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जीएसटी पर सिर्फ भाषण देकर चले जाते थे चिदंबरम: सुशील मोदी

जीएसटी की अवधारणा तो कांग्रेस की ही देन थी लेकिन वह इसे लेकर न तो ज्यादा ऊर्जावान थी और न ही सक्रिय। जीएसटी काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष सुशील मोदी ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार के वित्त मंत्री व कांग्रेस नेता पी चिंदबरम ने जीएसटी को लागू करवाने के लिए कोई मेहनत नहीं की।
Author नई दिल्ली | December 5, 2017 23:15 pm
केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद महागठबंधन के जरिए बिहार में ही विपक्ष की ताकत दिखाई दी थी।

 

केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद महागठबंधन के जरिए बिहार में ही विपक्ष की ताकत दिखाई दी थी। लेकिन लालू प्रसाद यादव और उनके परिजनों से जुड़े भ्रष्टाचार का मामला हो, राष्ट्रपति चुनाव या फिर जीएसटी, इस एका में दरार दिख रही है। बिहार में भाजपा के प्रमुख चेहरा सुशील मोदी का कहना है कि नीतीश कुमार अपनी सरकार बचाने की मजबूरी में लालू यादव का साथ दे रहे हैं। जनसत्ता बारादरी की बैठक में लालू यादव से जुड़े भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सुशील मोदी ने दावा किया कि वे अगले मंगलवार को एक और बड़ा खुलासा करेंगे। कार्यक्रम का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

शुक्रवार आधी रात को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने और पूरे देश के एक कर विधान के तहत आने के बाद सुशील कुमार मोदी ने इतनी बड़ी योजना के लागू होने का श्रेय केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को दिया। भाजपा नेता व जीएसटी काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष सुशील कुमार मोदी जीएसटी लागू होने के आधी रात के जलसे में शामिल होने के लिए दिल्ली आए थे। इस ऐतिहासिक कानून के लागू होने के बाद शनिवार को जनसत्ता बारादरी की बैठक में सवालों से मुठभेड़ करते हुए उन्होंने दावा किया कि कोई भी नई चीज आती है तो उसका विरोध होता है, लेकिन फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो जाता है। सुशील मोदी ने कहा कि कराधान जैसा अहम और पेचीदा मामला जिसमें राज्यों के हित सीधे जुड़े होते हैं उसमें देश के 29 राज्यों को एक मंच पर लाना आसान नहीं था। लेकिन अरुण जेटली के सतत श्रम और ऊर्जा के कारण यह संभव हो पाया। उन्होंने माना कि यहां जीएसटी की अवधारणा तो कांग्रेस की ही देन थी लेकिन वह इसे लेकर न तो ज्यादा ऊर्जावान थी और न ही सक्रिय। जीएसटी काउंसिल के पूर्व अध्यक्ष सुशील मोदी ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार के वित्त मंत्री व कांग्रेस नेता पी चिंदबरम ने जीएसटी को लागू करवाने के लिए कोई मेहनत नहीं की।

वे जीएसटी काउंसिल की बैठक में पहुंचते थे और सिर्फ भाषण देकर चले जाते थे। लेकिन राजग सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इसके लिए बहुत ज्यादा मेहनत की। जीएसटी काउंसिल में वोटिंग का प्रावधान होने के बावजूद एक बार भी इसकी नौबत नहीं आई क्योंकि जेटली राज्यों के प्रतिनिधियों को बातें समझाने में कामयाब रहे। 29 राज्यों को एक मुद्दे पर एक साथ लाना ऐसा काम रहा जिसके लिए जेटली याद किए जाएंगे।  विपक्षी दलों के जीएसटी के विरोध पर मोदी ने कहा कि सभी दल ऐसा अपने राजनीतिक हित के लिए कर रहे हैं। जीएसटी का सबसे बड़ा विरोध करनेवाला तबका कपड़ा व्यापारियों का है, क्योंकि अभी तक कपड़े पर कर नहीं लगता था। कराधान के हिसाब-किताब से बचने के लिए छोटे व्यापारी भी इसका विरोध कर रहे हैं और विपक्षी दलों को लगता है कि इनके विरोध का साथ दे इन्हें अपने पाले में रखा जा सकता है। उन्होंने दावा किया कि छोटे व्यापारी कर व्यवस्था से जितना नहीं डरते, उससे ज्यादा हिसाब-किताब के झमेले में नहीं पड़ना चाहते हैं। कर का भार तो अंतत: उपभोक्ता पर जाता है, लेकिन जिन्हें लेखा-जोखा की आदत नहीं, इसलिए उन्हें यह मुश्किल लग रहा है।

