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फिल्म पलटन की समीक्षा: फौजियों की जांबाजी तो दिखी पर नया कुछ भी नहीं

कलाकारों की बात करें तो ‘पलटन’ में केंद्रीय भूमिका कर्नल रॉय (अर्जुन रामपाल) और मेजर बिशन सिंह (सोनू सूद) की है। सेना के आला अधिकारी (जैकी श्रॉफ) की तरफ से रॉय को नाथूला का कमांडिंग अफसर बना कर भेजा जाता है। कर्नल राय इंग्लैंड से प्रशिक्षण लेकर लौटा है।

निर्देशक-जेपी दत्ता, कलाकार- अर्जुन रामपाल, जैकी श्रॉफ, सोनू सूद, लव सिन्हा, हर्षवर्धन राणे, गुरमीत चौधरी।

फौजियों पर फिल्में बनाने के लिए मशहूर निर्देशक जेपी दत्ता अरसे बाद अपनी नई फिल्म ‘पलटन’ के साथ एक बार फिर दर्शकों के सामने हाजिर हैं। दत्ता की 1997 में आई फिल्म ‘बॉर्डर’ बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। बेशक वह एक बेहतरीन फिल्म थी। लेकिन उसके बाद 1999 के करगिल युद्ध पर आधारित उनकी फिल्म ‘एलओसी करगिल’ (2003) दर्शकों को लुभाने में नाकाम रही। ऐसे में उनकी यह नई फिल्म बॉक्स आॅफिस पर कितनी कमाई कर पाती है, यह देखना लाजमी है।

बात करें ‘पलटन’ की तो यह फिल्म 1967 में भारत और चीन के बीच हुई उस लड़ाई पर आधारित है जो सिक्किम के पास नाथूला दर्रे पर हुई थी। इससे पहले 1962 के युद्ध में भारत को चीन के हाथों शिकस्त मिली थी। इस युद्ध के ठीक पांच साल बाद 1967 में चीन ने फिर से भारत पर हमला कर दिया, लेकिन इस लड़ाई में भारतीय सेना की जीत हुई थी। हालांकि इस छोटी सी लड़ाई को युद्ध कहना मुश्किल है, लेकिन जेपी दत्ता ने इस घटना को काफी बड़ा बनाकर पेश किया है। फिल्म जिस ढंग से इस लड़ाई को दिखाती है उससे लगता है कि नाथूला दर्रे पर भारत ने चीन से 1962 की हार का बदला ले लिया था। यहां तक तो सब कुछ ठीक था, लेकिन जेपी दत्ता ने फिल्म में यह भी दिखा दिया कि उस समय भारत-चीन सीमा पर तैनात जो भारतीय सैनिक चीनी फौज से टकरा रहे थे, उन्होंने अपने दिल में भारत को विश्व गुरु बनाने का सपना संजो रखा था। तो जेपी दत्ता जी, अगर सब काम सैनिक ही करेंगे तो भारत के वैज्ञानिक, अध्यापक और इंजीनियर क्या करेंगे? राष्टÑ निर्माण में उनकी भी थोड़ी-बहुत भूमिका होनी चाहिए या नहीं?

कलाकारों की बात करें तो ‘पलटन’ में केंद्रीय भूमिका कर्नल रॉय (अर्जुन रामपाल) और मेजर बिशन सिंह (सोनू सूद) की है। सेना के आला अधिकारी (जैकी श्रॉफ) की तरफ से रॉय को नाथूला का कमांडिंग अफसर बना कर भेजा जाता है। कर्नल राय इंग्लैंड से प्रशिक्षण लेकर लौटा है। वह नाथूला दर्रे पर बाड़ लगाने का काम शुरू कराता है जिसका चीनी सेना विरोध करती है। इसके बाद दोनों तरफ से गोलीबारी शुरू होती है और इसमें आखिरकार भारत को कामयाबी मिलती है, लेकिन कई जाबांज सैनिकों को खोने के बाद। फिल्म इन सैनिकों की बहादुरी दिखाती है और उनके परिवारवालों की भावनाओं को भी।

आजकल की फिल्मों से तुलना की जाए तो ‘पलटन’ का बजट (25 करोड़) काफी कम है। फिल्म में कोई बड़ा स्टार नहीं है और इसकी शूटिंग भी सिर्फ दो जगहों पर हुई है- पंजाब और भारत-चीन सीमा के करीब। इसके अलावा जेपी दत्ता शायद पहले ऐसे निर्देशक होंगे जिन्होंने दिखाया कि सरहद पर सैनिक एक-दूसरे के खिलाफ पत्थरबाजी भी करते हैं। इसके जरिए उन्होंने परदे पर आदिम शैली का युद्ध भी दिखा दिया है। कुल मिलाकर यह फिल्म ‘बॉर्डर’ के आसपास भी नहीं पहुंच पाती है।

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