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संपादकीयः हिंसा का समाज

राजधानी दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एक व्यक्ति ने अपने ही एक संबंधी, उसकी पत्नी और उसके तीन बच्चों की हत्या कर दी। इस सामूहिक हत्याकांड की वजह यह थी कि हत्या के आरोपी ने अपने उस संबंधी से तीस हजार रुपए उधार लिए थे और उसे चुका नहीं पाया था।

Author Published on: February 15, 2020 3:04 AM
भजनपुरा की घटना का एक पहलू यह है कि इस हत्याकांड का पता तब चला जब पीड़ितों के घर के आसपास रहने वाले लोगों ने उस घर से बदबू आने पर पुलिस को सूचना दी। तस्वीर में दोषी प्रभु नाथ है।

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जिस समाज को आगे का सफर तय करते हुए सभ्यता के रास्ते पर बढ़ कर ज्यादा से ज्यादा मानवीय होना चाहिए था, वहां उसमें ऐसी प्रवृत्तियों ने जड़ें जमाई हुई हैं, जिसने इंसान के भीतर से न्यूनतम संवेदना और समझ छीन ली है। अगर महज तीस हजार रुपए कर्ज के लेन-देन में देरी की वजह से किसी परिवार के पांच लोगों की हत्या कर दी जाती है तो यहीं ठहर कर सोचने की जरूरत है कि हमारा समाज कहां से चल कर कहां तक पहुंचा है और शासन से लेकर समुदाय किन स्तरों पर नाकाम है। गौरतलब है कि राजधानी दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एक व्यक्ति ने अपने ही एक संबंधी, उसकी पत्नी और उसके तीन बच्चों की हत्या कर दी।

इस सामूहिक हत्याकांड की वजह यह थी कि हत्या के आरोपी ने अपने उस संबंधी से तीस हजार रुपए उधार लिए थे और उसे चुका नहीं पाया था। इसी क्रम में हुए झगड़े के बाद उसने एक-एक करके पांचों को मार डाला। यों पुलिस ने मामले जांच-पड़ताल के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है, लेकिन सवाल है कि कैसे एक व्यक्ति के भीतर पुलिस या कानून का खौफ नहीं रह गया और उसने बारी-बारी से पांच लोगों की हत्या कर डाली। वहीं यह भी सोचने की जरूरत है कि वे कौन-से हालात हैं जिसमें पैसे की वजह से हुए किसी सामान्य झगड़े के बाद एक व्यक्ति इस तरह की क्रूर और बेलगाम मन:स्थिति में पहुंच जाता है।

हालांकि इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आती रहती हैं, जिनमें मामूली बातों पर हुई कहा-सुनी या फिर बहुत कम रकम की लेन-देन के मसले पर हुई लड़ाई की वजह से किसी ने एक या इससे ज्यादा लोगों की हत्या कर दी। निश्चित रूप से इसे भी कानून-व्यवस्था की नाकामी के तौर पर ही देखा जाना चाहिए कि एक व्यक्ति अपनी हत्यारी मंशा को अंजाम देने में कामयाब हो जाता है। लेकिन यह कैसी सामाजिक परिस्थितियां हैं, जिनमें लोगों के भीतर धैर्य और संवेदना की जगह नहीं बची है।

भजनपुरा की घटना का एक पहलू यह है कि इस हत्याकांड का पता तब चला जब पीड़ितों के घर के आसपास रहने वाले लोगों ने उस घर से बदबू आने पर पुलिस को सूचना दी। उसके बाद पता चला कि ये हत्याएं तीन दिन पहले की गई थीं और बाहर से बंद घर में शव सड़ने लगे थे। सवाल है कि मृतक परिवार के घर के आसपास रहने वाले लोगों का ध्यान पहले इस ओर क्यों नहीं गया, जबकि वे वहां रोजाना ही किसी न किसी वजह से उन्हें देखते होंगे या बात करते होंगे! क्या पड़ोसी के रूप में लोग एक दूसरे से इस कदर कटते जा रहे हैं कि हमेशा चहल-पहल वाले घरों के कई दिनों तक बंद रहने और उसमें रहने वाले बच्चों या बड़े लोगों के दिखाई नहीं देने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता?

इसके अलावा, ऐसी प्रवृत्तियां किस समाज में हावी हो सकती हैं जो व्यक्ति को मामूली समस्याओं का हल हिंसा में ढ़ूंढ़ने के लिए प्रेरित करें! इसमें कोई शक नहीं कि समाज की सामूहिक चेतना ऐसी नहीं होती है कि वह किसी व्यक्ति की हिंसा को औपचारिक रूप से स्वीकार करे, लेकिन यह सोचने की जरूरत है कि कोई व्यक्ति किन हालात में अपराध के रास्ते अपने सवालों का हल खोजने की कोशिश करता है। जाहिर है, इस तरह के मामले जितने कानून-व्यवस्था की प्रत्यक्ष-परोक्ष नाकामी से जुड़े हैं, उतने ही ये सामाजिक विकास नीतियों के न होने या फिर उसकी विफलता को भी दर्शाते हैं।

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