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चिंताः अधर में स्त्री

सच यह है कि सेवा क्षेत्र में आगे बढ़ने के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति बहुत मजबूत नहीं हुई। हालत यह है कि महिला हितों के खिलाफ जाने वाले श्रम कानूनों को प्रस्तावित किया जा रहा है। कार्यस्थलों पर मातृत्व से जुड़े मुद्दों को आज भी महिलाओं के लिए अवरोधक बना दिया जाता है। यही सोचना पड़ता है कि हमारा समाज आज भी सभ्य होने के किस पायदान पर पहुंच सका है!

Author March 13, 2016 2:11 AM
मेधा पाटकर

मेधा पाटकर

भारतीय समाज में महिलाओं को जो जगह मिली हुई है, उसे सभ्य समाज के लिहाज से हमेशा एक समस्या की तरह देखा जाता रहा है। हर काल में महिलाओं को दोयम दर्जा ही हासिल हुआ। इस मसले पर बढ़ती जागरूकता के बाद बराबरी के लिए संघर्ष खड़े जरूर हुए, लेकिन आज भी महिलाओं की स्थिति सुरक्षा, परंपरा और आधुनिकता के बीच झूल रही है। मर्दवादी समाज इसे समझ नहीं पा रहा है या फिर स्त्री की यथास्थिति को बहाल रखने के इंतजाम में लगा हुआ है। इसी तरह के द्वंद्व के बीच स्त्री और पुरुष के रिश्ते जटिल होते जा रहे हैं। यह सिर्फ लैंगिक आधार पर ही नहीं हो रहा है, बल्कि पूरा समाज ही परंपरा और आधुनिकता की टकराहटों के बीच अधर में है। विडंबना यह है कि हमारा शैक्षणिक परिवेश इस सामाजिक स्थिति में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम नहीं है और जो है, वह विरोधाभासों को और बढ़ा रहा है। समाज को आगे बढ़ने की कोई ठोस दिशा नहीं दिख रही है, जिससे समस्याएं बढ़ रही हैं।

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यह सही है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए कुछ कानून बने हैं और समाज भी नियम और कानूनों को मानता है। लेकिन कानूनी बातों का व्यवहार में रिश्तों पर कितना असर पड़ता है, यह देखने की बात है। क्या यह हमारी आपसी बातचीत और आचार-व्यवहार को तय करता है? इसका जवाब शायद नहीं में हो। इसलिए कानून प्रतिबंधक होना चाहिए। समाज को अपने मूल्यों पर चलना होगा, लेकिन वह मूल्य सभ्य और बराबरी आधारित न्यायपूर्ण समाज के लिहाज से प्रगतिशील होंगे। और इन्हीं मूल्यों की स्थापना हमारा पहला कदम होना चाहिए।
बेशक शिक्षा ने महिलाओं को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया है। लेकिन आज भी नौकरियों की बात करें तो जिन क्षेत्रों में पहले से महिलाओं के लिए कुछ प्राथमिकताएं रही हैं, उन्हीं में वे आगे बढ़ रही हैं।

नर्सिंग, शिक्षण, डॉक्टरी और आंगनबाड़ी कार्यकताओं जैसी सेवाओं में महिलाओं की भूमिका अब और भी बढ़ी है। पिछले कुछ सालों में उभरा एक नया क्षेत्र आइटी यानी सूचना तकनीक का भी है। मसलन, कॉलसेंटर जहां महिलाओं को अच्छी-खासी जगह मिली है। लेकिन महिलाओं की भागीदारी उन क्षेत्रों में अभी भी नाकाफी है जो नीति-नियामकों और फैसला लेने वालों की भूमिका में हैं। इसलिए आज इतना आगे बढ़ने के बावजूद सरकार की बनाई नीतियों में हम महिला विरोधी बिंदुओं की बहुत आसानी से पहचान कर सकते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि जिन तमाम क्षेत्रों में महिलाओं का योगदान बढ़ा है, उनकी भूमिका की तुलना में उन्हें वाजिब स्थान और सम्मान नहीं मिला। दरअसल, महिलाओं को अपने योगदान के बदले सम्मान और सत्ता की साझेदारी भी हासिल करनी होगी, तभी बात आगे बढ़ेगी।

