बेबाक बोलः शोर की स्मृति - Jansatta
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बेबाक बोलः शोर की स्मृति

इतालवी बुद्धिजीवी अंबर्तो इको ने कहा था कि आजादी का मतलब तो झूठे और नकली शब्दों से मुक्त होना भी है। विश्वविद्यालय परिसरों और अन्य सांस्कृतिक जगहों पर कई बार पोस्टरों पर निगाह पड़ी - बोल कि लब आजाद हैं तेरे...। आज जब संसद से सड़क तक निगाह जाती है तो हर कोई बोल रहा है। संसद में नेताओं के बोले शब्द झूठे और नकली लगते हैं तो सड़क पर लोगों में बोलने की ऊर्जा तो दिखती है लेकिन दूसरों को सुनने का धीरज नहीं दिखता। हर जगह ‘मैं’ की गूंज है, जो किसी एक को कुछ देर के लिए नायकत्व का दर्जा दे बाकी सबको अकेला छोड़ रही है। इसी शोरगुल पर इस बार का बेबाक बोल।

‘एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है वह सिर्फ रोटी से खेलता है, मैं पूछता हूं-यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है।’
सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ ने कभी यह सवाल अपनी कविता में उछाला था। संसद चुप रही, इसका जवाब अब तक नहीं आया। ऐसे कई सवाल आज भी संसद की दीवारों से टकराते हुए दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना आया है कि आज संसद मौन नहीं है बल्कि वहां इतना ज्यादा शोर है कि आवाजें तो सुनाई पड़ती हैं पर अर्थ गुम हो जाता है। वहां मुद्दे तो उठते हैं, पर जनता जनार्दन के मतलब के कम और अपनी राजनीति की दुकान चलाने वाले ज्यादा होते हैं। शायद यही वजह है कि माया बोलें या स्मृति, राहुल बोलें या राजनाथ या देश के प्रधान नरेंद्र मोदी – वह बोलना सिर्फ अपनी उपस्थिति जोरदार तरीके से दर्ज कराने समान हो जाता है। और रोहित वेमुला जैसों की आत्मा सिसकती रह जाती है। परिजन न्याय के लिए तड़पते रह जाते हैं।
लेकिन ‘माननीयों’ को शायद इस बात की परवाह भी नहीं कि वे अब सार्वजनिक हस्ती हैं। जनता उम्मीद करती है कि ‘माननीयों’ का आचरण कुछ ऐसा हो कि उनसे प्रेरणा ली जा सके। पर ये ‘माननीय’ तो अपनी धुन में डूबे रहते हैं। उन्हें ही पता नहीं चलता कि उन्होंने क्या कहा, क्या किया? दूसरों को सुनने की तो बात ही दूर।
अगर उन्हें अपनी सार्वजनिक छवि की चिंता होती तो संसद में शायद ही वह सब हो रहा होता जो अब हो रहा है। संसद के सीधे प्रसारण के साथ ही अब देश का हर नागरिक न सिर्फ उसकी कार्यवाही का चश्मदीद है वरन उस पर अपनी राय बनाने को भी स्वतंत्र है।
ऐसे में माननीयों से थोड़ी ज्यादा सावधानी की अपेक्षा थी जो कि हासिल नहीं हुई। संसद की कार्यवाही को देखने वालों को यह सहज ही प्रतीत हो जाता है कि वहां जो भी हो रहा है वह देश के हित के लिए तो बिल्कुल भी नहीं है।
ऐसे समय में ही इतालवी बुद्धिजीवी अंबर्तो इको की याद आती है और उनका हमें छोड़कर चला जाना अखरता है। वे मुसोलिनी की इटली में पैदा हुए थे। उसके देशभक्त नारे अंबर्तो को खूब लुभाते थे। अपने स्कूल के दिनों में वे मुसोलिनी के भाषण रट-रट कर लेखन प्रतियोगिताएं जीता करते थे। उन्होंने अपने एक लेख में बताया था कि जब मुसोलिनी का दौर खत्म हुआ और 1945 में पार्टिजन्स मिलान के नेता मीमो काबिज हुए, तो अंबर्तो भी मीमो को सुनने गए। मीमो की एक टांग युद्ध में कट चुकी थी। वे अपनी बालकनी से लोगों को संबोधित करने आए। इस आजादी के लिए उन्होंने बेहद धीमी और शांत आवाज में सबका धन्यवाद किया और लौट गए। अंबर्तो को उस दिन समझ में आया कि आजादी का मतलब तो झूठे और नकली शब्दों से मुक्त होना भी है।
