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राजनीतिः धरती बचाने की चुनौती

पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने और कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कंक्रीट के जंगलों के विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर नियंत्रण की जरूरत है। जंगल और वृक्षों का दायरा बढ़ाना होगा। पेड़ और हरियाली ही धरती पर जीवन के मूलाधार हैं। वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है। धरती पर प्राणवायु ऑक्सीजन से लेकर जरूरी भोजन इसी से मिलता है।

प्रतीकात्मक तस्वीर

बढ़ते प्रदूषण को लेकर बढ़ रही वैश्विक चिंता के बीच यह खुलासा और भी परेशान करने वाला है कि इस वर्ष कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में और तेजी आ सकती है। ब्रिटेन में मौसम विभाग के कार्यालय और एक्जेटर विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने पाया है कि हवाई स्थित मोनालोआ वेधशाला में वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता में 1958 से अब तक तीस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इसका मुख्य कारण जीवाश्म ईधनों, वनों की कटाई और सीमेंट उत्पादन है। शोधकर्ताओं का कहना है कि इस साल कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन अधिक होगा। अगर ऐसा हुआ तो फिर 2019 अब तक का सबसे गर्म साल रहेगा। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 में धरती का तापमान 1880 के बाद से अब तक का चौथा सबसे गर्म तापमान रहा। नासा के गोडार्ड इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस स्टडीज के मुताबिक 2018 में वैश्विक तापमान 1951 से 1980 के औसत तापमान से 0.83 डिग्री सेल्सियस ज्यादा था। इस स्थिति के लिए काफी हद तक कार्बन डाइआॅक्साइड का उत्सर्जन ही जिम्मेदार है।

अब तक वायुमंडल में छत्तीस लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड की वृद्धि हो चुकी है और चौबीस लाख टन ऑक्सीजन समाप्त हो चुकी है। अगर यही स्थिति रही तो 2050 तक पृथ्वी का तापमान चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाएगा। वैज्ञानिकों की मानें तो बढ़ते तापमान के लिए मुख्यत: ग्लोबल वार्मिंग ही जिम्मेदार है और इससे निपटने की त्वरित कोशिश नहीं हुई तो आने वाली सदियों में धरती खौलते कुंड में बदलने लगेगी। औसत वैश्विक तापमान पिछले सवा सौ सालों में अपने उच्चतम स्तर पर है। औद्योगीकरण की शुरुआत से लेकर अब तक तापमान में 1.25 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। आंकड़ों के मुताबिक आधी सदी से हर दशक में तापमान में 0.18 डिग्री सेल्सियस का इजाफा हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी की सतह के औसत तापमान में 1.1 से 2.9 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होने की आशंका है।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वायु में मौजूद ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के अनुपात पर एक शोध में पाया है कि बढ़ते तापमान के कारण वातावरण से आॅक्सीजन की मात्रा तेजी से कम हो रही है। पिछले आठ सालों में इसमें काफी गिरावट आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है उस पर काबू नहीं पाया गया तो अगली सदी में तापमान साठ डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर पृथ्वी के तापमान में मात्र 3.6 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि होती है तो आर्कटिक के साथ-साथ अंटार्कटिका के विशाल हिमखंड पिघल जाएंगे। देखा भी जा रहा है कि बढ़ते तापमान के कारण उत्तरी व दक्षिणी ध्रुव की बर्फ चिंताजनक रुप से पिघल रही है।

अगर बर्फ का पिघलना थमा नहीं तो आने वाले वर्षों में न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलिस, पेरिस और लंदन, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पणजी, विशाखापत्तनम, कोचीन और त्रिवेंद्रम जैसे दुनिया के कई तटीय शहर समुद्र में समाने लगेंगे। साल 2007 की इंटर-गवर्नमेंटल पैनल की रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते तापमान के कारण दुनिया भर के करीब तीस पर्वतीय ग्लेशियरों की मोटाई अब आधे मीटर से कम रह गई है। हिमालय क्षेत्र में पिछले पांच दशकों में माउंट एवरेस्ट के ग्लेशियर दो से पांच किलोमीटर सिकुड़ गए हैं। छिहत्तर फीसद ग्लेशियर चिंताजनक गति से सिकुड़ रहे हैं। कश्मीर और नेपाल के बीच गंगोत्री ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहा है। अनुमानित भूमंडलीय ताप से जीवों का भौगोलिक वितरण भी प्रभावित हो सकता है। कई प्रजातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो जाएंगी। पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर के समाप्त होने का कारण भूमंडलीय ताप ही था।