सुशील मोदी ने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी के शासन काल में जब मूल्य संवर्द्धित कर (वैट) लागू बाकी करने का समय आया तो भाजपा के ही लोगों ने भारी विरोध किया था। कई भाजपा नेताओं को अपने क्षेत्रों में चुनाव हारने का खौफ पैदा हो गया था, और इन सबके कारण वाजपेयी सरकार वैट को लागू नहीं करवा पाई थी। इसके बाद 2005 में मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए सरकार ने इसे लागू किया। विरोध उठने पर तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने राज्यों को तीन साल तक क्षतिपूर्ति का वादा किया था। लेकिन एक साल के बाद कोई भी राज्य क्षतिपूर्ति मांगने नहीं पहुंचा। वैट लागू होने का विरोध और तत्कालीन अफरातफरी महज पांच महीने में खत्म हो गई। सब कुछ सामान्य हो गया। जीएसटी, वैट से संवर्द्धित व्यवस्था है। उससे आगे की चीज है। अभी लोग इस पर काम करेंगे, व्यवस्था समझेंगे। शुरू में परेशानी होगी, लेकिन मेरा दावा है कि आठ महीने के अंदर सब कुछ सामान्य हो जाएगा।

मनोज मिश्र : लालू प्रसाद यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के काफी सबूत सामने आ चुके हैं, मगर उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पा रही। क्या नीतीश कुमार का उन्हें संरक्षण प्राप्त है?

सुशील मोदी : मजबूरी है उनकी। सबसे बड़ा घटक दल हैं लालू यादव। उनके अस्सी विधायक हैं। अगर नीतीशजी कोई कार्रवाई करेंगे, तो सरकार अस्थिर हो जाएगी। अभी जो मामले उजागर हुए हैं उनमें से ज्यादातर वे हैं, जिन्हें नीतीश कुमार के इशारे पर 2008 में लल्लन सिंह और शिवानंद तिवारी ने दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस करके उजागर किया था। लल्लन सिंह उस समय जनता दल (एकी) के प्रदेश अध्यक्ष थे। लालूजी रेलमंत्री थे। नीतीशजी 2004 में हटे और उनकी जगह ली लालूजी ने। तो रेल से जुड़ी हर गतिविधि के बारे में नीतीशजी को जानकारी थी। आज जो मामले उजागर हो रहे हैं, उन्हें वे पूरी तरह जानते हैं। उसकी सच्चाई क्या है, वह भी वे जानते हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि अगर कार्रवाई करेंगे तो सरकार अस्थिर हो जाएगी। इसलिए एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि भाजपा सिर्फ हल्ला मचा रही है, अगर दम है तो कार्रवाई करे। और संयोग है कि उसके अगले ही दिन 22 ठिकानों पर छापे पड़ गए। इसलिए वे सब जानते हैं, पर वे नहीं चाहते होंगे कि उनकी कलम से कोई कार्रवाई हो। दूसरे कार्रवाई करेंगे तो उन्हें बोलने का मौका होगा कि हम क्या कर सकते हैं। उन्होंने न तो एक बार भी लालूजी का बचाव किया और न कभी उनके विरोध में कहा।
मनोज मिश्र: क्या नीतीश कुमार लालू यादव से अलग होकर आपके साथ आ सकते हैं?
सुशील मोदी: यह अभी कहना ठीक नहीं है। मुझे लगता है कि अभी वे तौल रहे हैं कि क्या स्थिति बनेगी। लेकिन उन्होंने एक खिड़की खोल रखी है। जैसे वे पहले भाजपा के साथ थे और लगने लगा कि स्थितियां उनके अनुकूल नहीं हैं तो उन्होंने धीरे से एक खिड़की खोल ली। चिदंबरम को छोड़ने चले गए, प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया और कहते रहे कि हम तो स्वतंत्र दल हैं। मगर कहते रहे कि एनडीए एकजुट है। आज भी वे जो भाषा बोल रहे हैं, उनके बयानों को देखेंगे, तो पाएंगे कि उन्होंने एक खिड़की खोल ली है। और आप देखें कि इस समय देश के जो नेता हैं, उन्होंने कभी न कभी भाजपा के साथ मिल कर सरकार बनाई है, चाहे वे मायावती हों, ममता बनर्जी हों, बीजू जनता दल के नवीन पटनायक हों, यहां तक कि लालू यादव ने भी 1990 में पहली सरकार भाजपा के समर्थन से ही बनाई थी। इसलिए भाजपा के साथ जाने में किसी को क्या दिक्कत हो सकती है। दो दिन में अपनी भाषा बदल कर सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता से अलग भ्रष्टाचार की तरफ रुख मोड़ लिया जा सकता है। इसलिए अभी इस मामले में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।