पर अफसोस कि अपने देश में हमारे माननीयों को यह बात समझ में नहीं आती। यहां सबका झगड़ा ‘खुद’ को स्थापित करने के लिए है। ‘मैंने’ (या मेरी पार्टी ने) जो भी किया वह गलत नहीं है बल्कि सामने की बेंच पर बैठे लोगों ने जो भी किया गलत है। किसी ने देवी दुर्गा को ‘गाली’ दी तो उसे संसद में पढ़ के सुनाने से ही उसकी गंभीरता पता चल सकती थी। लिहाजा उसे पढ़कर सुनाया गया। हालांकि ऐसा नहीं है। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी जिन्होंने संसद के उस मंच से अपनी अद्भुत अभिनय और वाकपटुता का उदाहरण पेश किया, जाहिर है कि इतनी प्रशंसा उनके तर्कों की नहीं हुई जितनी उनकी ज्वलंत भाषण कला और हमलावर अंदाज की हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्या वे मसले का कोई समाधान पेश कर सकीं?
हां देश को यह अंदाजा जरूर हो गया कि उनके लिए भारत का मतलब सिर्फ उत्तर भारत का सवर्ण तबका है। देश की अगुआई करने वालों को देश की विविधता का ही अंदाजा नहीं है। भारत के उत्तर में राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तो दक्षिण में रावण भी पूजे जाते हैं। हां, देश की राजधानी में पूरे हिन्दुस्तान से आकर बसे हुए लोग हैं जहां अस्मिता का टकराव होना लाजिमी है। लेकिन सरकार का काम है टकराव को कम करना न कि एक पक्ष के तरफ खड़े होकर सिर्फ मां दुर्गा की पूजा करने वालों की अगुआ बन जाना।
उनके महकमे के तहत आने वाले शिक्षा विभाग का काम ही है मूल्यांकन करना और इस नाते वह किसी को पास करेगा तो किसी को फेल। इस बार इस मुद्दे पर इस विभाग की मुखिया फेल होती दिखीं। देवी दुर्गा की आड़ में पार्टियों ने अपनी-अपनी राजनीति चमकाने का जो खेल खेला, वह किसी से छुपा नहीं। शायद ही कोई देवी दुर्गा के मुद्दे पर कांग्रेस सांसद आनंद शर्मा के असली मकसद से अनजान है? स्मृति ईरानी ने जो अक्षरश: पढ़कर लोगों को भावना के आवेग में बहा कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वाहवाही लूटी, शर्मा उसी को भारतीय जनता पार्टी के मुंह पर पलट कर अपनी पार्टी की राजनीति चमकाना चाहते थे।
बहरहाल, मुद्दा यह है कि संसद में जिन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए और बहस के बाद रास्ते निकलने चाहिए, यह होता नहीं दिख रहा। बल्कि दिख यह रहा है कि जबरन मुद्दे बनाए जा रहे हैं ताकि जरूरी मुद्दे से लोगों का ध्यान भटक सके। अभी हाल ही में देवी के प्रति लोगों की आस्था की आड़ में संसद में जो हुआ, क्या वह ठीक है? भारत विभिन्न विश्वासों का देश है। हाल ही में सावरकर के भाई ने एक किताब में कह दिया कि जीसस क्राइस्ट हिंदू थे। ईसाई समुदाय की ओर से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। प्रतिक्रिया न देने की जो संजीदगी इस समुदाय ने दिखाई, उसी का नतीजा है कि यह वाक्य मुद्दा बनने से पहले ही नेपथ्य में चला गया। तमिलनाडु में कई छोटी जगहों पर मदर मरियम की मूर्ति साड़ी और दक्षिण भारतीय शैली के आभूषणों में दिखती है। कुछ पीढ़ी पहले ईसाई हुए लोग मदर को ‘मरियम्मा’ कहते हैं। हम यहां धर्मांतरण की बहस में बिल्कुल नहीं पड़ना चाहते, बस यह कहना चाहते कि लोगों की आस्था का अधिकार उन पर ही छोड़ दिया जाए। एक खास आस्था का वर्चस्व बढ़ाने के लिए केंद्र या राज्य डंडा लेकर खड़ा न हो जाए।
