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विज्ञान के प्रति रुचि जगाने की जरूरत

ऐसा नहीं कि देश ने सिर्फ परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में ही प्रगति की है। हमने कई छोटे, मगर महत्त्वपूर्ण आविष्कार किए, जिससे देश की विदेशी निर्भरता इन पर से समाप्त हो गई। इसने न केवल विदेशी कंपनियोें का यहां एकाधिकार खत्म किया, बल्कि देश के आर्थिक विकास को भी तेज कर दिया। इसका एक उदाहरण खून रखने वाली थैली यानी ब्लड बैग की खोज का है।

विज्ञान के प्रचार-प्रसार और समाज के हर तबके में अभिरुचि पैदा करने के भी प्रयास होने चाहिए। साथ ही इन क्षेत्रों में करिअर बनाने वाले छात्रों को विदेशों की तरह वेतन-भत्ते की व्यवस्था होनी चाहिए।

ज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां बड़ी हैं। पर भारतीय जनता के वैज्ञानिक रुझान को लेकर सवाल उठते रहते हैं? हमारे यहां विज्ञान से ज्यादा उज्ज्वल भविष्य युवाओं को मार्केटिंग में दिख रहा है। उन्हें पता है कि बायोटेक में स्नातक होकर वे जितना कमाऐगे उससे ज्यादा कहीं उसके विकसित उत्पाद बेच कर कमा लेंगे। ऐसे में विज्ञान के प्रति छात्रों और नौजवानों में रुचि कम होना स्वाभाविक है। भारत ने पिछले चार सौ साल से शुरू हुई वैज्ञानिक खोजों में वह मुकाम नहीं हासिल किया, जितना पश्चिमी जगत ने बनाया। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं अपने यहां की शिक्षण पद्धतियां। हर भारतीय भाषा में गिनती की विज्ञान अभिरुचि जागृति करने वाली किताबें हैं। फिर भी नौवीं, दसवीं तक जाते-जाते ही कई छात्रों के मन में विज्ञान के प्रति रुचि जागती है। मगर जैसे-जैसे वे ऊंची कक्षा में जाते हैं उनकी अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता बढ़ती जाती है।

इतनी सारी कमियों के बावजूद भारत ने इस क्षेत्र में अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है। विज्ञान में अनुसंधान एवं विकास के अंर्तगत तीन तरह की गतिविधियां शामिल होती हैं। बुनियादी शोध, अनुप्रयुक्त शोध और प्रयोगात्मक विकास। इंडियन साइंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंडस्ट्री रिपोर्ट 2019 बताती है कि भारत बुनियादी शोध के क्षेत्र में शीर्षस्थ देशों में शामिल है। भारत के पास तकनीकी और वैज्ञानिक जनशक्ति भी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी जनशक्ति है। भारत, विज्ञान एवं तकनीकी अनुसंधान में दुनिया में सातवें स्थान पर है। नैनो तकनीक पर शोध के मामले में हम तीसरे स्थान पर हैं। प्रत्यूष नामक सुपर कंप्यूटर के निर्माण के बाद हम जापान, अमेरिका और ब्रिटेन के बाद मौसम पूर्वानुमान के क्षेत्र में चौथे स्थान का देश बन चुके हैं। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स में हमारा स्थान सत्तावनवां है। वैश्विक अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्र में भी हमारी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। 2010 में जहां देश में 710 मल्टीनेशनल कारपोरेशन रिसर्च सेंटर थे अब इनकी संख्या 1150 के पार हो चुकी है। शिक्षा, कृषि, स्वास्थ्य, अंतरिक्ष अनुसंधान, जैव-ऊर्जा, जल तकनीक सहित परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी पर्याप्त निवेश और अनुसंधान हो रहे हैं।

ऐसा नहीं कि देश ने सिर्फ परमाणु और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में ही प्रगति की है। हमने कई छोटे, मगर महत्त्वपूर्ण आविष्कार किए, जिससे देश की विदेशी निर्भरता इन पर से समाप्त हो गई। इसने न केवल विदेशी कंपनियोें का यहां एकाधिकार खत्म किया, बल्कि देश के आर्थिक विकास को भी तेज कर दिया। इसका एक उदाहरण खून रखने वाली थैली यानी ब्लड बैग की खोज का है। पहले रक्त को शीशे की बोतलों में रखा जाता था। जिसमें रक्त का सुरक्षित रहना काफी कठिन होता था। इसमें संक्रमण के खतरे ज्यादा होते थे। कभी-कभी तो किसी रक्त समूह के रक्त की इतनी त्वरित जरूरत होती थी कि चिकित्साकर्मी के इसे जल्दी उपलब्ध कराने के उपक्रम में कभी-कभी ऐन वक्त पर बोतल फूट जाती थी। इस बैग ने इन सारी झंझटों से इस क्षेत्र को राहत दे दी। ऐसा ही एक वाकया न्यूक्लियर बायोलॉजी और डीएनए आधारित अनुसंधान का है।

