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Blog: डेढ़ साल में अपना ही ‘उपदेश’ भूल गए नरेंद्र मोदी

कंज्‍यूमर इंफ्लेशन लगातार पांचवें महीने बढ़ी है और 15 महीनों के सर्वोच्‍च स्‍तर पर है। महंगाई की दर ग्रामीणों इलाकों में 6.‍32 प्रतिशत और दालों में 46 फीसदी है।

Author January 18, 2016 3:58 PM
कंज्‍यूमर इंफ्लेशन लगातार पांचवें महीने बढ़ी है और 15 महीनों के सर्वोच्‍च स्‍तर पर है।

साल 2014 की गर्मियों में देश में एक नारा चला था, ‘बहुत हुई महंगाई की मार, अब की मोदी सरकार।’ अब मैं यह सोचकर हैरान हूं कि दिसंबर 2015 में कंज्‍यूमर इंफ्लेशन के 5.61 प्रतिशत रहने पर वित्‍त मंत्रालय क्‍या सोच रहा है। कंज्‍यूमर इंफ्लेशन लगातार पांचवें महीने बढ़ी है और 15 महीनों के सर्वोच्‍च स्‍तर पर है। महंगाई की दर ग्रामीण इलाकों में 6.‍32 प्रतिशत और दालों में 46 फीसदी है। इसी दौरान वित्‍त मंत्रालय ने महंगाई दर के साल 2016 में 6 प्रतिशत को पार करने का अनुमान लगाया है। साथ ही जीडीपी ग्रोथ रेट को 8.1-8.‍5 से घटाकर 7-7.1 कर दिया है। क्‍या सरकार को नहीं लगता कि ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसानों को बढ़ती महंगाई का सबसे ज्‍यादा खामियाजा भुगतना होगा। ये किसान दो बार सूखे के चलते लगातार चार फसलें गंवा चुके हैं। 5.‍61 प्रतिशत महंगाई कम लगती है कि लेकिन दुनिया का कोई भी अर्थशास्‍त्री बता देगा कि जब दुनिया में भी कीमतें 0-0.‍5 की दर से बढ़ रही है तो यह कितना चिंताजनक है।

सबसे पहले बात करते हैं दालों की। सबको पता है कि दाल कमजोर आमदनी वाले परिवारवालों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत है लेकिन 50 प्रतिशत की महंगाई के चलते यह थाली से दूर हो चुकी है। इससे देखते हुए लोग सोचेंगे कि दालों की कीमतों में बढ़ोत्‍तरी को देखते हुए किसान इसकी खेती करेंगे। लेकिन किसी किसान से पूछिए वह बताएगा कि दाल की खेती कितना जोखिमभरा है सप्‍लाई में असफलता, एमएसपी की घोषणा में देरी और माफिया के चलते दालों की कीमतों में इतनी वृद्धि हुई। सरकारी प्रशासन की उपेक्षा इसी बात से नजर आ जाती है कि दाल बोने वाले छह में से केवल एक किसान को सिंचाई सुविधा का लाभ मिलता है। यूपीए सरकार की मनरेगा और खाद्य सुरक्षा योजना के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की कमाई बढ़ी। इसके चलते लोगों में दाल की मांग बढ़ी लेकिन प्रति व्‍यक्ति दाल की उपलब्‍धता घटी है। जब कांग्रेस ने यह मुद्दा उठाया तो मोदी सरकार ने बयान जारी कर बताया कि 2020 तक देश को दाल में आत्‍मनिर्भर बना दिया जाएगा। इस संबंध में सरकार ने पिछले 18 महीने में क्‍या किया। हमें बेहतर उत्‍पादकता के लिए बेहतर बीज चाहिए।

जिस तरह से प्‍याज के दामों में उछाल देखने को मिला वह तो और भी चौंकाने वाला है। पिछले साल की तुलना में प्‍याज के उत्‍पादन में 2.‍5 प्रतिशत की कमी हुई लेकिन कीमतों में 50 प्रतिशत की बढ़ोत्‍तरी हो गई। इस मुद्दे पर वित्‍त मंत्री ने बताया कि कीमतें कम हुई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों पर काबू पाने में सरकार पूरी तरह से भ्रमित दिखती है। खाद्य मंत्री कहते हैं कि मंत्रालय के पास खाद्य महंगाई जांचने के लिए पर्याप्‍त ताकत नहीं है और वह असहाय है। वहीं वित्‍त मंत्रालय के मंत्री कहते हैं कि जो लोग ऐसी बात कह रहे हैं कि वे शीतकालीन सत्र के दौरान सूखे के मुद्दे पर बहस के दौरान संसद में मौजूद नहीं थे।

चुनावों के दौरान यही सरकार दाल और प्‍याज की कीमतों के लिए बिहार सरकार को दोष देती नजर आई। डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती और पेट्रोल डीजल की कीमतों में कमी से खाद्य महंगाई को रोका जा सकता है। पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री 2014 चुनावों के दौरान यही उपदेश दिया करते थे, अब लगता है कि वे इसे पूरी तरह से भूल चुके हैं। भाजपा अपने चुनावी वादों को भुलने लगी है लेकिन जनता ने इसे सबक सिखाना शुरु कर दिया है। दो महीने पहले वित्‍त मंत्रालय ने कहा कि बंदरगाहों पर जमा दाल के स्‍टॉक को बाजार में उपलब्‍ध कराएगी जिससे कीमतों में कमी आएगी। 1964 में जब देश लगातार सूखे की मार झेल रहा था और गेंहू आयात के लिए उसके पास विदेशी धन भंडार नहीं था तो तत्‍कालीन पीएम लालबहादुर शास्‍त्री ने विदेशों से बीज मंगाए, किसानों को प्रोत्‍साहित किया और देश में हरित क्रांति लाए थे। आज हमें एक बार फिर से किसानों को प्रेरित करने, फसल बीमा के तहत सुरक्षित करने और जमाखोरों पर कार्रवाई करने की जरूरत है।

* लेखक लोकसभा सांसद और कांग्रेस के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता हैं।

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