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राजनीतिः रोशनी में छिपा बिजली संकट

बिजली की सामान्य खपत के अलावा उसकी फिजूलखर्ची भी बड़ा मुद्दा है। शहरों और महानगरों में रोशनी में नहाते शॉपिंग मॉल बिजली फूंकने में किसी से कम नहीं हैं। इनमें खर्च होने वाली बिजली की देश के छोटे शहरों, कस्बों, गांवों, खेतों व कारखानों को ज्यादा जरूरत है, जहां बिजली कटौती एक अनवरत समस्या है।

Author सुल्तानपुर | Updated: April 4, 2019 3:00 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

अभिषेक कुमार सिंह

शहरों को सबसे ज्यादा जिन बातों के लिए जाना जाता है उनमें बुनियादी ढांचे, दौड़ता-भागता जीवन, रोजगार के तमाम अवसर और बेइंतहा चमक-दमक है। खासतौर पर चमक-दमक की बात करें तो मेट्रो, सड़कों, पुलों के निर्माण से लेकर दिन-रात चमचमाते दर्जनों शॉपिंग मॉल की बदौलत यह विकास सभी की आंखों में जुगनुओं की तरह टिमटिमाता रहता है। चकाचौंध करने वाला यह विकास हमारी आंखों में सपने जगाता है और हर साल लाखों लोगों को उनके गांव-कस्बों से उखाड़ कर शहरों की ओर खींच लाता है। पर सवाल है कि अनगिनत ख्वाब जगाने वाले हमारे ये शहर आखिर किस कीमत पर इस तरह की रौनक पेश कर रहे हैं। इसका जवाब है- बिजली की अंधाधुंध खपत।

अगर सिर्फ दिल्ली जैसे महानगर की बात करें तो यहां चलने वाली मेट्रो, दिन-रात चमकने वाले शॉपिंग मॉल्स, सड़कों और गलियों में लगीं स्ट्रीट लाइटें, आइपीएल जैसे आयोजनों में एक ही रात में कई मेगावाट बिजली फूंकने के इंतजाम कुल मिला कर यह दृश्य पैदा कर रहे हैं कि एक शहर ही एक बड़े बिजलीघर की सारी बिजली खा जा रहा है। दिल्ली का उदाहरण इसलिए सामयिक और प्रासंगिक है कि बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों के समूह (डिस्कॉम्स) ने हाल में एक आकलन पेश किया है, जिसके मुताबिक इस वर्ष 2019 की गर्मियों में दिल्ली में बिजली की प्रतिदिन की खपत सात हजार चार सौ मेगावाट पहुंच सकती है जो अपने आप में एक रिकॉर्ड होगी। वर्ष 2002 में उच्च मांग वाले दिन में यह मांग अधिकतम 2879 मेगावाट पहुंची थी, उसे देखते हुए लग रहा है कि सत्रह साल के अरसे में इस शहर की बिजली की मांग में करीब ढाई सौ फीसद इजाफा हो चुका है। बिजली की मांग का यह रेकार्ड टूटना बहुत मुमकिन है क्योंकि पिछले साल यानी 2018 के जुलाई में यह सात हजार मेगावाट का आंकड़ा पार कर चुकी है।

इससे पहले आठ जून, 2018 को जब दिल्ली में बिजली की मांग सर्वोच्च स्तर यानी छह हजार नौ सौ चौंतीस मेगावाट पर पहुंची थी, तब कहा गया था कि जल्द ही यहां बिजली की खपत या मांग के कई रिकॉर्ड टूट सकते हैं। यह अंदाजा गलत साबित नहीं हुआ और इस बार भी डिस्कॉम के आकलन के मुताबिक यह मांग प्रतिदिन करीब साढ़े सात हजार मेगावाट तक हो सकती है। विचारणीय पहलू यह है कि हमारे देश में अब ऐसे कई शहर हैं जो अकेले दम पर टिहरी जैसी विशाल विद्युत परियोजना की सारी बिजली फूंक सकते हैं। टिहरी बांध की प्रतिदिन बिजली सप्लाई की क्षमता दो हजार चार सौ मेगावाट बताई जाती है, जिसका अर्थ है कि सिर्फ दिल्ली को जगमगाता रखने के लिए टिहरी जैसे तीन बांधों की जरूरत है।

यह तो स्वाभाविक है कि विकास होगा तो ऊर्जा की खपत भी बढ़ेगी। लेकिन सवाल है कि आखिर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे शहरों में बिजली की मांग में इतनी तेजी से बढ़ोतरी क्यों हो रही है और किन उपायों से बिजली के बेतहाशा खर्च पर काबू पाया जा सकता है या उसकी भरपाई अन्य तौर-तरीकों से हो सकती है। असल में, पश्चिमी आधुनिकता के अंधानुकरण के साथ विकास का जो एक सपना पिछले एक-डेढ़ दशक से हमारे देश में जोरशोर से देखा जा रहा है, वह यह है कि हम जल्द ही कुछ ऐसा करें कि न्यूयार्क, शंघाई और टोक्यो जैसे महानगरों को मात दें और दुनिया को दिखाएं कि आधुनिकता में हमारा कोई सानी नहीं है। विकास की इस होड़ का नतीजा है शहरों में कम जगह में ऊंची इमारतों का अधिक संख्या में बनना और उन्हें ठंडा, साफ-सुथरा व रोशन रखने के लिए बिजली का अंधाधुंध इस्तेमाल करना।

