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सीखचों पर सवाल

इंद्राणी मुखर्जी पिछले साढ़े छह साल से जेल में बंद थी और उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है।

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इंद्राणी मुखर्जी (फोटो- फाइल)

सर्वोच्च न्यायालय ने शीना बोरा हत्या मामले में इंद्राणी मुखर्जी को आखिर जमानत दे दी। जमानत मंजूर करते हुए अदालत ने जो टिप्पणी की है, उससे एक बार फिर आपराधिक मामलों में विचाराधीन कैदियों की दशा रेखांकित हुई है। इंद्राणी मुखर्जी पिछले साढ़े छह साल से जेल में बंद थी और उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। उसके स्वास्थ्य को आधार बना कर मुंबई उच्च न्यायालय में जमानत की गुहार लगाई गई थी, मगर वह याचिका खारिज हो गई। उसी को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चूंकि मामला परिस्थितिजन्य सबूतों पर टिका है और लगता नहीं कि जल्दी इस मामले में फैसला हो सकता है, इसलिए इंद्राणी मुखर्जी जमानत की हकदार है। सीबीआइ लगातार यह कहते हुए इंद्राणी की जमानत का विरोध करती रही है कि उसने अपनी सगी बेटी की हत्या की साजिश रची और उसकी हत्या में खुद शामिल थी। यह जघन्यतम अपराध है। ऐसे आरोपियों को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। मगर जिस गति से जांच चल रही है, उसमें यह कह पाना मुश्किल है कि अंतिम फैसला कब तक आ पाएगा। अभी एक सौ पचासी गवाहों की जांच होनी है। पिछले डेढ़ वर्षों में एक भी गवाह की जांच नहीं हो पाई है।

शीना बोरा हत्याकांड चूंकि रसूखदार लोगों से जुड़ा मामला है, इसलिए इसे लेकर काफी समय तक चर्चा होती रही। मगर ऐसे न जाने कितने मामले हैं, जिनमें बहुत सारे लोग सीखचों के पीछे अंतिम फैसला आने का इंतजार कर रहे हैं। उनमें कई ऐसे भी हैं, जो मामले के लिए तय अधिकतम सजा से अधिक जेल में गुजार चुके हैं। कई लोग शारीरिक और दिमागी रूप से बीमार हो चुके हैं। कुछ दिनों पहले सर्वोच्च न्यायालय ने रेखांकित किया था कि विचाराधीन कैदियों के मामले में फैसलों में तेजी लाई जानी चाहिए।

मगर इस दिशा में पहल नजर नहीं आ रही। यह ठीक है कि ऐसे आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को जमानत देने की वकालत नहीं की जा सकती, जो बाहर आकर समाज में गड़बड़ी पैदा या फिर कोई नया जघन्यतम अपराध कर सकते हों। मगर ऐसे लोगों को जमानत देने में क्यों हिचक होनी चाहिए, जिनसे किसी प्रकार का खतरा न हो।

कई बार ऐसा भी देखा गया है कि वर्षों जेल में बंद रहने के बाद अंतिम फैसला आने पर आरोपियों को निर्दोष साबित दे दिया गया। ऐसे अनेक मामले होते हैं, जिनमें परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर पुलिस और जांच एजंसियां लोगों को जेल भिजवाने में कामयाब हो जाती हैं। फिर लंबे समय तक उस मामले से जुड़े साक्ष्यों की जांच चलती रहती है और उनमें से कई मामले गलत सिद्ध हो जाते हैं।

कई कानून ऐसे हैं, जिनमें आरोपी की गिरफ्तारी अनिवार्य है और उनमें जमानत को लेकर काफी कड़ी शर्तें हैं, जिनके चलते अदालतें जमानत देने से हिचकती हैं। मगर कई संगीन अपराधों में ऐसी बाध्यता नहीं है। उनमें आरोपी के आचरण और सामाजिक पृष्ठभूमि आदि को देखते हुए जमानत संबंधी निर्णय लेना कठिन भी नहीं होता। लखीमपुर खीरी मामले के आरोपी आशीष मिश्रा को जमानत इसी आधार पर दी गई थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने लचर जांचों के चलते रद्द कर दिया। अनेक ऐसे लोग जेलों में बंद हैं, जिनके जमानत पर बाहर आने से कोई खतरा नहीं हो सकता। आखिर अंतिम फैसले से पहले ही आरोपी को दोषी की तरह सजा काटने पर क्यों विवश किया जाना चाहिए।

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