दीपक रस्तोगी : आपने नीतीश कुमार से जो अपील की है कि आ जाइए भाजपा के साथ, तो क्या यह उनकी दुविधा दूर करने के लिए है?
सुशील मोदी : मैंने ऐसी कोई अपील नहीं की है। मैंने कहा है कि राजनीतिक अस्थिरता पैदा नहीं होने देंगे। उसका जो अर्थ निकालना चाहें, निकालें। अब नीतीशजी को तय करना है कि गठबंधन तोड़ना है, नया बनाना है या नहीं बनाना है। तब कोई प्रस्ताव आए तो कुछ कहा जा सकता है। और इसके बारे में भी भाजपा की केंद्रीय कमान फैसला करेगी। लेकिन नीतीशजी का एनडीए के साथ का जो सत्रह सालों का अनुभव है, वह उनके जीवन का स्वर्णिम काल था। चाहे अटलजी की सरकार में वे रेलमंत्री थे या बिहार में भाजपा के साथ थे। उन्होंने अपना सबसे बेहतरीन प्रदर्शन तभी किया जब वे भाजपा के साथ थे। केसी त्यागी ने कहा भी कि एनडीए में हम सहजता महसूस करते थे। वह सहजता यही थी कि भाजपा के साथ उन्हें काम करने का मौका मिला। आज जो उनकी छवि है, वह भाजपा की वजह से बनी है, भाजपा के साथ रहने के कारण बनी है। लालू यादव या कांग्रेस के साथ जाने के बाद तो उनकी छवि का क्षरण हुआ है।

मुकेश भारद्वाज : बिहार अक्सर नकारात्मक कारणों से चर्चा में रहता है, ऐसा क्यों?
सुशील मोदी : ऐसा नहीं है। जब एनडीए की सात साल की सरकार थी, बिहार की एक सकारात्मक छवि बनी थी। अच्छे कानून-व्यवस्था की छवि बनी। तब नीतीशजी खुद कहते थे कि कल तक बिहारी कहलाना शर्म की बात थी, अब बिहारी कहलाना गर्व की बात है। तो यह इस बात पर निर्भर करता है कि नेतृत्व कैसा है और शासन कैसा है। बिहार के लोगों में मेधा है, क्षमता है, बाहर जाकर उन लोगों ने अपनी मेधा का प्रदर्शन किया है। लेकिन शासन की बात करें तो उन सात सालों को छोड़ दें तो उसके पहले के तीस-पैंतीस सालों के शासन में बिहार में स्थिरता न होने के कारण विकास और कानून-व्यवस्था के स्तर पर कोई उल्लेखनीय काम नहीं हो सका। जिस राज्य में लंबे समय तक राजनीतिक अस्थिरता का माहौल रहा हो, वहां उसकी छवि खराब तो होगी ही।

सूर्यनाथ सिंह : बिहार में शिक्षा की स्थिति इतनी खराब क्यों है? आपकी सात साल की सरकार में शिक्षा को लेकर कुछ अच्छा प्रयास किया गया होता तो शायद आज जैसी स्थिति न होती।
सुशील मोदी : सुधार कोई एक दिन का काम नहीं है। 2005 में जो शुरुआत हम लोगों ने की, वह क्रम अगर लगातार चलता रहता तो बेहतर नतीजे देखने को मिलते। मगर 2012 में आकर गाड़ी रुक गई। जब हमारी सरकार आई थी तो लाखों शिक्षक बहाल किए गए थे। लेकिन 2013 के बाद उस दिशा में कोई काम नहीं हो पाया। बिहार में सबसे बड़ी समस्या शिक्षकों की है, उनके वेतन और बुनियादी ढांचे की है। लड़के और लड़कियां स्कूल में आएं, इसके लिए हम लोगों ने साइकिल योजना चलाई थी, जो पूरे देश में लोकप्रिय हुई थी। मिड-डे मील योजना दुरुस्त की गई। लेकिन वह सब आगे नहीं बढ़ पाया, वहीं रुक गया। सुधार की प्रक्रिया के रुक जाने की वजह से वहां शिक्षा व्यवस्था में गति नहीं आ पा रही।

