ताज़ा खबर
 

संपादकीयः नोटा के जरिए

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी रहा कि ‘नोटा’ को ध्यान खींचने लायक वोट मिले।

गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों का एक उल्लेखनीय पहलू यह भी रहा कि ‘नोटा’ को ध्यान खींचने लायक वोट मिले। कोई नोटा का विकल्प चुनता है तो उसका अर्थ होता है कि उसे उपर्युक्त उम्मीदवारों में से कोई भी पसंद नहीं है। इस तरह किसी निर्वाचन क्षेत्र में नोटा को पड़े वोट वहां के सारे उम्मीदवारों के प्रति नापसंदगी जाहिर करते हैं। गौरतलब है कि गुजरात में साढ़े पांच लाख मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना। यह संख्या वहां पड़े कुल वैध वोटों का 1.8 फीसद है। अलबत्ता हिमाचल प्रदेश में यह आंकड़ा गुजरात के मुकाबले कम रहा, 0.9 फीसद। पर दोनों राज्यों में नोटा को पड़े वोट बताते हैं कि इन्हें चुनने वालों की संख्या बढ़ रही है। इनकी संख्या की अहमियत का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में विजयी उम्मीदवार और दूसरे स्थान पर आए उम्मीदवार के बीच रहे अंतर से ज्यादा वोट नोटा को पड़े। गुजरात की एक सौ बयासी सीटों में से करीब सौ सीटों पर तीन हजार से ज्यादा और सोलह सीटों पर पांच हजार से ज्यादा मतदाताओं ने नोटा (इनमें से कोई नहीं) का बटन दबाया। 2012 के गुजरात चुनाव के समय नोटा का प्रावधान नहीं था, इसलिए यह देखना संभव नहीं है कि पिछले चुनाव के बरक्स नोटा का विकल्प चुनने वाले घटे हैं या बढ़े हैं। लेकिन यह गौरतलब है कि गुजरात में नोटा को राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी और नवगठित भारतीय ट्राइबल पार्टी से ज्यादा वोट मिले हैं।

फिर, गुजरात के करीब दो दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों में नोटा को जीत के अंतर से अधिक वोट मिले। मसलन, गोधरा में भाजपा उम्मीदवार को केवल 258 वोटों से जीत मिली, जबकि वहां नोटा को 3,050 वोट मिले। ढोलका सीट पर भाजपा उम्मीदवार केवल 327 वोट से जीत सका, जबकि वहां नोटा की झोली में 2,347 वोट आए। जेतपुर सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार को तीन हजार से कुछ अधिक वोटों से जीत मिली, जबकि वहां छह हजार से कुछ अधिक लोगों ने नोटा का विकल्प चुना। ये तथ्य बताते हैं कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो सभी पार्टियों से नाराज हैं। हो सकता है कहीं यह नाराजगी पार्टी से न होकर उम्मीदवारों से ही हो, पर कहीं सब पार्टियों से ही नाराजगी हो सकती है। यह राजनीतिकों से हो रहे मोहभंग का ही इजहार है।

सत्तारूढ़ दल से लोग दुखी हों, तो आमतौर पर विपक्ष को जनादेश देकर अपना आक्रोश प्रकट करते रहे हैं। इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था, सिवाय इसके कि वे वोट देने न जाएं। लेकिन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया कि वह मतदाताओं को ‘इनमें से कोई नहीं’ का विकल्प चुनने यानी सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प भी दे। फिर, इसी के अनुरूप इवीएम में नोटा को भी जगह मिलने लगी और नोटा को पड़े वोटों की गिनती भी होने लगी। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो इसे व्यर्थ की कवायद और नोटा को वोट देना अपना वोट बरबाद करना मानते हैं। यह सही है कि नोटा को कितने भी वोट मिल जाएं, वह पहले नंबर पर ही क्यों न हो, मौजूदा प्रावधानों के तहत वैधानिक रूप से इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। प्रत्याशियों में जो पहले स्थान पर होगा उसे विजयी घोषित कर दिया जाएगा। लेकिन नोटा को पड़े वोट को वोट की बर्बादी नहीं, बल्कि असहमति के इजहार के रूप में देखा जाना चाहिए।

विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच और जो भी फर्क हों, चाल-चलन और चरित्र का फर्क नहीं दिखता। इसलिए नोटा के जरिए सबको नकारने वालों की संख्या बढ़ी है, जैसा कि गुजरात में दिखा है। पर यह संख्या कितनी भी हो जाए, नतीजे पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अगर फर्क पड़े तो नोटा को चुनने वालों की संख्या और बढ़ सकती है। इसलिए यह सुझाव दिया जाता रहा है कि अगर किसी सीट पर नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिलें तो वहां फिर से चुनाव हों, पहले के सभी उम्मीदवारों को एक निश्चित समय तक या कम से कम छह साल तक चुनाव लड़ने के अयोग्य ठहराया जाए। लेकिन समस्या यह है कि इस तरह का कोई प्रावधान संसदीय दलों की आम सहमति के बिना नहीं हो सकता, क्योंकि इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करना पड़ेगा। नोटा का विकल्प दिया जाना वैसे ही राजनीतिक दलों को रास नहीं आया था। फिर, वे कानून में ऐसा संशोधन करने को खुद क्यों तैयार होंगे!

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 संपादकीयः जीत के बावजूद
2 संपादकीयः विचाराधीन की सुध
3 संपादकीयः प्यार की सजा
IPL 2020: LIVE
X