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रिपोर्टः वजूद की बोली

कानून की नजर में ये अब जन्मजात अपराधी नहीं हैं, लेकिन इसकी छाप इनकी जिंदगी से जा नहीं रही। सवाल यह है कि तमाम मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग इनकी बदहाली को संज्ञान में क्यों नहीं लेते, सरकार पर इन समुदायों के पक्ष में नीतिगत फैसले लेने के लिए दबाव क्यों नहीं डालते।

Author March 13, 2016 2:02 AM

मामला-एक
नाम- रानी
(बदला हुआ नाम), उम्र- पता नहीं, संतान- चार, पति – (बेकार), जाति- (विमुक्त ), आजीविका – देह व्यापार, पता- दिल्ली की एक मलिन बस्ती।
मामला-दो
नाम- लीला (बदला हुआ नाम), उम्र- लगभग साठ साल, पति – बेकार, संतान -दो बेटे (बेकार) और एक बेटी (शादी-शुदा), जाति-(विमुक्त जाति) आजीविका – पहले खुद का देह व्यापार, अब बहुओं का देह व्यापार, पता -दिल्ली की एक मलिन बस्ती।
जी हां, देश की राजधानी के एक कोने में बसी विमुक्त जाति की एक बस्ती के ज्यादातर बाशिंदों की यही पहचान है, केवल नाम, उम्र और बच्चों की संख्या का फर्क है। इस समुदाय की महिलाओं की स्थिति आज भी भयावह है। आज जब सारी दुनिया की महिलाएं अपने विकास की गाथाएं लिख रही हैं, तब ये महिलाएं एक गैरकानूनी और अमानवीय पेशे में अपने वजूद की बोली लगा रही हैं। और इनके लिए ‘दलाल’ का काम करते हैं इनके ही पति।
कहने को तो रानी के पास अपना घर है, घर में जरूरत की चीजें भी हैं, लेकिन घर-घर ऐसा नहीं बल्कि गंदगी और बदबू से भरा है। रानी सारी रात बाहर रहती है ताकि ग्राहक मिल सकें। दिनचर्या लगभग दोपहर से शुरू होती है। दिन में भी रानी ग्राहक की तलाश में बाहर जाती है। …वहीं केशवपुर जंगल के पास। रानी की शादी 2000 में हुई थी, फिर दो बच्चों के बाद उसने देह व्यापार का काम शुरू किया। यह सब अटपटा नहीं लगता?.. पूछने पर रानी कहती है, ‘ यहां सब जाते हैं, मेरी जेठानियां भी जाती हैं, अगर नहीं जाएंगे तो परिवार कैसे पलेगा, मन तो करता है दूसरा काम करूं।’ लेकिन रानी अपने बच्चों को इस नरक में धकेलना नहीं चाहती, वह उन्हें पढ़ा रही है। पिछले आठ सालों से इस पेशे के लिए आधी रात को घर से बाहर निकलने वाली रानी को शुरू-शुरू में तो डर लगा, पुलिस की जलालतें भी सहीं, ग्राहकों के छूरी-चाकू भी झेले, लेकिन अब वह मैनेज कर लेती है। वहीं गली में थोड़ी दूर आगे लगभग साठ साल की लीला खाट पर बेहाल पड़ी है। लीला का पति वहीं बैठा क्रोध से उबल रहा है कि उसकी बीवी जब बाहर जाती है तो उसी दिन वापस क्यों नहीं आती। जहां जाती है, वहीं रह क्यों जाती है, इसी बात पर मार-पीट भी करता है। वह कहता है, ‘हमारी सभी बहू-बेटियां धंधे पर कमाने जाती हैं, जाओ पर शाम तक घर आ जाओ।’ सभ्य समाज के लिए यह दलील पचा पाना मुश्किल है। लीला कहती हंै, ‘पति ने कभी कोई काम नहीं किया, बेटे कहते हैं कि कमाना उनके बस का नहीं।’

