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आधी आवादीः कष्ट का जिम्मा

बचपन से ही घर के कामकाज लड़कियों से करवाए जाते हैं। खेलने के लिए लड़कों को बंदूक, गेंद दिए जाएंगे और लड़कियों को गुड़िया। इतना ही नहीं ‘नसबंदी’ भी करानी होगी तो पुरुषों की नहीं, महिलाओं की कराई जाती है। इस धरती पर शायद कष्ट झेलने का सारा जिम्मा महिलाओं को ही सौंप दिया जाता है।

Author March 13, 2016 1:39 AM

एक ओर महिला-पुरुष समानता की बात हर तरफ जोर पकड़े हुए है। सवाल उठता है कि जब पुरुष दिवस नहीं मनाया जाता तो फिर महिला दिवस क्यों समाज में प्रारंभ से ही एक बड़ा तबका यथास्थिति को बनाए रखने की पुरजोर वकालत करता रहा है। महिला-पुरुष की बराबरी की बात करने वाला तबका भी शायद उसी भीड़ का हिस्सा है। यही वह तबका है जो एक तरफ तो काली, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी जैसी देवियों की पूजा करता है तो दूसरी ओर बलात्कार जैसे कृत्य को अंजाम देता है और महिला सूचक गालियों को समाज में बनाए रखने में भी कोई कसर नहीं छोड़ता।
लंबे समय तक स्त्री को भोग की वस्तु माना जाता रहा है। महिलाओं को हास्य के केंद्र में आज भी रखा जा रहा है। यही कारण है कि मीडिया में स्त्री देह का प्रयोग अधिकांश रियलिटी शो में लोगों को हंसाने के लिए किया जा रहा है। पुरुषों के आंतरिक वस्त्रों के विज्ञापन के लिए भी महिलाओं का ही प्रयोग किया जा रहा है। व्यंग्य आधारित अधिकांश कार्टून भी महिलाओं पर ही कंद्रित होते हैं, जिसमें स्वर्ग और नरक के फर्क को बताते हुए यहां तक कह दिया जाता है कि स्वर्ग वहीं हैं जहां महिलाएं नहीं हैं। हमारे देश के इतिहास में भी ‘नारी को नरक के द्वार’ के रूप में अंकित किया गया है तो कहीं ‘नारी को ताड़न का अधिकारी’ बताया गया है।
सिर्फ यही नहीं, मीडिया में प्रसारित होने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में स्त्री को स्त्री का दुश्मन दिखाया जाता है। जबकि इतिहास भाई ही भाई का दुश्मन रहा है। हाल में ही प्रसारित होने वाला कार्यक्रम ‘बहू हमारी रजनीकांत’ के विज्ञापन पर गौर करें तो उसमें एक बात को बार-बार दोहराया जाता है कि छत्तीस के छत्तीस गुण हैं बहू के पास, फिर भी खुश नहीं है सास।
इस तरह के वाक्य के माध्यम से अक्सर सास के रूप में महिला को एक खलनायिका के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है, जबकि वास्तविकता इससे हटकर है, जिसे दबाने का प्रयास किया जाता है। भारत में अगर सर्वोच्च पदों की बात करें तो वहां भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व नाम मात्र ही है। ऐसा लगता है कि पितृसत्तात्मक समाज में ऐसा सोचा ही नहीं गया था कि महिलाएं देश के ऊंचे पदों के योग्य होंगी। शायद इसीलिए राष्ट्रपति, कुलपति जैसे शब्द बने, जो कि पुरुषसत्ता के प्रतीक हैं। महिलाओं को विभिन्न संज्ञा से नवाजा जाता है। हमारे समाज में बाप की पगड़ी भी बेटियों के कारण ही उतरती है। कहीं बेटियों को झूठी इज्जत (आॅनर कीलिंग) के नाम पर मार दिया जाता है तो कहीं बहुओं को दहेज के लिए मार दिया जाता है। अगर किसी महिला के साथ बलात्कार भी होता है तो लगातार यही कहा जाता है कि उसकी इज्जत लूट गई, लेकिन जो पुरुष ऐसा करता है उसकी इज्जत जस की तस बनी रहती है। इतना ही नहीं, बलात्कार के लिए महिलाओं के कपड़े और व्यवहार को जिम्मेदार मान लिया जाता है। सिर्फ यही नहीं, बलात्कार पीड़ितों को न्याय के लिए लगातार यातनाओं और संघर्ष का सामना करना पड़ता है, फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिलता। निर्भया कांड के बाद तो यह कानून भी बना था कि अगर कोई पुरुष किसी महिला को घूरता भी है तो वह अपराध के दायरे में आता है, लेकिन देखा जा रहा है कि बलात्कार होने के बावजूद तमाम मामलों में लीपापोती की जाती है। ‘मुरथल’ की घटना को जिस तरह दबाया गया है, वह चिंताजनक है।
बचपन से ही घर के कामकाज लड़कियों से करवाए जाते हैं। खेलने के लिए लड़कों को बंदूक, गेंद दिए जाएंगे और लड़कियों को गुड़िया। इतना ही नहीं ‘नसबंदी’ भी करानी होगी तो पुरुषों की नहीं, महिलाओं की कराई जाती है। इस धरती पर शायद कष्ट झेलने का सारा जिम्मा महिलाओं को ही सौंप दिया जाता है।
पूरी दुनिया में महिलाओं के योगदान, उपलब्धि को दबाने में पितृसत्तात्मक समाज कोई कसर नहीं छोड़ता। इरोम शर्मिला पिछले कई सालों से अनशन पर बैठी हैं, लेकिन मुख्यधारा का मीडिया उन्हें ओझल बनाए रखता है।
तमाम साजिशों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महिलाओं ने एक ऐसा मुकाम हासिल किया है जिसे मिटाया नहीं जा सकता है। आज हर जगह महिलाओं की मौजूदगी इस बात को बखूबी बयान करती है। लेकिन जब तक समाज में महिलाओं के प्रति लोगों का रवैया नहीं बदलेगा तब तक सिर्फ एक दिन महिला दिवस मनाने से क्या फायदा होगा।

अमिता

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