लेकिन माननीयों की प्रयोगशाला ने तो यही सिद्ध किया है कि धर्म की लाठी से इस देश की जनता को हांका जा सकता है। इसलिए वे समाज में धर्म के मुद्दे पर अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होने का दिखावा करते हैं और जनता को उसी में उलझाए रखना चाहते हैं। धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए ही धर्म के आधार पर आरक्षण की मांग हो रही है। खास योजनाओं की भी घोषणा होती है। अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकार की रक्षा के नाम पर जितनी राजनीति खेली गई है और अल्पसंख्यकों की राजनीतिक और सामाजिक हालत क्या है यह बताने के लिए सच्चर कमिटी की रिपोर्ट काफी है।
यहां हम राज्यों की विधानसभाओं की बात नहीं कर रहे। वहां तो लात-घूंसे चल चुके हैं। कपड़े फाड़ने से लेकर माइक तोड़ने जैसे अशोभनीय दृश्य सामने आए हैं। हम यह मानते हैं कि देश की संसद में जो भी हो रहा होता है वह देश के करोड़ों मतदाताओं की आवाज होता है। तो क्या इस बार धर्म की आड़ में जो कुछ हुआ, जो तर्क-वितर्क हुए, सिर काटकर चरणों में सौंप देने जैसे संवाद कहे गए, वह देश की जनता की आवाज थी? यह मुख्य मुद्दे को दिशाहीन कर उसे हाशिए पर भेजने का कौशल था। रोटी-कपड़ा और मकान के जनता के मुद्दे गायब हैं और दिमाग में सिर्फ शोरगुल की स्मृति है। स्मृति ईरानी यह मुद्दा न भी उठातीं तो देश में देवी दुर्गा की आस्था को कोई खतरा नहीं था। लेकिन कैमरे की नजर से संसद को देख हमारी यह आस्था थोड़ी डगमगाई कि हमारे माननीय हमारी आवाज हैं।
एक दिन स्मृति ईरानी अपने संवाद अदायगी व अभिनय का लोहा मनवाती हैं तो दूसरे दिन आनंद शर्मा या सीताराम येचुरी उसी मुद्दे को चुरा कर हमलावर हो जाते हैं। ऐसे अराजक माहौल में संसद की कार्यवाही कई बार ठप रही। दोबारा कार्यवाही जब भी शुरू हुई तो पार्टियां भक्ति पर शक्ति प्रदर्शन करते रहे। लगा कि माननीयों में दुर्गा तो हैं, सरस्वती लुप्त हो गई हैं।
देश के विकास और प्रगति का खाका खींचने वाले सांसदों को यह समझना होगा कि खाली विकास की रणभेरी और अपनी कथित ‘उपलब्धियों’ का डंका बजा कर वे अपने आचरण के दाग नहीं धो सकते। देश ने भारतीय जनता पार्टी और खास कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी कमान सौंपी है तो वह स्मृति ईरानी के ऐसे भाषण पर तालियां बजाने या ट्वीट करने के लिए नहीं, वरन उस पर कोई सैद्धांतिक रुख लेने के लिए दी है। अभी सरकार का पहला ही वर्ष पूरा हुआ है कि निराशा का अंधकार लोगों को घेर रहा है क्योंकि देश को लेकर अभी तक सब कुछ जुबानी है। और जब बजट सत्र में प्रधानमंत्री बोले तो उसमें भी ताली बटोरू संवाद ही ज्यादा थे। प्रधानमंत्री की असल मुद्दों पर चुप्पी अब डराती है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में, ‘खामोशी शोर से सुनते थे कि घबराती है, खामोशी शोर मचाने लगे, ये तो हद है’। अब अगर चुप्पी का यह शोर खत्म करने की ईमानदार कोशिश शुरू नहीं हुई, हाशिए पर पड़े जरूरी मुद्दों को मुख्यधारा में लाकर काम न किया गया तो वाकई बहुत देर हो जाएगी। फिर पश्चाताप करने का भी कोई फायदा नहीं रह जाएगा।

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