शहरीकरण जो समस्याएं पैदा कर रहा है, उसका एक संदर्भ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूएन-हैबिटेट की साझा रिपोर्ट से मिला था। इसमें बताया गया था कि एअरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर व वॉटर कूलर आदि के इस्तेमाल और कारों के प्रयोग की वजह से शहरी इलाकों के औसत तापमान में एक से तीन डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो जाती है। रिपोर्ट में इस बदलाव को ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ की संज्ञा दी गई। कारों से निकलने वाला धुंआ वातावरण में सिर्फ कार्बन डाई-आॅक्साइड नहीं झोंकता है, बल्कि आसपास का तापमान भी बढ़ाता है। इसी तरह फ्रिज, एसी, वॉटर कूलर का इस्तेमाल करने वालों को ठंडी हवा और पानी तो अवश्य मिल जाता है, लेकिन ये उपकरण अपने आसपास के माहौल में बेतहाशा गर्मी झोंकते हैं जो मई-जून जैसे गर्म महीनों में शहरों को और ज्यादा गर्म कर देते हैं।

बिजली की सामान्य खपत के अलावा उसकी फिजूलखर्ची भी बड़ा मुद्दा है। शहरों और महानगरों में रोशनी में नहाते शॉपिंग मॉल बिजली फूंकने में किसी से कम नहीं हैं। इनमें खर्च होने वाली बिजली की देश के छोटे शहरों, कस्बों, गांवों और खेतों व कारखानों को ज्यादा जरूरत है, जहां बिजली कटौती एक अनवरत समस्या है। मॉल में बिजली के इस्तेमाल की तीन प्रमुख वजहें हैं। एक, वहां ज्यादा से ज्यादा लोगों की आमदरफ्त, मॉल खुले रहने की अवधि और उस कारोबार की प्रकृति, जो वहां होता है। शॉपिंग मॉल किसी आम इमारत के मुकाबले कितनी अधिक बिजली खाते हैं, इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संस्था- ग्रीनपीस ने 2013 में चीन में एक तुलनात्मक अध्ययन किया था। इसमें दो सौ छत्तीस व्यावसायिक इमारतों में बिजली की खपत की तुलना की गई और पाया कि एक औसत शॉपिंग मॉल में बिजली की खपत प्रति घंटे छह सौ अट्ठावन किलोवॉट प्रति वर्गमीटर के दायरे में होती है। यह खपत चीन के ताई-कोकत्सुई नामक शहर में स्थित ओलंपियन सिटी वन में इस्तेमाल होने वाली बिजली के मुकाबले तेरह गुना अधिक थी।

छोटी-मोटी दुकानों और घरों से तुलना करने पर तो शॉपिंग मॉल में बिजली की खपत सैकड़ों से हजारों गुना अधिक पाई गई। औसत यह है कि तीन सौ मेगावाट बिजली उत्पादन करने वाले प्लांट की सारी बिजली एक बड़े शॉपिंग मॉल में ही खर्च हो जाती है। कोई संदेह नहीं कि शॉपिंग मॉल के कारण बिजली खपत का ऐसा ही असंतुलन अपने देश में भी पैदा हो चुका है। शहरी-नियोजन से जुड़े मशहूर विचारक लियॉन क्रेअर ने कहा था कि एक दिन दुनिया में ऐसा आएगा, जब न तो बिजली पैदा करने के लिए हमारे पास यूरेनियम और कोयला होगा और न वाहनों के लिए तेल, तब ऐसे में शहरी इलाकों की लिफ्टें बंद हो जाएंगी।

इन सारी दिक्कतों का हल नीतियों में बदलाव और एक इंसान की आम सहनशक्ति में छिपा है, जिसका दर्शन शहरों में जरा कम ही होता है। थोड़ी गर्मी बर्दाश्त कर लेना, एसी की जगह कूलर से काम चला लेना, फ्रिज या वॉटर कूलर की बजाय घड़े-सुराही की शरण में जाना पिछड़ेपन की निशानी नहीं है, बल्कि इससे हम खुद को अपने आसपास के वातावरण का ख्याल रखने वाले आधुनिक सोच का इंसान साबित कर सकते हैं। नीतियों में बदलाव के कुछ उदाहरण कनाडा, अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों ने पेश किए हैं। टोरंटो दुनिया का पहला शहर है जिसने एक खास ऊंचाई वाली सभी इमारतों में हरित छतों (ग्रीन रूफ) का निर्माण अनिवार्य कर दिया है। लॉस एंजिलिस में सभी इमारतों की छतों की हल्के रंगों में पुताई-रंगाई जरूरी कर दी है, जिससे वे गर्मी न सोखें। पेरिस ने एक कानून पारित कर हरित छतों के साथ-साथ इमारतों की छतों पर सोलर पैनल लगाना अनिवार्य कर दिया है। ये सबक भारत के शहरों को भी लेने चाहिए, ताकि तेजी से होता शहरीकरण अपने साथ-साथ वैसी बर्बादी न लाए जिसे वक्त रहते रोका जा सकता था।

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