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संपादकीयः आखिर इंसाफ

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले में आखिर निचली अदालतों के फैसले को ही पुष्ट किया और सुनिश्चित किया कि न सिर्फ पीड़ित परिवार, बल्कि उस घटना से संवेदना के स्तर पर जुड़े लोगों को भी इंसाफ होता लगे।

Author May 6, 2017 3:23 AM
16 दिसंबर, 2012 की रात 23 वर्षीय पैरामेडिकल छात्रा के साथ दक्षिणी दिल्ली में एक चलती बस में जघन्य तरीके से सामूहिक दुष्कर्म किया गया था

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्भया मामले में आखिर निचली अदालतों के फैसले को ही पुष्ट किया और सुनिश्चित किया कि न सिर्फ पीड़ित परिवार, बल्कि उस घटना से संवेदना के स्तर पर जुड़े लोगों को भी इंसाफ होता लगे। अदालत ने सोलह दिसंबर 2012 की रात चलती बस में हुए उस सामूहिक बलात्कार और हत्या की बर्बर घटना के चारों आरोपियों की फांसी की सजा को बहाल रखा और माफी या राहत की मांग मानने से इनकार कर दिया। इस घटना का एक आरोपी नाबालिग होने की वजह से सजा पूरी कर चुका है और दूसरे ने जेल में खुदकुशी कर ली थी। उस अपराध की प्रकृति के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने उसे जघन्य जुर्म और अलग दुनिया की किसी बर्बर घटना कहा। दरअसल, वह एक ऐसी त्रासद घटना थी, जिसने न सिर्फ देश की सामूहिक चेतना को बुरी तरह झकझोर दिया, बल्कि ये सवाल भी उठे कि उपलब्धियों के तमाम दावों के बीच हम सामाजिक विकास के किस पायदान पर खड़े हैं।

निर्भया के साथ हुए अपराध की प्रकृति और बर्बरता के बारे में सुनने-जानने के बाद देश भर में एक स्वाभाविक आक्रोश पैदा हुआ था। लोगों के बीच पसरे दुख और गुस्से की लहर इतनी तेज थी कि आखिरकार सरकार और समूचे तंत्र को अपनी जिम्मेदारी का अहसास करना पड़ा; उसके बाद गठित जस्टिस जेएस वर्मा समिति की सिफारिशों पर आधारित यौन हिंसा से संबंधित नया कानून बना। हालांकि यह जिम्मेदारी सरकार की अनिवार्य ड्यूटी में शामिल थी, जिसे ठीक से निबाहा जाता तो शायद निर्भया उस त्रासद अपराध का शिकार नहीं बनी होती। अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद निश्चित रूप से लोगों के बीच यह भरोसा मजबूत होगा कि तंत्र की कुछ कमजोरियों के बावजूद इंसाफ की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि किसी भी सजा का मकसद सुधार और सबक होता है। इस लिहाज से देखें तो इस घटना में शामिल अपराधियों में अदालत को सुधार की कोई गुंजाइश नहीं दिखी और उनके लिए सबक यह है कि उन्हें अपनी मौत की सजा को स्वीकार करना होगा। हालांकि दुनिया भर में इस बात पर बहस जारी है कि क्या मौत की सजा अंतिम विकल्प है और क्या इससे अपराधों में कमी लाई जा सकती है?

महिलाओं के खिलाफ अपराध पर लगाम के लिए सरकार, प्रशासन और न्याय-तंत्र की सक्रियता के साथ-साथ समाज में फैली आपराधिक प्रवृत्तियों पर भी काबू पाने की कोशिश जरूरी है। किसी घटना पर समाज में फैला आक्रोश उस मामले में सरकार पर तात्कालिक दबाव बनाने के साथ-साथ न्याय सुनिश्चित करने तक की पृष्ठभूमि बना सकता है। लेकिन व्यापक समस्या के रूप में इसके स्थायी हल के लिए समाज के पितृसत्तात्मक मूल्यों से लेकर शासन के ढांचे तक कई स्तरों पर लगातार कोशिश करनी होगी। क्या वजह है कि निर्भया कांड के सदमे और सामाजिक जागरूकता से लेकर आखिर इंसाफ के बावजूद हकीकत यह है कि बलात्कार की घटनाओं में काफी बढ़ोतरी की वजह से दिल्ली को ‘रेप कैपिटल’ तक कहा गया? राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में बलात्कार के मामलों में काफी इजाफा दर्ज किया गया। इसलिए निर्भया मामले में इंसाफ का महत्त्व तभी कायम हो सकेगा, जब सभी तबकों की महिलाओं को यौन हिंसा या किसी भी अपराध से मुक्ति मिले। यह किसी भी समाज के सभ्य होने की कसौटी है।

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