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संपादकीयः प्रतिनिधि का आचरण

आजम खान पर अनियमितता का यह कोई नया मामला नहीं है। गौहर विश्वविद्यालय के लिए गैरकानूनी रूप से जमीन हथियाने से लेकर अन्य कई अनियमितताओं से संबंधित मामले उन पर दर्ज हैं। वे लंबे समय से सियासत में हैं और समाजवादी पार्टी के शीर्ष और निर्णायक भूमिका वाले नेताओं में गिने जाते हैं। आरोप है कि जब उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में थी, तब उन्होंने उसका खूब बेजा फायदा उठाया।

Author Published on: February 28, 2020 2:48 AM
आजम खान पर अनियमितता का यह कोई नया मामला नहीं है। गौहर विश्वविद्यालय के लिए गैरकानूनी रूप से जमीन हथियाने से लेकर अन्य कई अनियमितताओं से संबंधित मामले उन पर दर्ज हैं। वे लंबे समय से सियासत में हैं और समाजवादी पार्टी के शीर्ष और निर्णायक भूमिका वाले नेताओं में गिने जाते हैं। आरोप है कि जब उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में थी, तब उन्होंने उसका खूब बेजा फायदा उठाया।

राजनीति में प्रतिनिधि का आचरण बहुत मायने रखता है। मगर लगता है, हमारे राजनेता इस तकाजे को भूल गए या भुला चुके हैं। जब वे सत्ता में होते हैं, तो कानून की परवाह किए बगैर अपना हर स्वार्थ साधने का प्रयास करते देखे जाते हैं। निस्संदेह उनकी इस प्रवृत्ति के पीछे यह सुरक्षाबोध काम करता है कि कानून उनका अहित नहीं कर सकता। इसी का नतीजा है समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम का दो स्थानों से दो अलग-अलग जन्म प्रमाणपत्र बनवा लेना। आजम खान और उनकी पत्नी पर आरोप है कि उन्होंने साजिश के तहत अपने बेटे के दो जन्म प्रमाणपत्र बनवाए। एक में अब्दुल्ला की पैदाइश की जगह रामपुर बताई गई है, तो दूसरे में लखनऊ। दोनों प्रमाणपत्रों में जन्म की तारीख और वर्ष भी अलग दर्ज हैं। इस आरोप को सही मानते हुए अदालत ने तीनों को दो मार्च तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। अदालत इस बात से भी नाराज थी कि आजम खान तारीखों पर सुनवाई के लिए हाजिर नहीं होते थे। इस पर अदालत ने उनकी संपत्ति की कुर्की का आदेश देते हुए गैरजमानती वारंट जारी किया था।

आजम खान पर अनियमितता का यह कोई नया मामला नहीं है। गौहर विश्वविद्यालय के लिए गैरकानूनी रूप से जमीन हथियाने से लेकर अन्य कई अनियमितताओं से संबंधित मामले उन पर दर्ज हैं। वे लंबे समय से सियासत में हैं और समाजवादी पार्टी के शीर्ष और निर्णायक भूमिका वाले नेताओं में गिने जाते हैं। आरोप है कि जब उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्ता में थी, तब उन्होंने उसका खूब बेजा फायदा उठाया। उनके जिस बेटे पर गलत जन्म प्रमाणपत्र रखने का आरोप है, वह भी उत्तर प्रदेश में विधायक है। इस तरह उन्हें कहीं न कहीं इस बात का भरोसा रहा होगा कि उनके रसूख के चलते पुलिस और प्रशासन उनकी अनियमितताओं की तरफ आंखें मूदे रहेंगे। पर अब जब उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं और कानून का शिकंजा कसना शुरू हुआ है, तो वे उल्टा आरोप लगाते फिरते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार सियासी रंजिश के चलते उन्हें इरादतन परेशान कर रही है। राजनेताओं में यह भी कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। जब वे सत्ता में होते हैं, तो अक्सर उनमें अपने को कानून से ऊपर होने का गुमान देखा जाता है। पर सत्ता से बाहर होने पर जब उनके खिलाफ कानून का पंजा नजर आता है, तो वे सत्तापक्ष पर उल्टा आरोप मढ़ना शुरू कर देते हैं।

हालांकि राजनीति में खुद को कानून से ऊपर समझने और बदले की भावना से कार्रवाई करने, दोनों प्रवृत्तियां समांतर चलती रहती हैं। ये दोनों ही लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं मानी जा सकतीं। सत्ता में रहते हुए पुलिस और प्रशासन को अपने पक्ष में काम करने के लिए झुकाना सियासी दलों की पुरानी आदत बन चुकी है। इसी के चलते तमाम अनियमितताएं जन्म लेती हैं। ऐसा नहीं माना जा सकता कि आजम खान ने अपने बेटे के दो अलग-अलग जन्म प्रमाणपत्र गैरइरादतन बनवाए होंगे या इसकी उन्हें कोई जानकारी नहीं रही होगी। इससे उनकी मंशा में खोट साफ नजर आती है। यह भी जाहिर है कि जब वे इस तरह जानबूझ कर अनियमितताएं करते रहे हैं, तो उनके करीबी और सहयोगी भी ऐसा करते होंगे। नेताओं के आचरण नीचे के नेता और सहयोगी अपना ही लेते हैं। इस तरह बहुत सारे सामान्य लोगों के वाजिब हक भी मारे जाते हैं। इस प्रवृत्ति पर तब तक अंकुश नहीं लग सकता, जब तक राजनीतिक दल खुद इसे लेकर कोई सख्त कदम न उठाएं।

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