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संपादकीयः लाभ हानि

आम आदमी पार्टी की मुश्किलें घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं।

Author September 10, 2016 2:30 AM
आम आदमी पार्टी।

आम आदमी पार्टी की मुश्किलें घटने के बजाय बढ़ती ही जा रही हैं। उसे ताजा झटका दिल्ली हाइकोर्ट के उस फैसले से लगा है, जिसने दिल्ली सरकार के इक्कीस संसदीय सचिवों की नियुक्ति रद्द कर दी है। यह केजरीवाल सरकार के लिए वैधानिक से ज्यादा नैतिक आघात है। दो साल में इस सरकार के तीन मंत्री संगीन आरोपों में बर्खास्त हो चुके हैं और एक दर्जन विधायकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई चल रही है। गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा के कुल सत्तर सदस्य हैं। इनमें से केवल दस फीसद मंत्री बनाए जा सकते हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने फरवरी 2015 में अपने सात मंत्रियों के साथ सरकार बनाई थी। लेकिन महीने भर के भीतर ही उन्होंने अपने इक्कीस विधायकों को संसदीय सचिव बना दिया, जिसके लिए उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं ली गई।

नियुक्ति के समय से ही इस पर सवालिया निशान लग रहे थे। क्योंकि संसदीय सचिव के पद को लाभ का पद बताया जा रहा था। जब इस मामले में चौतरफा निंदा होने लगी तब दिल्ली सरकार ने अपना सिर बचाने के लिए आनन-फानन में जून, 2015 में संसदीय सचिव विधेयक पारित कराकर केंद्र के पास भेज दिया। जब राष्ट्रपति ने विधेयक वापस लौटा दिया, तभी यह कयास लगने लगा था कि दिल्ली सरकार के लिए ये नियुुक्तियां कड़वा घूंट साबित हो सकती हैं। अलबत्ता दिल्ली हाइकोर्ट ने ये नियुक्तियां इस बिना पर रद््द की हैं कि उपराज्यपाल की मंजूरी नहीं ली गई थी; उसने लाभ के पद की बाबत कुछ नहीं कहा है। इससे पहले, चार अगस्त को दिए अपने फैसले में अदालत ने कहा था कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं।

दरअसल, ताजा फैसला पिछले फैसले की ही एक और कड़ी है। क्या ये नियुक्तियां रद््द हो जाने से लाभ के पद का विवाद भी खत्म हो गया है, या कायम है, और दिल्ली सरकार को एक और बड़ा झटका दे सकता है? इस मामले में अपने पास लंबित याचिका पर निर्वाचन आयोग जो भी निर्णय दे, सवाल है कि आप सरकार ने ये नियुक्तियां क्यों कीं? उसकी तरफ से यह दलील दी जाती रही कि ये नियुक्तियां मंत्रियों की सहायता करने और सामंजस्यपूर्ण कामकाज के लिए की गई थीं। यह भी कहा गया कि संसदीय सचिवों को कोई आर्थिक लाभ नहीं दिया जा रहा था।

जबकि याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि संसदीय सचिवों को स्टाफ, कार, सरकारी कार्यालय, फोन, एसी और इंटरनेट आदि की सुविधाएं दी गर्इं। लेकिन लाभ के पद का मामला केवल वित्तीय प्राप्ति या कार्यालयी सुविधा से वास्ता नहीं रखता। इसके मूल में शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत और यह अवधारणा काम करती है कि विधायिका के सदस्यों को कार्यपालिका का हिस्सा नहीं बनना चाहिए, ताकि उनके स्वतंत्र रूप से काम करने में कोई दबाव या लाभ आड़े न आए। लिहाजा, उनके लिए ऐसे पद स्वीकार न करने का प्रावधान किया गया, जिन पर नियुक्ति सरकार करती है। मंत्रियों को इस प्रावधान से बाहर रखा गया है। लेकिन दूसरे कई राज्यों में वैसी अनेक नियुक्तियों के उदाहरण मिल जाएंगे, जैसी दिल्ली सरकार ने की थीं। क्या उनकी मनमानी इसलिए क्षम्य हो जाती है कि वे पूर्ण राज्य हैं? फिर, ‘हितों के टकराव’ के तो ढेर मामले मिल जाएंगे। उ

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