मृणाल वल्लरी : अभी देश में जगह-जगह से गोमांस को लेकर भीड़ के हिंसक हो उठने यानी मॉब लिंचिग की खबरें आ रही हैं, लेकिन बिहार में ऐसे मामले नहीं हुए हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
सुशील मोदी : वहां भी कुछ घटनाएं घटी हैं। बल्कि बिहार में तो मॉब लिंचिंग अधिक दिखाई देता है, इसलिए कि वहां के लोगों में गुस्सा अधिक है। हर राज्य का अपना चरित्र होता है, तो बिहार में आक्रामकता बहुत ज्यादा है। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब कम से कम एक दर्जन जगहों पर सड़क जाम न होता हो। इसलिए मुझे लगता है कि अखबारों में मॉब लिंचिंग को कुछ बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया-बताया जा रहा है। किसी भी तरह की मॉब लिंचिंग हो, उसे सही नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह चोरी की घटना के कारण हुई हो या दूसरी किसी वजह से। सबसे बड़े समस्या है कानून-व्यवस्था की। कुछ लोगों को लगता है कि अगर किसी अपराधी को कानून में दे देंगे तो उसे सजा मिलने में दस-पांच साल लगेंगे, हो सकता है उसे सजा न भी हो। इसलिए लोग उसे पकड़ते हैं और मार-पीट कर खुद सजा देने का प्रयास करते हैं। तुरंत न्याय करना चाहते हैं। लेकिन वह गोमांस की वजह से हो या फिर किसी और वजह से, मॉब लिंचिंग की, कानून अपने हाथ में लेने की मैं पूरी तरह भर्त्सना करता हूं।

मनोज मिश्र : मगर कहीं न कहीं यह संदेश जा रहा है कि राजनीतिक संरक्षण मिलने की वजह से ऐसे लोग अधिक उत्साहित नजर आ रहे हैं।
सुशील मोदी : देखिए, कोई भी सरकार हो, चाहे किसी भी पार्टी की सरकार हो, वह नहीं चाहेगी कि कानून-व्यवस्था खराब हो। किन्हीं स्थितियों में किसी घटना को संभालने में वह चाहे फेल हो जाए, पर कानून-व्यवस्था खराब करना कोई सरकार नहीं चाहेगी। कई बार सही होते हुए भी कानून-व्यवस्था फेल हो जाती है। इसलिए कि तंत्र की एक सीमा है। सरकारी तंत्र दरअसल, आकस्मिक स्थितियों से निपटने में अक्सर विफल हो जाता है। इसलिए कि उसकी ऐसी स्थितियों से निपटने की तैयारी ठीक नहीं होती। लेकिन यह कहना कि कोई सरकार शरारती तत्त्वों को संरक्षण देती है, मैं उचित नहीं मानता।

राजेंद्र राजन : मगर, प्रधानमंत्री और दूसरे नेताओं की अपीलों के बावजूद गोमांस के मसले पर उन्माद कम होने के बजाय बढ़ रहा है, इसकी क्या वजह हो सकती है?
सुशील मोदी : इसमें लोगों की भावनाओं को समझने की भी जरूरत है। यानी गाय के प्रति, गोमांस के प्रति इस देश की भावना क्या है? गाय का सम्मान यहां की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। कुछ आधुनिक लोग भले गोमांस खाते हों, पर बड़ी संख्या इसके विरोध में ही है। गाय के प्रति लोगों की जो भावना है, उसका आदर होना ही चाहिए। मगर इसे लेकर जो हिंसा की घटना हो रही है, वह भी ठीक नहीं कही जा सकती। भीड़ के हाथ में न्याय का अधिकार देने का समर्थन कोई नहीं कर सकता।

