PM Narendra Modi' s 'raincoat' comment a satire on Manmohan Singh - Jansatta
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संपादकीयः बिगड़े बोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को राज्यसभा में मनमोहन सिंह के बारे में जो कहा उसे लेकर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। मनमोहन सिंह की बाबत ‘रेनकोट’ वाली मोदी की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस का आहत होना स्वाभाविक है।

Author February 11, 2017 2:11 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। ( Photo Source: Indian Express/File)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को राज्यसभा में मनमोहन सिंह के बारे में जो कहा उसे लेकर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। मनमोहन सिंह की बाबत ‘रेनकोट’ वाली मोदी की टिप्पणी को लेकर कांग्रेस का आहत होना स्वाभाविक है। यह तर्क भी अपनी जगह सही है कि प्रधानमंत्री को एक पूर्व प्रधानमंत्री के बारे में ऐसा कुछ नहीं कहना चाहिए जो अशोभन या असम्मानजनक लगे। लेकिन कांग्रेस इस मामले को जिस हद तक तूल देना चाहती है उसका कोई औचित्य नहीं दिखता। कांग्रेस पहले तो इस बात पर अड़ी रही कि प्रधानमंत्री माफी मांगें। यह अपेक्षा पूरी नहीं हुई तो उसने अपना रुख और कड़ा कर लिया है। उसने संसद में प्रधानमंत्री का बहिष्कार करने की घोषणा कर दी है। यानी जब बजट सत्र का शेष हिस्सा नौ मार्च से शुरू होगा तो संसद का कामकाज सुचारु रूप से शायद ही चल पाए। इस मसले पर पहले ही संसद के दोनों सदनों में हंगामा हो चुका है। फिर बजट सत्र से पहले, संसद का एक पूरा सत्र नोटबंदी पर सत्तापक्ष और विपक्ष की रस्साकशी की भेंट चढ़ गया था।

कांग्रेस का दावा है कि मोदी की विवादित टिप्पणी को लेकर वाम दलों और सपा, जद (एकी) समेत अनेक विपक्षी दलों से उसने बात की है। ये पार्टियां भी अपनी नाराजगी जता चुकी हैं। अलबत्ता फिलहाल यह साफ नहीं है कि संसद में प्रधानमंत्री का बहिष्कार करने के कांग्रेस के निर्णय पर बाकी विपक्षी दलों का क्या रुख होगा। अगर वे भी कथित बहिष्कार में शामिल होंगे, तो यह न संसदीय जिम्मेदारी के अनुरूप होगा न रणनीतिक रूप से कोई कारगर कदम साबित हो पाएगा। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री का पद शीर्ष पर है। लेकिन प्रधानमंत्री एक राजनीतिक व्यक्ति भी होता है, जैसे कि मुख्यमंत्री भी होते हैं। इसलिए जब प्रधानमंत्री की आलोचना की जाती है, जो कि अक्सर होती रहती है, तो उसे असामान्य नहीं समझा जाता, न समझा जाना चाहिए। इसी तरह पूर्व प्रधानमंत्री भी राजनीतिक व्यक्ति होता है, तो उसकीआलोचना क्यों नहीं हो सकती! फिर, अगर अतीत में एक दूसरे के बारे में की गई टिप्पणियों और आपत्तिजनक बयानों पर घेरेबंदी का क्रम चलेगा तो इस सिलसिले का कहीं अंत नहीं होगा। जहां तक मोदी के अंदाज और लहजे की बात है, तो उसे लेकर शिकायत वाजिब हो सकती है, मगर क्या उस पर विरोध जताने के लिए बजट सत्र के बचे हुए हिस्से की बलि चढ़ाई जानी चाहिए? क्या प्रधानमंत्री जब संसद में आएं तो विपक्ष का बाहर चले जाना ठीक रहेगा?

राज्यसभा में तो विपक्ष का ही बहुमत है। अगर वहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी विपक्ष की गैर-हाजिरी का सबब बन जाएगी, तो इससे विपक्ष को सुकून मिलेगा या सत्तापक्ष को? लेकिन कांग्रेस के एतराज और तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद अब जिस तरह मोदी ने मोर्चा खोला है वह भी बिल्कुल बेतुका और अफसोसनाक है। शुक्रवार को हरिद्वार में एक रैली में भाषण में उन्होंने कांग्रेस के नेताओं को चेताया कि जुबान संभाल कर बात करें, वरना सबकी कुंडली उनके पास है। ऐसे धमकी भरे अंदाज में बोलना प्रधानमंत्री पद की गरिमा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। अगर सरकार के पास किसी के भ्रष्टाचार का रिकार्ड है, तो जांच और आगे की कार्यवाही जरूर करनी चाहिए। लेकिन सरकार की शक्तियों से डर कर विपक्ष अपना मुंह बंद रखे, यह संदेश देना डराने का प्रयास नहीं तो और क्या कहा जाएगा? सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी कानूनों को निष्पक्ष ढंग से लागू करने की होती है, न कि चुनिंदा तरीके से।

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