सच यह है कि सेवा क्षेत्र में आगे बढ़ने के बावजूद आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की स्थिति बहुत मजबूत नहीं हुई। हालत यह है कि महिला हितों के खिलाफ जाने वाले श्रम कानूनों को प्रस्तावित किया जा रहा है। कार्यस्थलों पर मातृत्व से जुड़े मुद्दों को आज भी महिलाओं के लिए अवरोधक बना दिया जाता है। यही सोचना पड़ता है कि हमारा समाज आज भी सभ्य होने के किस पायदान पर पहुंच सका है!
दरअसल, पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के भीतर जीवट और जीवन से संघर्ष करने की क्षमता अधिक होती है और उनकी इसी क्षमता से पुरुषप्रधान समाज डरता है। महिलाओं को प्रकृति से दूर कर उनके जीवट से दूर किया जा रहा है। पर्यावरण पर से महिलाओं का हक छीन कर उनके जीने का आधार छीना जा रहा है। जल, जंगल, जमीन से जुड़े अधिकार छीन कर महिलाओं को उनकी जीविका से ही विस्थापित किया जा रहा है।

इसके अलावा, आदिवासी महिलाएं तेंदूपत्ता इकट्ठा कर अपनी शर्तों पर आसानी से अपनी आजीविका चलाने लायक कमा लेती हैं, लेकिन रोजगार गारंटी योजना के तहत वे अपने आठ किलोमीटर के दायरे में भी आजीविका का स्रोत हासिल नहीं कर पाती हैं। अगर यह दायरा उनसे और दूर होता है तो वे रोजगार की गारंटी से बेदखल ही होती हैं। इसलिए यह ध्यान रखने की जरूरत है कि प्राकृतिक संसाधनों का अधिकार केवल कागजों पर देकर खानापूर्ति नहीं की जा सकती है। जल, जंगल और जमीन से महिलाओं के अधिकार छीनकर उन्हें कमजोर बनाया जा रहा है।

महिलाओं का एक अहम योगदान अगली पीढ़ी तैयार करना भी है। वह पीढ़ी पुरुषवादी मानस में न जीए और स्त्री की बराबरी को सभ्य समाज का बुनियादी कारक माने, इसलिए महिलाओं का शिक्षार्थी बनना जरूरी है। अपनी शिक्षा का दायरा बढ़ा कर महिलाओं को प्रबुद्ध होना होगा। वे परिवार के केंद्र में तो पहले से ही हैं, अब उन्हें समाज का केंद्र बनने की कोशिश भी करनी होगी। परिवार और समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर पारंपरिक सोच से आगे निकलना होगा। अब महिलाएं अच्छी तरह जानती हैं कि वे केवल पालक नहीं हैं और न ही सिर्फ किसी दफ्तर में जाना ही अपनी पहचान बनाना है। पहले अपने घर को प्रबुद्ध करें, पड़ोसियों को प्रबुद्ध करें, फिर गली में प्रबुद्धता की मशाल जलाएं।

घर से निकल कर महिलाओं को हर गली में छोटे-छोटे स्कूल खोलने चाहिए। इस प्रसंग में हमें सावित्रीबाई फुले को याद करना चाहिए कि लड़कियों के लिए स्कूल खोलने और उन्हें पढ़ाने के लिए उन्हें क्या-क्या झेलना पड़ा। कायदे से हम सत्ता के विकेंद्रीकरण की मांग करते हैं। चूंकि रोजगार निर्माण के साथ एक प्रबुद्ध पीढ़ी का निर्माण भी महिलाओं को करना है, इसलिए इन्हें अपना सामाजिक और राजनीतिक दायरा बढ़ाना होगा। अगर हम केंद्र और राज्य-स्तरीय नीतियों को देखें तो इसमें महिलाओं को लेकर कोई स्पष्ट नीति नहीं रही है।

सरकार अभी जो नीतियां बनाती है, उससे महिलाओं को कुछ निजी फायदा भर होता दिखता है। अगर मौजूदा स्वच्छता अभियान की ही बात करें। शहरी गरीबों में पचास फीसद लोगों के पास अपने शौचालय नहीं हैं। सिर्फ मुंबई की गरीब बस्तियों में तीस फीसद महिलाओं के लिए शौचालय नहीं हैं। यह नीतियों की नाकामी ही है। शासकीय नीति में अपनी भागीदारी को बढ़ा कर ही महिलाएं सामाजिक धरातल पर कुछ हासिल कर सकती हैं। जाहिर है, राजनीतिक सशक्तीकरण स्त्रियों की जिंदगी और बदल के रख दे सकता है, लेकिन सवाल यह है कि बदलाव की वह दिशा क्या हो!
० (मृणाल वल्लरी से बातचीत पर आधारित)

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