कोरोना को हराने वाले जीन की पहचान

भारतीय मूल के सुमित के चंदा के नेतृत्व में अमेरिकी सैनफोर्ड बर्नहेम प्रीबिस मेडिकल डिस्कवरी इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने मानव जीन के एक ऐसे समूह की पहचान की है, जो कोरोना का कारण बनने वाले सार्स-कोव-2 विषाणु से मुकाबला करने में सक्षम है।

Americaभारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व वाले अमेरिकी शोधकर्ताओं के दल को कोरोना विषाणु (कोविड-19) से मुकाबले की दिशा में बड़ी कामयाबी मिली है। फाइल फोटो।

भारतीय मूल के एक वैज्ञानिक के नेतृत्व वाले अमेरिकी शोधकर्ताओं के दल को कोरोना विषाणु (कोविड-19) से मुकाबले की दिशा में बड़ी कामयाबी मिली है। उन्होंने मानव जीन के एक ऐसे समूह की पहचान की है, जो कोरोना का कारण बनने वाले सार्स-कोव-2 विषाणु से मुकाबला करने में सक्षम माना जा रहा है। इस अध्ययन से न सिर्फ उन कारकों को समझने में मदद मिल सकती है, जो बीमारी की गंभीरता को प्रभावित करते हैं बल्कि उपचार के नए विकल्पों के विकास की राह भी खुल सकती है।

अमेरिका के ‘सैनफोर्ड बर्नहेम प्रीबिस मेडिकल डिस्कवरी इंस्टीट्यूट’ के शोधकर्ताओं की ओर से किए गए इस अध्ययन को ‘मॉलीक्यूलर सेल’ पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर और ‘इम्यूनिटी एंड पैथोजेनेसिस प्रोग्राम’ के निदेशक सुमित के चंद ने कहा, ‘हम सार्स-कोव-2 के प्रति सेलुलर रिस्पांस को अच्छी तरह समझना चाहते थे। इसी कवायद में हमें इस बारे में भी नई जानकारी मिली कि यह वायरस किस तरह मानव कोशिकाओं पर धावा बोलता है।’

चंद और उनकी टीम ने ऐसे इंटरफेरॉन-स्टिम्युलेटेड जीन (आइएसजी) की पहचान की, जो कोरोना संक्रमण को सीमित करने का काम करता है। चंद ने कहा, ‘हमने पाया कि 65 आइएसजी सार्स-कोव-2 संक्रमण को नियंत्रित करते हैं। इनमें से कुछ तो विषाणु को रोकने तक की क्षमता रखते हैं।’

इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता अगले चरण में कोरोना स्वरूप की बायोलॉजी पर गौर करेंगे। कोरोना के नए स्वरूप ज्यादा संक्रामक हो रहे हैं और इसके चलते टीके के असर को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। भारत में कोरोना की दूसरी लहर के लिए विशेषज्ञ विषाणु के नए-नए स्वरूप को अहम वजह मान रहे हैं। नए स्वरूप पर काबू पाने की दिशा में मानव जीन की पहचान वाले शोध को अहम माना जा रहा है।

अभी तक देश के विभिन्न राज्यों में ब्रिटिश, ब्राजील व अफ्रीकी इत्यादि नए स्वरूप के मामले सामने आ चुके हैं। इसे लेकर विभिन्न राज्यों को अलर्ट भेजा जा चुका है। विशेषज्ञों के अनुसार कोरोना का अफ्रीकी स्वरूप अधिक संक्रामक है। यह आरटी पीसीआर से स्क्रीनिंग में पकड़ नहीं आता, जबकि ब्रिटिश स्वरूप की आरटीपीसीआर से स्क्रीनिंग हो रही थी। बाद में पुष्टि के लिए इसकी जीनोम अनुक्रमण कराया जाता था। अब अफ्रीकी स्वरूप समेत दूसरे बदलाव को पकड़ने के लिए सभी प्रमुख केंद्रों के 10 फीसद नमूनों की जीनोम अनुक्रमण शुरू कर दी गई है।

लखनऊ के केजीएमयू में माइक्रोबायोलॉजी की विभागाध्यक्ष प्रो. अमिता जैन के मुताबिक, जीनोम अनुक्रमण तेज करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। जल्द ही यहां भी 10 फीसद नमूनों का अनुक्रमण किया जाएगा। यह जेनेटिक कोड का खाका तैयार करने की एक प्रक्रिया है। इसमें विषाणु के नए स्वरूप की पहचान आसानी से हो जाती है। जानकारों के मुताबिक, कोरोना के नए बदलाव स्पाइक प्रोटीन में बदलाव के कारण अधिक संक्रामक हो जाते हैं। ब्रिटिश, ब्राजील व अफ्रीकी स्वरूप में यह देखा गया है कि अफ्रीकी स्वरूप अन्य की तुलना में अधिक संक्रामक है।

इस दिशा में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) भी शोध कर रहा है। विषाणु में सामान्य तौर पर स्पाइक प्रोटीन में बदलाव होता है। आरटी पीसीआर किट को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि स्पाइक प्रोटीन के अलावा विषाणु के एन जीन या ओआरए-एक जीन की पहचान कर रिपोर्ट तैयार की जा सके। इसलिए अभी इस बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। नए स्वरूप के मामलों में आरटी पीसीआर 67 से 70 फीसद कारगर है। इसलिए लक्षण होने के बावजूद रिपोर्ट नेगेटिव आने पर दोबारा जांच करानी चाहिए।

जानकारों के मुताबिक, यह भी देखा जाना चाहिए कि सभी लैब आरटी पीसीआर जांच में 35 सीटी साइकिल के नियम का पालन कर रही हैं या नहीं। दोबारा भी रिपोर्ट नेगेटिव आए तो सीटी स्कैन से संक्रमण का पता लगाया जा सकता है।

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