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आतंक को शह

जब भी भारत अपनी सीमा में आतंकवाद की समस्या की जटिलता के लिए पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करता है तब वह इसे महज आरोपों का खेल बता कर खारिज कर देता है।

सांकेतिक फोटो।

जब भी भारत अपनी सीमा में आतंकवाद की समस्या की जटिलता के लिए पाकिस्तान को कठघरे में खड़ा करता है तब वह इसे महज आरोपों का खेल बता कर खारिज कर देता है। लेकिन आए दिन इस बात के सबूत मिलते रहते हैं कि आतंकवादियों को शह और संरक्षण देने के मामले में पाकिस्तान ने वैश्विक स्तर पर दी गई चेतावनियों को लगातार नजरअंदाज किया है। अब पाकिस्तान के सामने मुश्किल यह हो गई है कि वह भारत को तो पूर्वाग्रह से प्रेरित बता कर दुनिया के देशों को भ्रमित करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन जब अमेरिका सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसी समस्या के लिए उससे जवाब मांगते हैं तब वह बगलें झांकने लगता है। हर ऐसे मौके पर वह इस दिशा में ठोस कार्रवाई करने का आश्वासन जारी करता है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ऐसा कदम नहीं उठाता, जो समस्या की जटिलता को कम करे। यह बेवजह नहीं है कि अपनी इस आदत के लिए वह अंतरराष्ट्रीय मंचों और दूसरे देशों से फटकार और हिदायतें सुनता रहता है। ताजा घटनाक्रम में अमेरिका ने साफ शब्दों में पाकिस्तान से कहा है कि वह आतंकवाद के वित्तपोषण की जांच और संयुक्त राष्ट्र की ओर से चिह्नित किए गए आतंकवादी संगठनों के सरगना और कमांडरों के खिलाफ मुकदमा चला कर वित्तीय कार्रवाई बल यानी एफएटीएफ की सत्ताईस सूत्री कार्य योजना को तेजी से पूरा करे।

गौरतलब है कि पिछले महीने एक आॅनलाइन बैठक में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को इसलिए ‘ग्रे सूची’ में कायम रखा था, क्योंकि आतंकवाद का वित्त पोषण करने वाले धन शोधन पर लगाम लगाने के तमाम आश्वासनों के बावजूद वह इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं कर सका है। एफएटीएफ की ओर से स्पष्ट शब्दों में पाकिस्तान को जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर और लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद जैसे उन आतंकियों के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए कहा गया है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी काफी पहले चिह्नित किया जा चुका है। दरअसल, वैश्विक आतंकवाद का सामना करने के लिए किए गए दूसरे अन्य उपायों के अलावा 1989 में एफएटीएफ का भी गठन किया गया था, जिसका मकसद धन शोधन, आतंकवादियों के वित्तपोषण और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणाली की अखंडता पर उत्पन्न खतरों से निपटना है। इसी संदर्भ में आतंकवाद के खिलाफ ईमानदारी से कदम नहीं उठाने की वजह से एफएटीएफ ने पाकिस्तान को जून 2018 में ‘ग्रे सूची’ में डाला था। इस सूची में बने रहने की वजह से पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक सहायता हासिल कर पाने के मामले में बड़े नुकसान उठाने पड़ रहे हैं।

यों अमेरिका ने इस संदर्भ में सत्ताईस सूत्री कार्ययोजना के ज्यादातर हिस्सों पर महत्त्वपूर्ण प्रगति करने के मद्देनजर यह उम्मीद जताई है कि पाकिस्तान इस मसले पर बाकी जरूरी कार्रवाई करने को लेकर भी तेजी दिखाएगा। लेकिन अफसोस की बात यह है कि भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की ओर से बार-बार शिकायत के बावजूद पाकिस्तान अपनी सीमा में स्थित ठिकानों से काम करने वाले आतंकियों और आतंकवादी संगठनों के खिलाफ कोई ऐसा कदम उठाता नहीं दिखा है, जो वैश्विक बिरादरी को संतुष्ट कर सके। जबकि पिछले लंबे समय से आतंकवाद दुनिया भर में एक बड़ी चुनौती के रूप में कायम है और इसकी वजह से तमाम देशों को इस समस्या से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर धन और ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है। जाहिर है, बिना संरक्षण, ठिकाना और वित्तपोषण की सुविधा मिले आतंकी संगठनों के लिए दुनिया भर में अपना जाल फैलाने और गतिविधियां संचालित करने में कामयाबी नहीं मिल सकती है।

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