ताज़ा खबर
 

घर से संसद तक मजबूत और मुखर

इन महिला सांसदों के आजाद बोल ने आधी आबादी के विश्वास को बढ़ाया है। इनके राजनीति के सफर को साझा करना एक सुखद अनुभव है। इन सांसदों का कहना है कि परिवार हो या राजनीति दोनों को ठीक चलाने के लिए एक ही मंत्र है-इच्छाशक्ति।

17वीं लोकसभा में 78 महिला सांसद हैं।

विजयलक्ष्मी ठाकुर

राजनीति के क्षेत्र से इस बार आधी आबादी के लिए अच्छे संकेत मिले हैं। पिछली लोकसभा में कुल 64 महिला सांसद थीं, वहीं 17वीं लोकसभा में बढ़कर 78 महिला सांसद हो गई हैं। यकीनन पिछली बार की तुलना में इस बार महिला सांसदों की संख्या न सिर्फ बढ़ी है बल्कि अब वे मुखर भी हैं। अपने क्षेत्र और देश-दुनिया की समस्याओं पर खुल कर बातें कर रहीं है और अपनी बेबाक राय भी रख रही हैं। चाहे तृणमूल कांग्रेस की तेज तर्रार नेता महुआ मोइत्रा का हाल ही में दिया गया भाषण हो या फिर शपथ ग्रहण के दौरान कई नए युवा महिला सांसदों के बयान। इन महिला सांसदों के आजाद बोल ने आधी आबादी के विश्वास को बढ़ाया है। इनके राजनीति के सफर को साझा करना एक सुखद अनुभव है। इन सांसदों का कहना है कि परिवार हो या राजनीति दोनों को ठीक चलाने के लिए एक ही मंत्र है-इच्छाशक्ति।

इंदिरा गांधी रहीं प्रेरणा
महुआ मोइत्रा बताती हैं कि जो जैसा सोचता है और उसके लिए प्रयास करता है, वो वैसा ही बनता है। मैंने हमेशा से इंदिरा गांधी जैसी बनने की प्रेरणा ली और अपनी बैंकर की नौकरी छोड़ कर राजनीति में बेहतर समाज के निर्माण की कल्पना की है। मुझे अपने परिवार से पूरा सहयोग मिलता रहा है, शायद यही मेरी शक्ति है कि मैं विरोधियों के सामने डट कर खड़ी रहती हूं और दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित करती हूं।
– महुआ मोइत्रा, कृष्णानगर, पश्चिम बंगाल

समाज और राजनीति से जुड़ कर काम करती रही
मैं शुरू से ही समाज और राजनीति से जुड़ी रहीं हूं। घर के काम को निपटाने के बाद अपना काम किया करती थी। जो चाहा उसे करने के लिए योजना तैयार की और अपना काम भी किया। इस तरह से घर और बाहर का मजबूत संतुलन बनाया, जो मेरे ख्याल से आज की तारीख में हर वो महिला कर रही है जो नौकरीपेशा है। राजनीति में थोड़ा ज्यादा वक्त देना पड़ता है, लेकिन इच्छाशक्ति से सब संभव हो जाता है।
– संगीता सिंह देव, बलांगीर, ओड़िशा

समय और चुनौतियां सबसे बड़े शिक्षक
मेरा यह मानना है कि जननी तो सब जानती है। समय और चुनौतियां ही सबसे बड़े शिक्षक हैं। उनसे निपटने के रास्ते भी निकल ही जाते हैं बशर्ते कि वे उसके लिए प्रयास करें। मेरे साथ भी हो गया। मैं अपने घर को अच्छी तरह संभाल लेती हूं। प्राथमिकता तय करके काम करती हूं। मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि आज की लड़कियां घर और दफ्तर के बीच संतुलन बनाना बखूबी जानती है जो एक अच्छी बात है।
– दर्शना, सूरत, सांसद

अपने काम से ही सीखा संतुलन बनाना
करीब 25 साल तक भारतीय प्रशासनिक सेवा में अपनी सेवाएं दीं, फिर भाजपा के टिकट से ओड़िशा के भुवनेश्वर से अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की। इस पूरे सफर में परिवार और बच्चों का भरपूर सहयोग मिला। चुनाव के दौरान भी मेरे पूरे परिवार ने मेरा सहयोग किया। संतुलन बनाना जरूरी है जो मैंने हमेशा अपने काम से सीखा, वो ही अब भी काम आ रहा है। अब बच्चे बड़े हो गए हैं तो वे भी काम में हाथ बंटाते हैं।
– अपराजिता सारंगी, सांसद, भुवनेश्वर

राजनीति से है कई सालों का नाता
मैं शुरू से ही भाजपा की कार्यकर्ता रही हूं। जमीन से जुड़ी रही हूं। सांसद तो अब बनी हूं लेकिन राजनीति से मेरा नाता कई सालों का है। घर के काम करने के बाद जनसंपर्क करने घूमी हूं, फिर लौट कर बच्चों को भी संभाला है। ये नजरिए की बात है, थोड़ा ज्यादा काम महिलाओं को करना पड़ता है लेकिन हो जाता है। फिर परिवार भी समझने लगते हैं। मेलजोल से मुश्किलें हल हो जाती हैं।
– शोभा करंदलाजे, उडुपी-चिकमंलूर, कर्नाटक

संतुलन हर क्षेत्र में बेहद जरूरी होता है
राजनीति में हम सफल हो गए इसलिए आज यह सब हमसे पूछा जा रहा है। संतुलन तो हर क्षेत्र में बेहद जरूरी है फिर चाहे राजनीति में हो या फिर घर पर। धीरे-धीरे सब अपने अपने सांचे में ढल जाते हैं। इस क्रम में सिर्फ हम ही नहीं हमारा पूरा परिवार सीखता है। कभी वे हमें सहयोग करते हैं, तो कभी हम दीवार की तरह मजबूती से उनके साथ खड़े रहते हैं। सारा दारोमदार संतुलन पर है। इसलिए संतुलन बनाना सबसे आवश्यक होता है।
– लॉकेट चटर्जी, सांसद, हुगली

माता-पिता से मिली सीख
मेरा पूरा बचपन राजनीति के साये में गुजरा है। मैं खुशकिस्मत भी हूं कि मुझे राजनीति और समाजसेवा करने की सीख पिताजी से मिली। मैंने शादी नहीं की है लेकिन अपनी मां को घर संभालते देखा है। पापा भी घर पर समय दिया करते थे। मुझे लगता है कि उन्हीं की दी हुई सीख मुझे ताकत देती है।
-अगाथा सांगमा, तुरा संसदीय क्षेत्र, मेघालय

Next Stories
ये पढ़ा क्या?
X