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राजपाट: सियासी जंग

पार्टी की सांसद रूपा गांगुली ने भी ममता सरकार पर विपक्ष की आवाज दबाने का अपना पुराना आरोप फिर जड़ दिया। ममता ही पीछे क्यों रहतीं? मुख्यमंत्री हैं तो तपाक से दोनों छात्रों की हत्या के पीछे भाजपा का हाथ बता बंद के बहाने सियासी लाभ उठाने की कोशिश का आरोप जड़ लगा दिया।

Author September 29, 2018 3:45 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (फाइल फोटो)

लोकसभा चुनाव तो अगले साल होंगे। पर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा तो कब से चुनावी जंग में कूद चुके हैं। ममता सरकार के विरोध में बंगाल बंद से भाजपा ने अपने तेवर उग्र होने की चेतावनी दी है। बंद के हिंसा में बदलने का तो आज कल चलन बन चुका है। लिहाजा कई जगह सरकारी बसें जलाई गईं और हिंसा भी हुई। इससे पहले बीस सितंबर को उत्तर दिनाजपुर जिले के डारीभीता हाईस्कूल में उर्दू शिक्षकों की बहाली का विरोध कर रहे छात्रों और पुलिस के बीच हुई मुठभेड़ में दो छात्रों की जान गई थी। छात्र कह रहे थे कि उर्दू के नहीं उन्हें विज्ञान और गणित के शिक्षक दो। इन दो छात्रों की मौत के विरोध में ही भाजपा ने पहले तो जिले में 12 घंटे का बंद किया और फिर बंगाल बंद की राह पकड़ ली। पार्टी के सूबेदार दिलीप घोष ने बंद की सफलता का भी दावा कर दिया।

पार्टी की सांसद रूपा गांगुली ने भी ममता सरकार पर विपक्ष की आवाज दबाने का अपना पुराना आरोप फिर जड़ दिया। ममता ही पीछे क्यों रहतीं? मुख्यमंत्री हैं तो तपाक से दोनों छात्रों की हत्या के पीछे भाजपा का हाथ बता बंद के बहाने सियासी लाभ उठाने की कोशिश का आरोप जड़ लगा दिया। हालांकि बंद के दिन ममता इटली में थीं। वहीं जान गर्इं कि बंद विफल है। वाम मोर्चे की सरकार के वक्त अक्सर बंद का आयोजन करने वाली ममता ने फरमाया है कि सूबे के लोगों ने अब बंद की संस्कृति को पूरी तरह नकार दिया है। ममता तो पुलिस से उस कानून के पालन को कह रही हैं जिसमें बंद करने वाले से नुकसान की भरपाई करने का प्रावधान है। उन्होंने यह सवाल अलग दागा है कि मध्यप्रदेश और राजस्थान में किसानों की खुदकुशी व यूपी में मुठभेड़ के नाम पर बेकसूरों की हत्याओं पर क्यों नहीं खुलती भाजपाइयों की जुबान।

जोखिम कम नहीं

बिहार में राजग के लिए लोकसभा सीटों का बंटवारा टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। इस मुद्दे पर भाजपा की बेफिक्री और नीतीश का आश्वस्त चेहरा दिखावटी जंचता है। कई दौर की बातचीत के बावजूद नतीजा अभी अनिश्चय के भंवर में है। रामविलास पासवान की खामोशी और उपेंद्र कुशवाहा का असंतोष अलबत्ता हैरान करता है। पेच 2014 के नतीजों ने फंसा रखा है। जब नीतीश की पार्टी जद (एकी) से ज्यादा सीटें कुशवाहा की रालोसपा ने जीती थी। उधर नीतीश अभी 2009 के दौर से उबर नहीं पा रहे। तब उन्होंने भाजपा को पंद्रह सीटें ही दी थी। खुद 25 सीटों पर उतारे थे जद (एकी) के उम्मीदवार।

बहरहाल कुशवाहा की पीड़ा सीटों की तादाद से ज्यादा यह है कि भाजपा इस खेल में केवल नीतीश को तवज्जो क्यों दे रही है? अपने लिए महज दो सीटों की पेशकश से आपा खो रहे हैं वे। तभी तो जात-पांत का आंकड़ा समझाने पर उतारू हैं कि नीतीश की जात के महज दो फीसद जबकि उनकी जात के दस फीसद मतदाता हैं।भाजपा भी मान कर चल रही है कि नीतीश और कुशवाहा का एक पलड़े में रह पाना आसान नहीं। राजद से भी जुड़े हैं कुशवाहा के तार। रही नीतीश की बात तो उनका दबाव भाजपा के बराबर सीटें पाने का है। भाजपा अभी तो उनके लिए महज 12 सीटें ही देने को तैयार है। ज्यादा देने का जोखिम भी कम नहीं। बहुमत नहीं मिलने की सूरत में अपनी ज्यादा सीटों के बूते पाला भी तो बदल सकते हैं नीतीश।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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