पर्यावरणविदों की मानें तो बढ़ते तापमान के लिए मुख्यत: ग्रीन हाउस गैस, वनों की कटाई और जीवाश्म ईधन का दहन बड़े कारण हैं। तापमान में कमी तभी आएगी जब वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कमी होगी। आंकड़ों पर गौर करें तो 2000 से 2010 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन की दर तीन फीसद सालाना रही, जबकि भारत के कार्बन उत्सर्जन में यह वृद्धि पांच फीसद रही। यानी 2014 की तुलना में 2015 में भारत ने पांच फीसद से ज्यादा कार्बन उत्सर्जित किया। कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक कोयला जिम्मेदार है। हालांकि अमेरिका और चीन ने कोयले पर अपनी निर्भरता काफी कम कर दी है। इसके स्थान पर तेल और गैस का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन भारत की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज भी कोयले पर निर्भर है। अच्छी बात यह है कि भारत ने पेरिस जलवायु समझौते को अंगीकार करने के बाद क्योटो प्रोटोकाल के दूसरे लक्ष्य को अंगीकार करने की मंजूरी दे दी है। इसके तहत देशों को 1990 की तुलना में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को अठारह फीसद तक घटाना होगा।

भारत के इस कदम से अन्य देश भी आगे आएंगे। उद्योगों से निकलने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए 11 दिसंबर, 1997 को जापान के क्योटो शहर में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में एक सौ बानवे देशों के बीच यह संधि हुई। 16 फरवरी, 2005 को यह प्रभावी हुई। विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को लक्ष्य पूरा करने के लिए आर्थिक और तकनीकी मदद उपलब्ध कराना भी इसका हिस्सा है। संधि का पहला लक्ष्य 2008-12 के लिए तय हुआ था। इसमें औद्योगिक अर्थव्यवस्था वाले बावन देशों ने चार ग्रीन हाउस गैसों (कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड) का उत्सर्जन 1990 की तुलना में पांच फीसद तक घटाने का लक्ष्य रखा था। अन्य देशों ने भी इसके लिए अपने-अपने लक्ष्य रखे थे। पेरिस जलवायु समझौते पर भी भारत ने दुनिया को राह दिखाई है। सन 2020 से कार्बन उत्सर्जन को घटाने संबंधित प्रयास शुरू करने के लिए दिसंबर, 2015 को यह संधि हुई थी। इस पर एक सौ बानवे देशों ने हस्ताक्षर किए और अब तक भारत सहित एक सौ छब्बीस देश इसे अंगीकार कर चुके हैं।

पृथ्वी के तापमान को स्थिर रखने और कार्बन उत्सर्जन के प्रभाव को कम करने के लिए कंक्रीट के जंगलों का विस्तार और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर नियंत्रण की जरूरत है। जंगल और वृक्षों का दायरा बढ़ाना होगा। पेड़ और हरियाली ही धरती पर जीवन के मूलाधार हैं। वनों को धरती का फेफड़ा कहा जाता है। धरती पर प्राणवायु आॅक्सीजन से लेकर जरूरी भोजन इसी से मिलता है। वृक्षों और जंगलों का विस्तार होने से धरती के तापमान में कमी आएगी। लेकिन विडंबना है कि वृक्षों और जंगलों का ध्यान नहीं रखा जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट (जीएफआरए) रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। प्राकृतिक वन क्षेत्र में कुल वैश्विक क्षेत्र की दोगुनी अर्थात छह फीसद की कमी आई है। उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक दस फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। वनों के विनाश से वातावरण जहरीला हुआ है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआॅक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। बेहतर होगा कि वैश्विक समुदाय बढ़ते तापमान से निपटने के लिए कार्बन डाईआॅक्साइड के उत्सर्जन पर नियंत्रण का कोई ठोस प्रभावी उपाय खोजे।

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