनिकों के बीच सिक्किम के नाकु ला सेक्टर में हाथापाई और पत्थरबाजी की घटना हुई। सैन्य विशेषज्ञ इस घटना को भारत के गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर उठाए गए कदम से जोड़कर देख रहे हैं। भारत ने हाल में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान का मौसम बुलेटिन जारी करना शुरू किया है और पाकिस्तान को कहा है कि वह इलाका भारतीय है।

गिलगित-बाल्टिस्तान की कवायद को चीन की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा परियोजना के नजरिए से देखने पर नाकु ला की वजह समझ में आ जाती है। इस परियोजना के बाद चीन सीधे अपने माल को जमीन के रास्ते ग्वादर बंदरगाह तक पहुंचा देगा। यहां से चीनी माल सीधे अफ्रीका और दुनिया के अन्य हिस्सों में भेजा जाएगा। इससे चीन को दक्षिण पूर्व एशिया के देशों का चक्कर लगाते हुए माल नहीं भेजना होगा।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कमर आगा की राय में, ‘चीन के साथ सिक्किम में यह झड़प भारत के गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर उठाए गए ताजा कदम का जवाब है। चीन किसी भी कीमत पर अपने आर्थिक कॉरिडोर को पूरा करना चाहता है। कोरोना संकट के दौर में भी बहुत तेजी से चीनी परियोजना पर काम चल रहा है। अपनी परियोजना पर संकट आता देख चीन ने सिक्किम में उकसावे की कार्रवाई की है। चीन सिक्किम को अपना क्षेत्र बताता है और दोनों देशों के बीच लंबे समय से इसको लेकर विवाद है। चीन ने भारत को यह संदेश देने की कोशिश की कि पीओके पर हमारा जवाब सिक्किम है।’

दूसरी ओर, मानसरोवर मार्ग परियोजना को लेकर नेपाल के ताजा विरोध की वजह चीन से उसकी करीबी बताई जा रही है। हाल में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख तक की सड़क का उद्घाटन किया है। नेपाल का दावा है कि इस परियोजना में भारत ने नेपाल की 19 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है।

नेपाल में यह मामला इस कदर गर्म है कि काठमांडू में भारतीय दूतावास के सामने दर्जनों प्रदर्शनकारी जमा हो गए। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वीडियो लिंक के ज़रिए 90 किलोमीटर लंबी इस सड़क का उद्घाटन किया था। यह सड़क उत्तराखंड राज्य के घाटियाबागढ़ को हिमालय क्षेत्र में स्थित लिपुलेख दर्रे से जोड़ती है। हालांकि, नेपाल की आपत्ति पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने कहा, ‘हाल में पिथौरागढ़ जिले में जिस सड़क का उद्घाटन हुआ है, वह पूरी तरह से भारतीय क्षेत्र में पड़ता है। सीमा सड़क संगठन ने धारचुला से लिपुलेख तक सड़क निर्माण कार्य पूरा किया है। ये सड़क कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग के नाम से प्रसिद्ध है। इस सड़क से सीमावर्ती गांव पहली बार सड़क मार्ग से जुड़ेंगे।

कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्रियों को इस 90 किलोमीटर लंबे रास्ते की कठिनाई से राहत मिलेगी और गाड़ियां चीन की सीमा तक जा सकेंगी। धारचुला-लिपुलेख रोड, पिथौरागढ़-तवाघाट-घाटियाबागढ़ रूट का विस्तार है। यह सड़क घाटियाबागढ़ से शुरू होकर लिपुलेख दर्रे पर खत्म होती है जो कैलाश मानसरोवर का प्रवेश द्वार है।

नेपाल का दावा है कि लिपुलेख दर्रा उसका इलाका है। इस दावे के पक्ष में नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला दे रहा है। नेपाल का कहना है कि सुगौली संधि भारत के साथ उसकी पश्चिमी सीमा का निर्धारण करती है। संधि के तहत महाकाली नदी के पूरब का इलाका, जिसमें लिम्पियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख शामिल हैं, नेपाल के क्षेत्र हैं। लिपुलेख दर्रे से लगे और रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कालापानी के इलाके पर भी नेपाल अपना दावा करता है। हालांकि साल 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही कालापानी में भारतीय सैनिक तैनात हैं।

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