ताज़ा खबर
 

राजनीतिः हांफती स्वास्थ्य सेवाएं

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति दस हजार की आबादी पर पचास बिस्तर और पच्चीस डॉक्टर होने चाहिए। जबकि भारत में प्रति दस हजार की आबादी पर मात्र नौ बिस्तर और सात चिकित्सक उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्तरीय स्थिति के मामले में भारत विकसित देशों से तो पीछे है ही, कई विकासशील देशों से भी बराबरी नहीं कर पा रहा है। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर मानक पर हम दुनिया के देशों में निचले पायदान पर खड़े हैं।

Author July 12, 2019 1:27 AM
भारत में मातृत्व और बाल मृत्यु दर की स्थिति आज भी चिंतनीय है। गांवों से लेकर महानगरों तक कई तरह की संक्रामक और अन्य बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। मधुमेह और टीबी जैसी बीमारियां हर आयु वर्ग में मौतों की बढ़ती संख्या का बड़ा कारण बन रही हैं।

हाल में आई नीति आयोग की रिपोर्ट ‘स्वस्थ राज्य, प्रगतिशील भारत’ ने देश की स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीय स्थिति को सामने रखा है। रिपोर्ट में बिगड़ती स्वास्थ्य सेवाओं की जो हालत सामने आई है, वह वाकई चिंतनीय है। नीति आयोग ने तेईस संकेतकों को आधार बना कर राज्यों की एक सूची तैयार की है। ये सभी संकेतक जीवन सहेजने से जुड़ी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के सूचक हैं। इनमें नवजात मृत्यु दर, प्रजनन दर, लिंगानुपात, स्वास्थ्य सेवाओं की संचालन व्यवस्था, अधिकारियों की नियुक्ति और अवधि के साथ ही नर्सों और डॉक्टरों के खाली पद जैसे मुद्दे शामिल हैं। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत बयान करने वाली इस रिपोर्ट को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, विश्व बैंक और नीति आयोग ने मिल कर तैयार किया है। रिपोर्ट को तीन हिस्सों- बड़े राज्य, छोटे राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में बांट कर बनाया गया है।

इक्कीस प्रदेशों की इस फेहरिस्त में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बदतर बताई गई है। उत्तर प्रदेश के बाद बिहार और ओड़िशा जैसे राज्यों को रखा गया है, जहां स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा चरमराया हुआ है। दरअसल, भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश में स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर स्थिति हमेशा से चिंता का विषय रही है। जीवन रक्षा से जुड़ी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति नागरिकों को निराश ही करती आई है। लेकिन अफसोस कि डिजिटल इंडिया के इस दौर में भी आम नागरिकों की जान भगवान भरोसे ही है। ऐसे में सवाल यह है कि जो स्वास्थ्य सेवाएं जीवन की बुनियादी जरूरतों में से एक हैं, उनकी बेहतरी से जुड़े फैसलों और योजनाओं का असर जमीन पर क्यों नहीं दिखता?

खासकर सामुदायिक स्वास्थ्य सेवाएं तो खुद इलाज के इंतजार में दिखती हैं, क्योंकि हमारे यहां हर साल किसी न किसी बीमारी का प्रकोप देखने को मिलता है। लेकिन हर बार प्रशासनिक और सरकारी निष्क्रियता का ऐसा हाल सामने आता है कि न तो नागरिकों का स्वास्थ्य संभलता है और न ही भविष्य में इन बीमारियों से जूझने के लिए कोई सीख ली जाती है। निस्संदेह हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र बीमारियों की रोकथाम एवं नियंत्रण दोनों में ही अक्सर विफल रहते हैं। चिकित्साकर्मियों की कमी का मामला हो या स्वच्छता और संवेदनशीलता का मसला, बरसों से स्थितियां जस की तस बनी हुई हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट नेशनल हेल्थ प्रोफाइल-2015 में भी देश की खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं की तस्वीर सामने आई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इकसठ हजार लोगों पर केवल एक सरकारी अस्पताल और 1833 लोगों पर सिर्फ एक बिस्तर उपलब्ध है। इस रिपोर्ट मुताबिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार को आबादी के हिसाब से देखें तो हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्धारित मानकों से बहुत पीछे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रति दस हजार की आबादी पर पचास बिस्तर और पच्चीस डॉक्टर होने चाहिए। जबकि भारत में प्रति दस हजार की आबादी पर मात्र नौ बिस्तर और सात चिकित्सक उपलब्ध हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की स्तरीय स्थिति के मामले में भारत विकसित देशों से तो पीछे है ही, कई विकासशील देशों से भी बराबरी नहीं कर पा रहा है। स्वास्थ्य सेवा से जुड़े हर मानक पर हम दुनिया के देशों में निचले पायदान पर खड़े हैं।

