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रंगमंच : समाधि भाई रामसिंह, एकल का समूह बन जाना

आमतौर पर पुरुषों को स्त्री के वेश में नाटक या प्रस्तुति करते देखना बहुत आम है। विभा रानी ने इस नाटक में अपने स्त्रीपन को अलग करके पुरुष पात्र के सहारे कहानी को आगे बढ़ाया है। नाटक में संगीत का प्रयोग न्यूनतम किया है। फिर भी यह संगीत कभी दर्शक के मन को छूता है और कभी परिस्थिति की विद्रुपताओं से रूबरू कराता है।

एक समय था जब धर्म और व्यवसाय को हमसे जोड़ा गया था।

एक झाड़ू और चंद दुपट्टे। आंचल लहरा कर परचम की भी भूमिका अदा कर रहा था। वही लाल दुपट्टा अर्थी बन जाता। वही सफेद होकर समाधि बन जाता। एक हथेली से एक पूरी स्त्री के अस्तित्व का बोध। कम जगह, कम साधन, कम उपकरण और सधा नाटक का बड़ा साध्य। दिल्ली के सफदर स्टूडियो में विभा रानी का एकल नाटक ‘समाधि भाई रामसिंह’ दर्शकों को रंगमंच से अंतरंग अनुभव कराने में कामयाब रहा। एक समय था जब धर्म और व्यवसाय को हमसे जोड़ा गया था। कालांतर में यह हमारे तथाकथित धर्म और हमारी तथाकथित जाति से जोड़ दिया गया और तमाम विसंगतियां इनके नाम पर शुरू हो गर्इं। भीष्म साहनी उन लेखकों में से हैं, जिन्होंने धर्म की इन विसंगतियों पर बहुत लिखा है। धर्म और इसके नाम पर अंधविश्वास, चमत्कार और कुरीतियों को फैलाने वाली इनकी कहानी है ‘समाधि भाई रामसिंह’, जिसपर रंगकर्मियों की कम ही निगाह गई है। विभा रानी ने इसी कहानी को अपने एकल नाटक का आधार बनाया है। एकल नाटक के जरिए विभा रानी ने कम जगह और कम लागत में बेहतर नाटक देने की मुहिम शुरू की है। इसी क्रम में उन्होंने अपनी संस्था अवितोको के साथ अवितोको रूम थिएटर की शुरुआत की है। इस तरह का नाटक आपसी संवाद का माध्यम है।

‘समाधि भाई रामसिंह’ में अदाकारा कहानी कहते हुए अपने पात्रों को जीवित करते हुए दर्शकों से नाटकों के पात्र लेती हैं, उनसे संवाद करती हैं, उनसे अभिनय करवाती हैं और इस तरह से इनका यह एकल नाटक समूह नाटक में बदलता जाता है। समाधि भाई रामसिंह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसे तथाकथित चमत्कार के नाम पर शहर के लोग संत बना देते हैं और वह चमत्कार फलीभूत ना होते देख अंत में उसकी हत्या कर देते हैं और फिर उस हत्या को चमत्कार का जामा पहनाकर उसकी समाधि बना देते हैं। एक सफाई कर्मचारी के माध्यम से यह कहानी चलती है जो विभा रानी की अपनी संकल्पना है।

आमतौर पर पुरुषों को स्त्री के वेश में नाटक या प्रस्तुति करते देखना बहुत आम है। विभा रानी ने इस नाटक में अपने स्त्रीपन को अलग करके पुरुष पात्र के सहारे कहानी को आगे बढ़ाया है। नाटक में संगीत का प्रयोग न्यूनतम किया है। फिर भी यह संगीत कभी दर्शक के मन को छूता है और कभी परिस्थिति की विद्रुपताओं से रूबरू कराता है। प्रकाश व्यवस्था अपने सीमित रूप में सही थी। भाई रामसिंह की हत्या के समय प्रकाश का भयावह रूप से लाल हो जाना और इस लाल रूप से निकलती हुई भोर की लाली नाटक के संप्रेषण को और मजबूत बनाती है। नाटक में प्रकाश देने का काम ‘सोच रंगमंच’ के दो कलाकारों अभिषेक और नीरज ने किया। निर्देशक राजेंद्र जोशी ने नाटक करते समय की कई बारीकियों पर ध्यान दिया।

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