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प्रेम और विरह से संजोई नृत्य कथा

ओडिशी नृत्यांगना रंजना गौहर ने पिछले दिनों नई नृत्य रचना नल-दमयंती पेश की। उत्सव की ओर से आयोजित इस नृत्य समारोह को कई कलाकारों ने पेश किया।

Author नई दिल्ली | April 8, 2016 4:19 AM
(File Photo)

ओडिशी नृत्यांगना रंजना गौहर ने पिछले दिनों नई नृत्य रचना नल-दमयंती पेश की। उत्सव की ओर से आयोजित इस नृत्य समारोह को कई कलाकारों ने पेश किया। कमानी सभागार में नल-दमयंती पेश किया गया। इसे पेश करने के लिए ओडिशी व छऊ नृत्य शैली का समागम किया गया था। कोरियोग्राफी रंजना गौहर की थी पर छऊ नृत्य का संयोजन राकेश साई बाबू ने किया था। इसके साथ एनिमेशन, संवाद और प्रभावकारी संगीत का प्रयोग किया गया था। इस प्रस्तुति का संगीत आचार्य बंकीम सेठी ने सृजित किया था। जबकि, स्क्रिप्ट की रचना सिद्धार्थ डेनियल्स ने की थी। संवादों को आवेरी चौरे, पुर्णेंदु भट्टाचार्य और शोमिक रे ने अपने-अपने स्वरों में ढाला था। कुल मिलाकर यह एक समेकित प्रयास था।

नल दमयंती की कहानी महाभारत में वर्णित है। इस कहानी को एक संत धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाते हैं। राजा नल दयालु, उदार और प्रजा पालक थे। उनके अच्छे स्वभाव से प्रभावित होकर हंस उन्हें विदर्भ की राजकुमारी दमयंती के बारे में बताता है। वह हंस अपने प्रयासों से राजा नल और राजकुमारी दमयंती को एक-दूसरे के प्रति प्रेम करने के लिए प्रेरित करता है। उसी दौरान विदर्भ में दमयंती का स्वयंवर आयोजित होता है, जिसमें नल का चुनाव दमयंती करती हैं। दोनों विवाह बंधन में बंध जाते हैं। उनके सुख को देखकर नल के चचेरे भाई पुष्कर को ईष्या होती है। वह द्युत क्रीड़ा के लिए राजा नल को बुलाता है। इस खेल में राजा नल हार जाते हैं।

उन्हें तीन साल के लिए राज्य से निष्कासित कर दिया जाता है। दमयंती के पिता को अपनी बेटी के दुखी होने का समाचार मिलता है, तो वह उसकी दूसरी शादी करने के बारे में घोषणा करते हैं। इस समाचार को हंस जंगल में रह रहे नल को बताता है। राजा नल विदर्भ आकर दमयंती से मिलते हैं। फिर अपने मित्र सैनिकों की मदद से अपने राज्य को फिर जीत लेते हैं।

कई दृश्यों के माध्यम से संजोई गई प्रस्तुति का आरंभ सामूहिक नृत्य से होता है। इसमें एक तरफ नृत्यांगनाएं और दूसरी तरफ नर्तकों का समूह हंस के रूप में पद, अंग, हस्त संचालन पेश करता है। नल और हंस व दमयंती व हंस के संवाद और पार्श्व संगीत के जरिए कथा को विस्तार दिया गया। ओडिशी व छऊ नृत्य की शुद्ध तकनीकी पक्ष को कलाकार सामूहिक रूप से पेश करते हैं। नल और दमयंती की भूमिका में नर्तक व नर्तकी ने संचारी भाव और आंगिक अभिनय के जरिए मिलन के दृश्यों को उकेरते हैं। इस अंश में शृंगार रस की प्रधानता थी। द्युत क्रीड़ा के प्रसंग का विवेचन अभिनय और छऊ नृत्य के जरिए किया गया।

वहीं प्रस्तुति के बीच-बीच में कथा को जोड़ने के लिए एनिमेशन का प्रयोग किया गया। नायिका दमयंती या नायक नल के विरह भाव या पीड़ा को और विस्तार दिया जाता तो और अच्छा होता। आधुनिक तकनीक के प्रयोग से प्रस्तुति को अच्छा बनाने की कोशिश की गई। पर एनिमेटेड पात्र बहुत प्रभावकारी नजर नहीं आए। साथ ही, जब ओडिशी या छऊ की तकनीकी बारीकियों की पेशकश के दौरान अगर इन नृत्यों के बोलों का प्रयोग होता तो प्रस्तुति जानदार बन सकती थी। कुल मिला कर नृत्यांगना रंजना गौहर ने एक अच्छा प्रयास किया है।

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