नीति आयोग ने दूसरी बार स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर यह राज्यों की सूची जारी की है। पिछले साल भी बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य इस सूची में सबसे नीचे थे। ऐसे में यह सवाल अहम है कि बीमारियां हों या संक्रमण, जो व्याधियां बीते बरस लोगों की जान ले रहीं थीं, वही इस साल भी दस्तक दे रही हैं। बिहार में इस बार भी चमकी बुखार (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम) ने तीन सौ से ज्यादा बच्चों की जान ले ली। गौरतलब है कि यह बीमारी कुछ सालों से मुजफ्फरपुर में हर साल इसी तरह बच्चों का जीवन लील रही है। फिर भी सरकार ने कोई सबक नहीं लिया।

भारत में मातृत्व और बाल मृत्यु दर की स्थिति आज भी चिंतनीय है। गांवों से लेकर महानगरों तक कई तरह की संक्रामक और अन्य बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। मधुमेह और टीबी जैसी बीमारियां हर आयु वर्ग में मौतों की बढ़ती संख्या का बड़ा कारण बन रही हैं। एक अनुमान के मुताबिक जल्द ही दुनिया में हर पांच मधुमेह के रोगियों में एक भारतीय होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमान के मुताबिक 2020 तक देश में लगभग बीस फीसद आबादी मानसिक बीमारियों से प्रभावित होगी। भारत में टीबी के मरीजों की संख्या छब्बीस फीसद है। कहीं मोटापा तो कहीं कुपोषण नई व्याधियों को जन्म दे रहा है। ऐसे में भूमंडलीकरण के इस दौर में भारत की स्वास्थ्य सेवा किस हाल में है, क्यों हम स्वास्थ्य सेवाओं का ऐसा ढांचा तैयार नहीं कर पाए जो आम नागरिकों को स्वस्थ रख सके, क्यों चिकित्सा सेवाओं की पहुंच और स्तरीयता दोनों एक बड़ी समस्या बने हुए हैं, इन सारे मुद्दों पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।

जन स्वास्थ्य से जुड़ी नीतियों और कार्यक्रमों को वास्तविकता के धरातल पर उतारने के लिए इनका परिष्करण और समुचित विस्तार जरूरी है वरना स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद खामियों की हकीकत हर बार आम नागरिकों के जीवन पर भारी पड़ती रहेगी। चिकित्सा क्षेत्र की बदहाल स्थिति के चलते ही आबादी के बड़े हिस्से को उचित समय पर इलाज और परामर्श नहीं मिल पाता। भारत में सरकारी ही नहीं, निजी अस्पतालों में भी स्वास्थ्य सेवाएं कोई बहुत संतोषजनक स्थिति में नहीं हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के मुताबिक गांवों में अट्ठावन फीसद और शहरों में अड़सठ फीसद चिकित्सा निजी अस्पताल मुहैया करवा रहे हैं। समग्र रूप से बहत्तर फीसद स्वास्थ्य सुविधाएं निजी संस्थानों और चिकित्सकों के हाथों में हैं। यह बड़ा विरोधाभास ही है कि एक ओर तो भारत में दुनियाभर से लोग अत्याधुनिक और विश्वस्तरीय चिकित्सा सेवाएं लेने आ रहे हैं और दूसरी ओर आमजन इलाज और चिकित्सकीय देखभाल न मिलने से अपनी जान गंवा रहे हैं। यह दुखद ही है कि आबादी के बढ़ते बोझ, गरीबी और लचर स्वास्थ्य सेवाओं के चलते भारत को दुनिया के पिछड़े देशों से भी ज्यादा बीमारी के बोझ का सामना करना पड़ता है।

भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर किया जाने वाला खर्च भी काफी कम है। यह वैश्विक औसत से बहुत नीचे है। इसी कारण आज भी बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक बड़ी आबादी की पहुंच नहीं बन पाई है। जबकि स्वास्थ्य नीतियां और उनका प्रभावी क्रियान्वयन केंद्र और राज्यों की सरकारों की प्राथमिकता होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि 2008 से 2015 के बीच कुल जीडीपी का केवल 1.3 फीसद ही सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च किया गया। फिलहाल राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के तहत वर्ष 2025 तक इस लागत को जीडीपी का ढाई फीसद तक करने का लक्ष्य है। पर स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदा स्थितियों को देखते हुए यह मामूली सुधार कितना प्रभावी होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। जबकि किसी भी देश के नागरिकों की सेहत वहां के जन-संसाधन के स्वास्थ्य की रक्षा, आर्थिक उन्नति और स्तरीय जीवन जीने की मानवीय परिस्थितियों की बानगी होती है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को स्वास्थ्य के क्षेत्र को बुनियादी तौर पर मजबूत बनाने का प्रण करना चाहिए। सरकार हो या समाज, हमें समझना होगा कि आर्थिक विकास और सफलता से जुड़ी सभी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं की कामयाबी तभी है जब देश में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार हो।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App