दो गलियों में सिमटी लगभग दो सौ परिवारों की इस बस्ती से सटी हुआ ही सपेरा बस्ती और सिंघी बस्ती है, जो इस समुदाय की इस परंपरागत पेशे से दबाव और खतरा दोनों महसूस करती है। सपेरा और सिंघी भी विमुक्त जाति हैं। सपेरा समुदाय की अनीता (नाम बदला हुआ) कहती हैं, ‘लोग अक्सर हमें भी धंधेवाली समझते हैं।’ अपनी बेटी को हॉस्टल में पढ़ाने वाली अनीता कहती हैं कि इस व्यवसाय के कारण इस इलाके में एड्स जैसी बीमारियों का खतरा हमेशा बना रहता है। सपेरा बस्ती के ही विरेंद्र कहते हैं कि वह अपने बच्चों को इस माहौल से दूर ले जाना चाहते हैं क्योंकि बच्चों पर गलत प्रभाव पड़ता है। लोग खौफ में बच्चों की जल्दी शादी कर देते हैं।’ हालांकि विरेंद्र के अनुसार अब स्थिति में थोड़ा बदलाव आया है, ग्राहकों का बस्ती के अंदर आना मना है।
हालांकि, पेशा करने वाले इस समुदाय में लड़कियों का जन्म उत्सव से कम नहीं होता, लेकिन इसका कारण यह है कि इसमें लड़की का मतलब शादी में मोटी दहेज मिलना तय और बहू के आने का मतलब ताउम्र आजीविका का जरिया। इस समुदाय के बीच पिछले पांच साल से काम करने वाली संस्था ‘अपने आप’ की शशिबाला बताती हैं कि इस समुदाय की बहुओं को इस पेशे में धकेला जाता है, पहले एक संतान के जन्म के बाद ऐसा करते थे, लेकिन अब शादी के साथ ही धंधे में धकेल देते हैंं। शशीबाला ने कहा, कि शुरू में इनके बीच पैठ बनाना बहुत मुश्किल था, धीरे-धीरे मेल-जोल तो बढ़ा लेकिन इन्हें इस काम से अलग करना मुश्किल है, बस एक-दो परिवार हैं जहां महिलाएं देह-व्यापार नहीं करतीं, अब कोशिश यह है कि इनके बच्चे इस लाइन में नहीं आएं। दिल्ली के एक और इलाके में भी इस समुदाय के चार-पांच सौ परिवार हैं। शशीबाला ने बताया कि वहां कि एक लड़की उनके पास शिकायत लेकर आई थी, हमने उसके परिवार से लड़ कर इस धंधे से उसे बचाने की कोशिश की, लेकिन लड़की फिर अपनी बात से पलट गई और वापस अपने समुदाय में चली गई। ‘अपने आप’ की टॉउ नाना ने कहा कि ये लड़कियां बाहरी दुनिया के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पातीं, उन्हें जिंदगी के बेहतर विकल्प नहीं मालूम। ये महिलाएं एक तरह से होम-बेस्ड-ब्रोदल ( घरेलू चकले) की गिरफ्त में हैं। वे तो घर में ही अपराध की शिकार हैं जो परिवार और परंपरा के नाम पर उन पर थोप दिया गया है।
यह समुदाय उन घुंमतू समुदायों में से है, जिन्हें ब्रिटिश शासन काल के दौरान 1871 में अपराधी जनजाति घोषित किया गया था। उन्हें जन्मजात अपराधी माना जाता था। आजादी के बाद भारत सरकार ने 1952 में इन्हें विमुक्त जाति घोषित किया। इन घुमंतू समुदाय को जगह-जगह बसाया भी गया। दिल्ली के अलाव ये हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों पर भी बसाया गया। ये समुदाय कभी जगह-जगह घूम कर भेड़ें चराता था, लेकिन बसाने के बाद इनकी आजीविका और विकास के साधन नहीं जुटाए गए। नतीजा रहा इस तरह के कामों में संलग्नता। टॉउ नाना ने कहा कि यह राज्य की विफलता है। ‘अपने आप’ की संस्थापक रुचिरा गुप्ता ने बताया, ‘ सरकार को इनकी हर तरह से देख-रेख की नीति लानी होगी, उनके जन्म, मृत्यु, जाति संबंधी दस्तावेज दुरुस्त करने होंगे ताकि वह सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें।’
कानून की नजर में ये अब जन्मजात अपराधी नहीं हैं, लेकिन इसकी छाप इनकी जिंदगी से जा नहीं रही। सवाल यह है कि तमाम मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग इनकी बदहाली को संज्ञान में क्यों नहीं लेते, सरकार पर इन समुदायों के पक्ष में नीतिगत फैसले लेने के लिए दबाव क्यों नहीं डालते। ०

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