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हड़ताल और सवाल

दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों में पिछले पांच दिन से रेजीडेंट डाक्टरों की हड़ताल से चिकित्सा सेवाएं चरमरा गई हैं।

दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों में पिछले पांच दिन से रेजीडेंट डाक्टरों की हड़ताल से चिकित्सा सेवाएं चरमरा गई हैं। यहां तक कि कई अस्पतालों में तो आपातकालीन सेवाएं भी बंद हैं। हालात इतने खराब हो गए हैं कि अस्पतालों में न तो मरीजों को भर्ती किया जा रहा है, न ही दाखिल मरीजों की कोई देखभाल करने वाला है। अस्पतालों के बाहर गाड़ियों और एंबुलेंस में मरीज तड़प रहे हैं। जो लोग दिल्ली के आसपास के शहरों से जिंदगी की उम्मीद लिए यहां पहुंच रहे हैं, उन्हें भी निराशा हाथ लग रही है।

जाहिर है, ऐसे में हजारों लोग या तो बिना इलाज के रहने को मजबूर हो गए हैं या फिर निजी अस्पतालों की शरण में जा रहे हैं। पर हैरानी की बात यह है कि अभी तक भी सरकार की ओर से ऐसा कोई प्रयास होता दिखा नहीं है जिससे हड़ताल खत्म हो और डाक्टर काम पर लौटें। जबकि इस वक्त ओमीक्रान के खतरे को देखते हुए अस्पतालों को ज्यादा मुस्तैद रहने की जरूरत है। फिर कोरोना और ओमीक्रान के अलावा भी तमाम तरह के हजारों मरीज रोजाना अस्पताल पहुंच रहे हैं। सवाल है ऐसे में स्वास्थ्य सेवाएं कैसे सुचारू रूप से चलेंगी? जो लोग निजी अस्पतालों का खर्च उठा पाने में सक्षम नहीं हैं, वे इलाज के लिए कहां जाएंगे?

गौरतलब है कि रेजीडेंट डाक्टर अस्पतालों की रीढ़ होते हैं। इनकी संख्या भी खासी होती है। पढ़ाई के दौरान वरिष्ठ चिकित्सकों की देखरेख में अस्पतालों में मरीजों की देखभाल का जिम्मा मुख्य रूप से इन्हीं का होता है। ऐसे में अगर रेजीडेंट डाक्टर काम बंद कर देते हैं तो अस्पतालों में कामकाज ठप होना स्वाभाविक है। दिल्ली के बड़े सरकारी अस्पतालों- एलएनजेपी, जीबी पंत, जीटीबी, सफदरजंग, राममनोहर लोहिया, कलावती सरन और सुचेता कृपलानी अस्पताल में करीब सात हजार रेजीडेंट डाक्टर हैं।

दरअसल डाक्टर जिस मांग को लेकर हड़ताल करने को मजबूर हुए हैं, वह नीट पीजी की काउंसलिंग से संबंधित है। रेजीडेंट डाक्टर लंबे समय से नीट पीजी काउंसलिंग जल्द कराने की मांग कर रहे हैं। यह उनके भविष्य से जुड़ा मसला है। उन्हें आगे स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में दाखिला लेना होता है। लेकिन अभी काउसंलिंग नहीं होने से यह रुका हुआ है। मसला उलझा हुआ इसलिए है कि नीट से संबंधित मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। छह जनवरी को इस मामले की सुनवाई होनी है। ऐसा भी नहीं कि यह हड़ताल अचानक की गई हो। रेजीडेंट डाक्टर छह दिसंबर को हड़ताल पर चले गए थे। लेकिन तब स्वास्थ्य मंत्रालय ने कुछ समय मांगते हुए हड़ताल टलवा दी थी।

देखा जाए तो रेजीडेंट डाक्टरों की यह हड़ताल किसी नाजायज मांग को लेकर नहीं है। यह हड़ताल सरकार के नीतिगत फैसलों में विसंगति को बताती है। नीट को लेकर वैसे भी सवाल उठते रहे हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई चलेगी तब तक रेजीडेंट डाक्टर क्या करेंगे? क्या स्वास्थ्य मंत्रालय मामला सुप्रीम कोर्ट में होने की आड़ लेकर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा? स्वास्थ्य मंत्रालय को बीच का कोई रास्ता तो निकालना ही होगा। हालांकि नीट को लेकर कोई भी अंतिम और स्थायी समाधान अदालत के फैसले के बाद ही निकल सकेगा, लेकिन इसमें अभी समय लगेगा। ऐसे में अदालत का फैसला आने तक स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहाल नहीं होने दिया जा सकता। सरकार और हड़ताली डाक्टरों को यह बात समझनी चाहिए।

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