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हमारी याद आएगी: जब हुनर सिर चढ़कर बोलता है

सज्जाद हुसैन फूंक कर बजाने वाले बासुंरी, क्लारनेट ही नहीं, ठोंक कर बजाने वाले जलतरंग जैसे वाद्यों के भी उस्ताद थे। वीणा से लेकर वायलिन तक और सितार से लेकर गिटार तक सहजता से बजाने वाले सज्जाद मेंडोलिन बजाने में मास्टर थे। 1937 में मुंबई आए सज्जाद 30 रुपए महीने में मिनर्वा में काम करते थे। उनके हुनर को देखते हुए वाडिया कंपनी उन्होंने 60 रुपए महीने में अपने यहां ले गई। मगर सज्जाद का हुनर हमेशा उनके सिर चढ़ कर बोला, जिसका खामियाजा उन्हें उठाना पड़ा।

सज्जाद हुसैन।(15 जून 1917-21 जुलाई 1995)

बहुत कम ही फनकार ऐसे होंगे जिन्होंने प्रतिष्ठित कलाकारों की खूब आलोचना की, मगर बदले में उनसे उपेक्षा नहीं सम्मान ही पाया। सज्जाद हुसैन ऐसे ही संगीतकार थे। उन्होंने लता मंगेशकर, तलत महमूद, मदन मोहन, किशोर कुमार आदि के काम की वक्त जरूरत आलोचना की, फिर भी उनके प्रति लोगों का सम्मान कम नहीं हुआ। हालांकि सज्जाद को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा। कभी उन्होंने खुद को लोगों से दूर कर लिया, तो कभी लोगों ने उन्हें अपने से दूर कर दिया। नतीजा यह निकला की फिल्मजगत ने एक बवंडर की तरह उठे सज्जाद को मात्र 14 फिल्मों में कैद कर दिया। ‘रुस्तम सोहराब’ (1963) में ‘ये कैसी अजब दास्तां हो गई है…’ और ‘फिर तुम्हारी याद आई ऐ सनम…’ जैसे मधुर गानों के बावजूद इंडस्ट्री के किसी निर्माता ने दस सालों तक सज्जाद को काम नहीं दिया।

बिंदास और बेधड़क बोलने वाले सज्जाद ने एक गाने की रेकॉर्डिंग के दौरान लता मंगेशकर को ताना मारा था-यह नौशाद (संगीतकार) मियां का गाना नहीं है, आपको मेहनत करनी पड़ेगी। बावजूद इसके सज्जाद को लेकर लता के दिल में हमेशा सम्मान का भाव रहा। दोनों के बीच रिश्ता भी इतना गहरा था कि सज्जाद महीने में एक चक्कर प्रभु कुंज (लता का निवास) का लगा ही देते थे। सज्जाद के 1952 में ‘संगदिल’ के बनाए गाने ‘ये हवा ये रात ये चांदनी…’ की नकल कर जब मदन मोहन ने ‘आखिरी दांव’ (1958) में ‘तुझे क्या सुनाऊं मैं महबूबा..’ बनाया, सज्जाद ने ही उन पर चोरी का इल्जाम लगा दिया। सफाई में मदन मोहन ने कहा कि उन्होंने एक ग्रेट आदमी के गाने की नकल की है, किसी एैरे गैरे की नहीं। यह ताकत सज्जाद की धुनों की और उन सात सुरों की थी, जिनकी मधुरता बेमिसाल थी और जिसमें सज्जाद की आत्मा रच-बस गई थी। वरिष्ठ संगीतकार दिवंगत अनिल बिस्वास ने तो उन्हें हिंदी सिनेमा का एकमात्र मौलिक संगीतकार कहा था, ऐसा संगीतकार जिसे किसी प्रेरणा की जरूरत नहीं पड़ी। यह छोटी बात नहीं थी।

तलत महमूद को ‘गलत महमूद’ और किशोर कुमार को ‘शोर कुमार’ कहने वाले सज्जाद की स्वतंत्र रूप से पहली फिल्म थी ‘दोस्त’ (1944)। इसके निर्देशक थे शौकत हुसैन रिजवी, जो 18 साल की मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहां से दिल लगा बैठे थे। दोनोें की फिल्म ‘खानदान’ (1942) सफलता के झंडे गाड़ चुकी थी। ‘दोस्त’ के संगीत के लिए रिजवी ने मीना कुमारी के पिता मीर अलीबख्श को साइन किया था। उन्होंने कुछेक धुनें बनाई थीं, जो रिजवी को पसंद नहीं आई थी। मेंडोलिन बजाने में मास्टर सज्जाद अलीबख्श के सहायक थे। तो यह काम अलीबख्श ने सज्जाद को सौंप दिया। सज्जाद ने अपनी कुछेक धुनें सुनाई, जिन्हें सुनकर रिजवी के चेहरे पर तो कोई भाव नहीं आया। मगर जब ये धुनें नूरजहां के कानों में पड़ी, तो वे भागी-भागी आईं और सज्जाद की धुनों पर स्वीकृति का ठप्पा लगाया। इस तरह से अलीबख्श फिल्म से निकले और उसके संगीतकार बन गए सज्जाद।

मगर जब ‘दोस्त’ की कामयाबी की वजह रिजवी ने निकाह के बाद अपनी बेगम बन चुकी नूरजहां के गाए गानों को बताया, तो सज्जाद ने फिर कभी रिजवी के साथ काम नहीं किया। पूरे करिअर भर सज्जाद ने यही किया। अपने काम में दखलंदाजी बरदाश्त नहीं करने वाले सज्जाद ने ‘संगदिल’ के बाद कभी दिलीप कुमार के साथ काम नहीं किया, जिन्होंने उनके काम में टांग अड़ाई थी। सज्जाद बिंदास और बेधड़क व्यवहार के कारण ‘मुगले आजम’ के संगीतकार बनने का मौका चूके। एस मुखर्जी जैसे सफल निर्माता की फिल्म में काम करने से इनकार किया। इस रवैये से फिल्मवाले सज्जाद से दूर होते चले गए और उनके पास काम कम होता चला गया। 1977 की ‘आखिरी सजदा’ उनकी आखिरी फिल्म थी।

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