Supreme Court says, Set up special courts to try cases against politicians - Jansatta
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संपादकीयः तेज सुनवाई

शीर्ष न्यायालय के इस आदेश का स्वागत किया जाना चाहिए। अगर इस दिशा में कोई ठोस पहल होगी तो वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहतर ही होगा।

Author November 2, 2017 3:18 AM

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति को अपराधमुक्त बनाने के लिए केंद्र सरकार से फास्ट ट्रैक कोर्ट की तर्ज पर सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का गठन करने के लिए कहा है। शीर्ष न्यायालय के इस आदेश का स्वागत किया जाना चाहिए। अगर इस दिशा में कोई ठोस पहल होगी तो वह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहतर ही होगा। शीर्ष न्यायालय बुधवार को एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रहा था, जिसमें सजायाफ्ता लोगों को आजीवन चुनाव से दूर रखने तथा न्यायपालिका या प्रशासनिक पदों पर उन्हें नियुक्त न करने की मांग की गई थी। न्यायालय ने 2014 से अब तक राजनेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए आपराधिक मामलों की जानकारी भी मांगी है। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा के खंडपीठ ने सरकार से कहा कि राजनीति को अपराधमुक्त होना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि विशेष अदालतों के गठन की योजना और इस मद में खर्च होने वाली राशि के बारे में सरकार शीर्ष न्यायालय को अवगत कराए। साथ ही, खंडपीठ ने सरकार से 2014 के आम चुनाव में निर्वाचित 1581 सांसदों और विधायकों का वह विवरण भी दाखिल करने को कहा है जो उन्होंने अपने नामांकन पत्र में भरा था। खंडपीठ ने फिलहाल छह हफ्ते के भीतर सारी जानकारियां न्यायालय में जमा कराने का आदेश देते हुए याचिका की सुनवाई के लिए 13 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने खंडपीठ को बताया कि दोषी ठहराए गए जनप्रतिनिधियों को आजीवन अयोग्य घोषित करने संबंधी चुनाव आयोग और विधि आयोग की सिफारिशों पर विचार किया जा रहा है। गौरतलब है कि भारतीय राजनीति में लंबे समय से अपराधियों का बोलबाला रहा है। तमाम मामलों में राजनेताओं को सजा भी मिली, लेकिन होता यही है कि वे ऊंची अदालत में अपील करके स्थगनादेश प्राप्त कर लेते हैं और फिर चुनाव लड़ने में कामयाब रहते हैं। इसलिए अरसे से इस पर विचार चल रहा है कि क्यों न सजायाफ्ता मुजरिमों को आजीवन चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए।

हालांकि चुनाव आयोग पहले ही केंद्र सरकार को सजायाफ्ता लोगों के लिए ताउम्र चुनाव लड़ने से वंचित रखने की सिफारिश कर चुका है। क्योंकि इससे पहले एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख न अपनाने पर चुनाव आयोग की खिंचाई भी की थी। इसी साल जुलाई में जब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी तब केंद्र ने आजीवन चुनाव से वंचित करने की दलील का विरोध किया था। अब जबकि अदालत ने सख्त रुख अपनाया है तो माना जाना चाहिए कि इस दिशा में कोई सार्थक पहल हो सकेगी और भारतीय राजनीति में छाए अपराध के बादल छंट पाएंगे। कुछ बरसों से चुनाव आयोग की सख्ती के चलते बूथ कैप्चरिंग जैसी बुराइयों से तो निजात मिल गई है, लेकिन बाहुबलियों और अपराधियों का मनोबल आज भी पस्त नहीं हुआ है। चुनावों के दौरान आचार संहिता को कड़ाई से लागू करना आज भी एक कठिन कार्य है क्योंकि प्रत्याशियों द्वारा मतदाताओं को लुभाने के लिए पैसे और उपहार आदि बांटने का चलन अब भी कायम है। इस दिशा में भी काफी-कुछ सोचने की जरूरत है।

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