मनोज मिश्र : अभी जीएसटी को लेकर काफी विरोध हो रहा है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
सुशील मोदी : पहले यह समझिए कि विरोध कौन कर रहा है। विरोध ज्यादातर कपड़ा व्यापारी कर रहे हैं। इसलिए कि पहले कपड़े पर टैक्स नहीं लगता था। अब पहली बार टैक्स लग रहा है। 1956 तक कपड़े पर टैक्स लगता था, पर फैसला किया गया कि कपड़ा, चीनी और तंबाकू पर राज्य सरकारें टैक्स नहीं लगाएंगी। केंद्र उन पर अतिरिक्त उत्पाद कर लगाएगा। तबसे इन तीनों चीजों पर टैक्स लगना बंद हो गया। अतिरिक्त उत्पाद कर का बंटवारा राज्यों को होता था। फिर जब चिदंबरम वित्तमंत्री थे तो 2011 में फैसला किया गया कि अतिरिक्त उत्पाद शुल्क हटा लिया जाए और राज्य सरकारें इन तीनों वस्तुओं पर कर लगाएं। राज्य सरकारों ने तंबाकू पर तो उसी समय से कर लगाना शुरू कर दिया, पर चीनी और कपड़े पर कर नहीं लगाया। जब चार-पांच राज्यों ने कपड़े पर कर लगाया तो भारी विरोध शुरू हो गया और उन्हें उसे वापस लेना पड़ा। बिहार और दिल्ली सरकार ने पिछले साल से कपड़े पर कर लगाना शुरू कर दिया। इसलिए यहां इस बार हड़ताल नहीं हो रही है। वही हड़ताल कर रहे हैं, जहां कर नहीं लगता।

मुकेश भारद्वाज : क्या इससे कर चोरी रुकेगी?
सुशील मोदी : कर चोरी रोकने का इससे बेहतर तरीका कोई और है ही नहीं। अगर कोई चोरी करने का प्रयास करेगा तो पकड़ा जाएगा और उसे घाटा उठाना पड़ेगा। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यापारी एक लाख रुपए का माल पंजाब से खरीद कर लाता है तो उसे उस पर दस हजार रुपए कर चुकाने पड़ते हैं। वह कर सरकार के खाते में जमा हो गया। फिर वही माल वह डेढ़ लाख रुपए में बेचता है तो उस पर पंद्रह हजार रुपए कर बनते हैं। चूंकि वह पहले दस हजार रुपए कर दे चुका है, अब उसे सिर्फ पांच हजार रुपए देने पड़ेंगे। अगर वह दस हजार कर नहीं चुकाता है तो बाद में पंद्रह हजार रुपए चुकाने पड़ेंगे और आयकर विभाग की नजर में आ जाएगा कि वह माल कहां से ले आया। इस तरह अब उसे माल की खरीद और बिक्री के बारे में जानकारी देना उसकी मजबूरी हो गई है। यह ऐसी प्रणाली है कि कर चोरी करना फायदेमंद नहीं रह गया है, कर चुकाना फायदेमंद होगा।

अनिल बंसल : मगर इसमें जो जेल भेजने का प्रावधान किया गया है, उसे लेकर विरोध अधिक हो रहा है।
सुशील मोदी : कोई भी अपराध ऐसा नहीं है, जिसमें जेल का प्रावधान नहीं होता। यह डराने के लिए जरूरी है। हालांकि, आज तक मैंने यह नहीं देखा कि कोई आदमी कर चोरी की वजह से जेल गया हो। उसमें जुर्माने का प्रावधान रहता है। कोई बड़ी घटना हो, जिसमें बहुत बड़ी गड़बड़ी हुई हो, तभी जाता है। फिर जो सरकारें जेल भेजने का विरोध कर रही हैं, उन्होंने ही यह कानून पास किया है और उन्हीं को जेल भेजने का अधिकार है, तो वे चाहती हैं कि जेल न भेजा जाए तो न भेजें, किसने रोका है।

मुकेश भारद्वाज: बिहार में किसी एक पार्टी की सरकार बनने की स्थितियां कब बनेंगी?
सुशील मोदी : इस देश में कभी भी कुछ भी हो सकता है। लालू यादव भी तो पूर्ण बहुमत के साथ आए थे। अब जनता जो भी जनादेश दे रही है, एकतरफा दे रही है। उत्तर प्रदेश देख लीजिए।

मनोज मिश्र : लालू यादव के खिलाफ आगे आपका क्या कदम होगा?
सुशील मोदी : अभी तो कार्रवाई शुरू हुई है। आयकर विभाग ने चार मामलों में कुर्की के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी है। अभी तो प्रोविजनल अटैचमेंट हुआ है। जब वे सिद्ध नहीं कर पाएंगे कि वह संपत्ति उनकी है, तो उसे जब्त कर लिया जाएगा। ये इतने सिद्ध मामले हैं कि उनके परिजनों का बचना संभव नहीं है। अभी तो कई कंपनियों का मामला खुलेगा। गिफ्ट का मामला है। अभी तो मंगलवार को मैं एक और नया खुलासा करने वाला हूं।

 

प्रस्तुति: सूर्यनाथ सिंह / मृणाल वल्लरी

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