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एचआइवी के लिए टीका बनाने की तैयारी

हाल ही में वैज्ञानिकों ने एचआइवी टीके का दक्षिण अफ्रीकी लोगों पर परीक्षण किया है, जिसके नतीजे काफी संतोषजनक हैं। ऐसे में वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि जल्द ही एचआइवी मामले में यूनिवर्सल वैक्सीन को विकसित किया जा सकेगा।

पिछले साल लगभग 1.8 मिलियन लोगों में एचआइवी का पता चला था।

दुनियाभर के शोधकर्ता लंबे समय से एचआइवी उपचार के शोध और एचआइवी टीका को विकसित करने में लगे हैं। लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ खास सफलता नहीं मिली है। वहीं अमेरिकी शोधकर्ताओं ने इस बीमारी से लड़ने के लिए एक टीके के सफल परीक्षण का दावा किया है। अमेरिकी शोधकर्ताओं ने एचआईवी टीका का परीक्षण दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले लोगों पर किया है जिसके नतीजे आश्चर्यजनक रूप से सफल पाए गए हैं।

वाशिंगटन के सिएटल स्थित एचआइवी वैक्सीन ट्रायल नेटवर्क के शोधकतार्ओं ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया। शोधकर्ताओं ने टीके का परीक्षण सबसे पहले थाइलैंड में अमेरिकी सेना पर भी किया। यह परीक्षण 2003 में किया गया था। हालांकि शोधकर्ताओं को इसके मामूली परिणाम ही मिले। इसके बाद टीके का परीक्षण 100 लोगों के समूह पर किया गया। इस परीक्षण में लोगों के शरीर ने काफी अधिक संख्या में प्रतिरक्षा कोशिकाओं का उत्पादन किया जो शरीर एड्स पैदा करने वाले वायरस से लड़ने के लिए उपयोग करता है। इस टीके से शरीर ने 31 फीसद से अधिक दर से एचआइवी एड्स से बचाव और मुकाबला किया। परीक्षण के नतीजों से यह स्पष्ट हुआ है कि टीकाकरण से एचआइवी के एक से अधिक स्ट्रेन से बचा जा सकता है। ऐसे में शोधकर्ताओं ने संभावना जताई है कि इससे एचआइवी के एक सार्वभौमिक टीका को बनाया जा सकता है। बता दें कि परीक्षण में हिस्सा लेने वाले किसी भी वॉलंटियर को पहले से ही एड्स का वायरस नहीं था।

ह्युमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआइवी) एक लेंटिवायरस है, जो शरीर की रोग-प्रतिरक्षा प्रणाली पर प्रहार करता है। इससे शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता कम या नष्ट हो जाती है, जो अक्वायर्ड इम्युनोडेफिशिएंसी सिंड्रोम (एड्स) का कारण बनता है और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। मुख्यत: यौन संबंध तथा रक्त के जरिए फैलने वाला यह विषाणु शरीर की श्वेत रक्त कणिकाओं का नष्ट कर देता है। इसमें उच्च आनुवंशिक परिवर्तनशीलता का गुण है।

शोधकर्ताओं ने 21 वर्ष की औसत आयु वाले लोगों को आरवी 144 नाम की जैब दी और फिर मापा कि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कैसे प्रतिक्रिया करती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि श्वेत रक्त कोशिकाएं जिन्हें सीडी4+टी कोशिकाएं कहा जाता है, उसका उपयोग शरीर एचआइवी से लड़ने के लिए करता है, वे सभी प्रतिभागियों में उम्र या लिंग की परवाह किए बिना काफी बढ़ गए। परीक्षण के दौरान वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि लोगों ने एचआइवी एंटीबॉडी विकसित किए थे। प्रतिरक्षा प्रणाली प्रोटीन विशेष रूप से वायरस से मेल खाते थे, जब उन्हें टीका लगाया गया था। जब शोधकर्ताओं ने थाई रोगियों पर परीक्षणों के परिणामों की तुलना की दक्षिण अफ्रीकी लोगों के परिणामों से की तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि टीका ने दक्षिण अफ्रीकी लोगों पर और भी बेहतर काम किया था। दोनों ही समूहों के लोगों के शरीर में एचआइवी वायरस के कई स्ट्रेन जैसे स्ट्रेन एई, बी और सी के खिलाफ प्रतिरक्षा सुरक्षा विकसित की।

इस शोध का नेतृत्व करने वाले डॉ लैरी कोरी ने कहा ‘यह विचार उस पैटर्न को तोड़ता है कि दुनिया के प्रत्येक क्षेत्र को अपने परिसंचारी उपभेदों के आधार पर एक अलग प्रकार के एचआईवी टीका की आवश्यकता है।’ डॉ लैरी की टीम ने अपने अध्ययन में कहा कि ह्यसामान्य तौर पर, दक्षिण अफ्रीका में क्रॉस (स्ट्रेन)-इम्यून प्रतिक्रियाएं अपेक्षा से अधिक मजबूत थीं। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला कि टीकाकरण से एचआइवी के कई तरह के स्ट्रेन्स से बचा सकता है, इस तरह से वैश्विक टीका तैयार किया जा सकता है। एचआईवी वायरस के प्रसार को रोकने के लिए वैश्विक प्रयासों को बढ़ाने के बावजूद पिछले साल लगभग 1.8 मिलियन लोगों में एचआइवी का पता चला था। ऐसे में इस टीके के सफल परीक्षण से एड्स पीड़ितों में उम्मीद जगेगी।

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