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दुनिया मेरे आगेः हाशिए पर मूर्तिकला

गुलाबी नगर जयपुर की मूर्तिकला लंबे समय से सारी दुनिया में जानी जाती रही है तो इसकी वजहें भी रही हैं। हर साल जयपुर से आठ करोड़ कीमत की मूर्तियां बाहर जाती हैं।

गुलाबी नगर जयपुर की मूर्तिकला लंबे समय से सारी दुनिया में जानी जाती रही है तो इसकी वजहें भी रही हैं। हर साल जयपुर से आठ करोड़ कीमत की मूर्तियां बाहर जाती हैं। भारत के अलावा अमेरिका, जापान, इग्लैंड और मॉरीशस आदि देशों में इनकी मांग बड़े पैमाने पर है। फिर भी इनके मजदूर शिल्पी आज एक तरह से बंधुआ प्रथा से पीड़ित होकर शोषण के शिकार हो रहे हैं। जयपुर के किशनपोल बाजार, चांदपोल बाजार और इंद्रा बाजार के बीच बसे मोहल्लों में लगभग तीन-चार हजार शिल्पी हर रोज छेनी-हथौड़े से संगमरमर के पत्थर पर मूर्तियों को आकार देते रहते हैं।

पिछले अनेक सालों से, बल्कि यों कहें कि कई पीढ़ियों से ये मजदूर शिल्पी पत्थर पर मूर्तियां उकेरते रहे हैं। फिर भी उनकी जीवन दशा और जीने के लिए जुटाए जा सके संसाधनों का स्तर निम्न और दयनीय है। सुबह से शाम तक एक स्थान पर बैठा शिल्पी अपनी कला का पूरा कौशल पत्थर पर उतारता है और मजदूरी मिल पाती है सिर्फ दस-पंद्रह रुपए। इस आमदनी से मजदूर के घर का खर्च और गृहस्थी नहीं चल पाती है और वह अपने मालिक से कर्ज लेकर अपना खर्च किसी तरह पूरा करता है। यही वजह है कि वह इस बंधे-बंधाए काम को एक ही मालिक के यहां करने को मजबूर रहता है और उसे इस स्थिति से मुक्ति भी नहीं मिल पाती है।

जयपुर का मूर्तिशिल्प मूल रूप से चंद धनाढ्य मूर्तिकारों के कब्जे में है और यही वजह है कि इस धंधे में लगे मालिक तो लगातार और धनी बन रहे हैं, लेकिन मजदूर या शिल्पी दिनोंदिन कमजोर और दीन-हीन होते जा रहे हैं। ये चंद पूंजीपति मालिक, मजदूरों का हर तरह से शोषण करके वर्षों से एक तरह से उन्हें अपने पास बांधे हुए हैं। इसीलिए एक ओर जहां मूर्तिकला का नया शिल्प विकसित नहीं हो पा रहा है, वहीं मजदूरों में इस व्यवसाय के प्रति उपेक्षाभाव घर करता जा रहा है। इसके अलावा, मकराना के संगमरमर के पत्थरों पर एकाधिकार भी चंद पैसे वाले मूर्तिकारों ने हथिया रखा है। जहां अच्छे दर्जे के पत्थर ये लोग हासिल कर लेते हैं, वहीं निम्न और मध्यम श्रेणी के मूर्तिकारों को घटिया संगमरमर ही मिल पाता है, और वह भी महंगी दरों पर। सरकारी स्तर पर ऐसे शिल्पियों की ऋण वगैरह मुहैया कराने की कोई व्यवस्था नहीं होने से यह व्यवसाय मूलत: चंद पूंजीपति मूर्तिकारों का एकाधिकार बन गया है।

संगमरमर (मकराना) का एक ट्रक पत्थर लगभग चालीस-पचास हजार रुपए में आता है और हर साल इस तरह के पांच सौ से अधिक पत्थरों के ट्रक आ जाते हैं। ऐसी स्थिति में निम्न स्तरीय शिल्पियों के इस क्षेत्र में अपने स्तर पर पनपने का कोई अवसर दिखता नहीं जान पड़ता है। इसके अलावा, एक मूर्ति पर जो मजदूर शिल्पी कार्य करता है, उसमें जरा भी भूल-चूक हो जाती है, तो वह उसकी महीने भर की आय को ले डूबती है। किसी मूर्ति का कोई अंग झड़ या टूट गया तो पूरी मूर्ति बेकार हो जाती है। ऐसे व्यवसाय में मजदूरों के लिए राहत कहां है? जहां वह अपने हाथ की कला और अपने कौशल या कारीगरी का परिचय देता है, वहीं उसके मन में एक अज्ञात भय हमेशा समाया रहता है। यह स्थिति मजदूरों के लिए त्रासद है। अगर इनके पास अपना व्यवसाय हो तो कभी-कभी का ऐसा नुकसान बर्दाश्त किया जा सकता है। लेकिन हालत यह है कि साधनों और पूंजी के अभाव में हजारों मजदूर बंधुआ बने रहने को मजबूर हैं।

जयपुर में गणेश, नंदी, राम, कृष्ण और कार्तिकेय की मूर्तियां ज्यादा गढ़ी जाती हैं। इनके अलावा, अलग से कह कर कर अन्य चीजें गढ़वाई जाती हैं। मूर्तिकारों के घर अजायबघर जैसे लगते हैं। भिन्न-भिन्न रूपों में बनी मूर्तियां रखी हुई मिलती हैं। यहां के अनेक मूर्तिशिल्पी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय ख्याति, सम्मान और पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। लेकिन श्रम किसका है और सम्मान किसे मिल रहा है, यह देखने और विचार करने का मामला है। सवाल है कि आखिर इस विडंबना का अंत कैसे होगा?

सरकार न तो शहरों की सजावट के लिए विशेष आदेश देकर मूर्तियां बनवाती है और न निम्न और मध्यम श्रेणी के शिल्पियों को साधन और पूंजी सुलभ कराती है। कहीं कोई शिल्प केंद्र स्थापित करके कोई प्रोत्साहन भी अब तक नहीं दे पाई है। कलाकारों की घोर उपेक्षा हो रही है और धीरे-धीरे यह कला एक तरह से अपने अंत की ओर कदम बढ़ा रही है। ऐसी उपेक्षा का शिकार होकर किसी कला या दूसरी विधा के लुप्त हो जाने के तमाम उदाहरणों के बावजूद ऐसा लगता है कि हमारी सरकार को इस बात की परवाह नहीं है कि आने वाले दिनों में शायद यह कला भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।

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