1997 में हैदराबाद स्थित ऐसे एक सार्वजनिक शोध संस्थान की मदद से शांता बायोटेक्नीक ने भारत में पुनर्संयोजक डीएनए प्रौद्योगिकी की अगुआई की। इस कंपनी ने हेपेटाइटिस बी के वैक्सीन को बाजार में महज पचास रुपए की कीमत पर उपलब्ध करा दिया। इसे विदेशी कंपनियां भारत के भीतर साढ़े सात से साढ़े आठ सौ रुपए में बेच रही थीं। अब इस रक्त बैग को उत्पादित और वितरित करने वाली पेनपोल कंपनी दुनिया में इस बैग की अड़तीस फीसद आपूर्ति कर रही है। इसी के साथ एक क्षेत्र और है- झींगा पालन का, जिसने किसानों की जहां लागत घटा दी, वहीं मुनाफा बढ़ा दिया। केंद्रीय खारा जलजीव पालन अनुसंधान संस्थान, चेन्नई ने एक डाइग्नोस्टिक किट खोजी। इसकी मदद से रोगजनक वायरस की पहचान में आसानी हो गई। इससे तटीय क्षेत्र तमिलनाडु सहित अन्य जगहों के किसानों को भी काफी फायदा हुआ। जहां इससे झींगा उत्पादन बढ़ा वहीं उसकी गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। आज झींगा उत्पादन उद्योग काफी मजबूत स्थिति में है।

इतना सब कुछ होने के बाद भी यह वैश्विक स्तर के हिसाब से ठीक नहीं है। सीएसआईआर के अनुसार हर साल तकरीबन तीन हजार अनुसंधान होते हैं। पर इनमें नया कुछ नहीं होता। ये महज डिग्री लेने के उद्देश्य से किए जाते हैं। सरकारी और निजी क्षेत्र की प्रयोगशालाओं के खर्च में लगातार कटौती की जा रही है। सबसे ज्यादा बुरी स्थिति निजी क्षेत्र के हाई स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक की है। दूर-दराज के इलाकों में खुले निजी इंटर कॉलेजों में प्रयोगशालाएं ही नहीं हैं। फिर भी विद्यार्थियों को प्रायोगिक परीक्षाएं देनी होती हैं। ऐसे में वे क्या सीख रहे होंगे, समझा जा सकता है।

अभी तक विज्ञान में शोध पर खर्च जीडीपी के एक प्रतिशत के आसपास ही है। वैज्ञानिक इसे कम से कम दो प्रतिशत तक करने की मांग करते रहे हैं। अब सरकार इस मुद्दे पर गंभीर हुई है। टेक्नालॉजी विजन 2035 के नाम से विज्ञान प्रौद्योगिकी विभाग ने एक रूपरेखा बनाई है। इसमें खाद्य और कृषि, चिकित्सा और स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, ऊर्जा, जल जैसे महत्त्वपूर्ण विषय शामिल हैं। राष्ट्रीय सुपर कंप्यूटिंग मिशन के तहत भारत को कंप्यूटर क्षेत्र में एक विश्वस्तरीय शक्ति बनाने का लक्ष्य निर्धारित है। भारत और आसियान देशों के वैज्ञानिकों और नवोन्मेषकों के बीच नेटवर्क बनाने के लिए आसियान भारत इनोटेक शिखर सम्मेलन भी बुलाया गया है। भारत-यूके विज्ञान एंड इनोवेशन पालिसी डायलॉग के जरिए इन दोनों देशों में एक करार हुआ है, जो कृत्रिम बुद्धिमता, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी, स्वच्छ विकास, डिजिटल अर्थव्यवस्था और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। विदेशों में भारतीय छात्रों के प्रशिक्षण के लिए ओवरसीज विजिटिंग डॉक्टोरल फेलोशिप की योजना चलाई गई है। सबसे ज्यादा दिलचस्प कार्यक्रम अवसर (आॅगमेंटिंग राइटिंग स्किल्स फार आर्टिकुलेटिंग रिसर्च) है। इसका उद्देश्य भारतीय शोधों को जनसामान्य के बीच प्रसारित-प्रचारित करना है।

यूनेस्को के एक आकड़े के अनुसार भारत में आबादी के लिहाज से शोधार्थियों की संख्या सबसे कम है। यहां एक शोधार्थी के ऊपर 6410 व्यक्ति निर्भर हैं, जबकि चीन में 912, द. कोरिया में145, जापान में188 और अमेरिका में यह आंकड़ा 235 व्यक्ति का है। हांलाकि सरकार की तरफ से काफी प्रयास किए जा रहे हैं, फिर भी और देशों की तरह पीपीपी माडॅल के तहत निजी क्षेत्रों को भी इसमें आगे आना चाहिए। विज्ञान के प्रचार-प्रसार और समाज के हर तबके में अभिरुचि पैदा करने के भी प्रयास होने चाहिए। साथ ही इन क्षेत्रों में करिअर बनाने वाले छात्रों को विदेशों की तरह वेतन-भत्ते की व्यवस्था होनी चाहिए। सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि विज्ञान जैसे विषयों पर ध्यान केंद्रित किया जाए। इसका प्रचार-प्रसार भी होना चाहिए, ताकि देश के लोगों को पता चल सके कि इस समय विज्ञान के क्षेत्र में क्या चल रहा है।

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