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विश्लेषण : ‘स्टार’ बन सकते हैं और भी खिलाड़ी

कहते हैं कि महेंद्र सिंह धोनी को अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव बताने के लिए 80 करोड़ रुपए दिए गए। मिल्खा सिंह ने अपनी जीवनी एक रुपए में बेच दी थी और मेरी कॉम ने कोई सौदेबाजी नहीं की थी। फिर भी बाकी दोनों फिल्मों की लागत पचास-साठ करोड़ को पार कर गई। धोनी पर फिल्म से पहले भारत रत्न सचिन तेंदुलकर पर बनी डाक्यूड्रामा फिल्म को एक साथ दो हजार से ज्यादा स्क्रीन पर रिलीज किया गया। सचिन ने अपने जीवन के बारे में खास जानकारी देने और जरूरी दृश्यों के लिए कैमरे का सामना करने पर सहमति कितना मेहनताना लेकर जताई, इसका पता नहीं चल पाया। लंदन में रहने वाले जेम्स इर्सकिन ने फिल्म का निर्देशन किया। फिल्म फीचर-वृत्त शैली का मिला जुला रूप थी।

Author June 8, 2018 4:14 AM
खेल सितारों की जीवन यात्रा फिल्म निर्माताओं को काफी लुभा रही है। हालांकि ज्यादा चर्चा सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी व मोहम्मद अजहरुद्दीन पर भव्यता से बनी फिल्मों की ही हुई।

श्रीशचंद्र मिश्र

खेल सितारों की जीवन यात्रा फिल्म निर्माताओं को काफी लुभा रही है। हालांकि ज्यादा चर्चा सचिन तेंदुलकर, महेंद्र सिंह धोनी व मोहम्मद अजहरुद्दीन पर भव्यता से बनी फिल्मों की ही हुई। तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ ने याद दिला दिया था कि भरपेट खाना मिलने की आस में सेना में भर्ती हुए पान सिंह एथलीट बने तो इसलिए कि उसमें खानपान की अतिरिक्त सुविधा मिल रही थी। खिलाड़ियों पर फिल्म सफल भी हो सकती है, यह पान सिंह तोमर के सैंपल टैस्ट से साफ हो गया। धूलिया ने तथ्य जुटाने और कथ्य को विश्वसनीय बनाने में जितनी मेहनत की थी, उतनी कोई और फिल्मकार दिखाता तो पान सिंह जैसे कई भूले-बिसरे खिलाड़ी फिल्म का हिस्सा बन जाते। एथलीट मिल्खा सिंह और मुक्केबाज मेरी कॉम पर बनी फिल्मों ने एक अलग रेखा खींची। यह पहला मौका था जब जीवित एवं सक्रिय खिलाड़ियों की शौर्यगाथा को फिल्म की विषय वस्तु बनाया गया। तिग्मांशु धूलिया ने जो जड़ता तोड़ी थी उसे राकेश ओम प्रकाश मेहरा व संजय लीला भंसाली ने नई व भव्य शक्ल दी। दोनों की समर्थ और संवेदनशील फिल्मकार की पहचान रही है। इस नाते उन्होंने इन दोनों फिल्मों को विरुपित नहीं होने दिया। इन दोनों फिल्मों को बॉक्स आफिस पर मिली सफलता ने करीब एक दर्जन खिलाड़ियों को फिल्म का विषय बना दिया है। आगे चलकर तीन क्रिकेटरों पर तो फिल्में उस अंदाज व भव्यता से बनीं जो कुछ समय पहले तक खान त्रिमूर्ति के लिए आरक्षित थीं।

इमरान हाशमी ने फिल्म ‘जन्नत’ में क्रिकेट फिक्सर की भूमिका की थी। उन्होंने वे इंटरनेशनल स्पोर्ट्स कंपनी से संपर्क कर क्रिकेट का प्रशिक्षण लिया। खेल को समझने के लिए वे भारत व आस्ट्रेलिया के बीच सिडनी में हुए टैस्ट मैच को देखने गए और पूर्व क्रिकेटर व सांसद मोहम्मद अजहरुद्दीन के बेटे असदुद्दीन से उनके पिता की स्टाइल समझी तो अजहरुद्दीन की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘अजहर’ को विश्वसनीय बनाने के लिए इमरान हाशमी ने यह सारी मशक्कत इसलिए की क्योंकि मोहम्मद अजहरुद्दीन पर बनने वाली फिल्म की शूटिंग शुरू होने से पहले वे व्यक्तित्व और खेल शैली में अजहर जैसा दिखना चाहते थे। योजना और भी खिलाड़ियों पर फिल्म बनाने की है। माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल सिंह का फिल्मी अवतार कंगना रानौत ओढ़ेंगी। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद पर फिल्म बनाने का प्रोजेक्ट दो साल से लटका पड़ा। साइना नेहवाल व सानिया मिर्जा पर फिल्म शुरू होने में अड़चन यह है कि दोनों दीपिका पादुकोण को अपनी छवि साकार करने के लिए ज्यादा उपयुक्त मानती हैं। पंद्रह हजार हिंदी फिल्में बनीं लेकिन खालिस खेल पर केंद्रित फिल्मों की संख्या उंगलियों पर गिनने लायक भी नहीं हैं। ऐसी दर्जनों फिल्में जरूर रहीं हैं जिनमें खेल का थोड़ा बहुत दखल रहा है। प्रकाश झा की फिल्म हिप-हिप हुर्रे में इस दिशा में थोड़ी गंभीर पहल की गई थी। इसमें फुटबाल के जरिए छात्रों को अनुशासित किया गया था। देव आनंद ने ‘अव्वल नंबर’ में मैच फिक्सिंग की वह परिकल्पना कर ली थी जिसके बारे में तब तक विश्व क्रिकेट अनजाना था। गौतम गुहा के निर्देशन में बनी बाक्सर और अनिल शर्मा निर्देशित अपने में मुक्केबाजी को कथानक के केंद्र में रख कर कुछ नाटकीयता लाने की कोशिश की गई।

यश चोपड़ा की फिल्म ‘चक दे इंडिया’ इस मायने में खेलों पर बनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म कही जा सकती है कि उसने हॉकी वह भी महिला हॉकी को अनुशासन और एकता को बढ़ावा देने का आधार बनाया। हैट्रिक, स्टंप्ड, जन्नत, पटियाला हाउस आदि फिल्मों में क्रिकेट के अलग-अलग रूप रंग दिखाए गए। दनादन गोल में फुटबाल और स्पीडी सिंह में आइस हाकी का छौंक रहा। अब देखना यह है कि क्या कुछ और कालजयी खिलाड़ियों पर फिल्म बनाने की शुरुआत होती है या नहीं? निर्माताओं की आमतौर पर शिकायत रहती है कि खिलाड़ियों के जीवन में नाटकीय उतार-चढ़ाव कम होने की वजह से उन पर फिल्म बनाना संभव नहीं हो पाता। समस्या यह है कि कोई फिल्मकार खिलाड़ी की जीवन यात्रा का ब्योरा जुटाने के मुश्किल काम में उलझना नहीं चाहता। मिल्खा सिंह सबको याद हैं। ध्यानचंद को याद कर लिया जाता है लेकिन ऐसे अनेक खिलाड़ी हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में सिर्फ अपनी लगन से नाम कमाया लेकिन खेलों से अलग होते ही वे गुमनाम हो गए। तलाश की जाए तो ऐसे ढेरों खिलाड़ी मिल जाएंगे जिनकी संघर्ष गाथा पर भावना प्रधान फिल्म बनाई जा सके।

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