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आवादीः कानून और अत्याचार

आमतौर पर बलात्कार के कारणों में अशिक्षा को भी जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन विडंबना है कि संपूर्ण साक्षरता के लिए जाना जाने वाले राज्य केरल में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं। यहां पिछले 1,347 महिलाओं के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्रशासित राज्य बेहतर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लक्षद्वीप महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से प्रथम और नगालैंड दूसरे स्थान पर है। इसी तरह दमन और दीव और दादर नगर हवेली भी महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान है।

Author May 1, 2016 1:42 AM
जनसत्ता क्रियेटिविटी

यह विडंबना है कि भारतीय समाज में जैसे-जैसे स्वतंत्रता और आधुनिकता का विस्तार हुआ, वैसे-वैसे महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव बढ़ा है। इसी मानसिकता का घातक परिणाम है कि महिलाओं के प्रति छेड़छाड़, बलात्कार, यातनाएं, अनैतिक व्यापार, दहेज मृत्यु और यौन उत्पीड़न जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह स्थिति तब है जब देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है।

तमाम कानूनों के बावजूद महिलाओं पर अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि महिलाओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने के बावजूद 2014 में प्रतिदिन सौ महिलाओं का बलात्कार हुआ और 364 महिलाएं यौनशोषण का शिकार हुर्इं। रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में केंद्रशासित और राज्यों को मिलाकर कुल 36,735 मामले दर्ज हुए। यह भी तथ्य उजागर हुआ है कि हर वर्ष बलात्कार के मामले में वृद्धि हुई हैं। यानी इसका मतलब यह हुआ कि महिला अत्याचार विरोधी कानून का खौफ नहीं है या यों कहें कि कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हो रहा है।

आंकड़ों पर गौर करें तो बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है। आंकड़ों के मुताबिक 2004 में बलात्कार के कुल 18,233 मामले दर्ज हुए जबकि 2009 में यह आंकड़ा बढ़कर 21,397 हो गया। इसी तरह 2012 में 24,923 मामले दर्ज किए गए और 2014 में यह संख्या 36,735 हो गई। गौर करें तो 2014 का आंकड़ा 2004 के मुकाबले दोगुनी है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पर गौर फरमाएं तो पिछले वर्ष के रिकार्ड के अनुसार महिलाओं के लिए मध्यप्रदेश सबसे अधिक असुरक्षित राज्य के रूप में उभरा है। पिछले वर्ष यहां सबसे अधिक 5,076 बलात्कार के मामले दर्ज किए गए।

आमतौर पर बलात्कार के कारणों में अशिक्षा को भी जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन विडंबना है कि संपूर्ण साक्षरता के लिए जाने जाने वाला राज्य केरल में भी महिलाएं सुरक्षित नहीं। यहां पिछले साल 1,347 महिलाओं के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया। महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से केंद्रशासित राज्य बेहतर हैं। रिपोर्ट के मुताबिक लक्षद्वीप महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से प्रथम और नगालैंड दूसरे स्थान पर है। इसी तरह दमन और दीव और दादर नगर हवेली भी महिलाओं के लिए सुरक्षित स्थान है। लेकिन गौर करें तो देश के अधिकांश राज्य महिलाओं की सुरक्षा के लिहाज से बेहद संवेदनशील और असुरक्षित हैं। इन तथ्यों से साफ है कि भले ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए कठोर कानून गढ़ दिए गए हैं लेकिन भारतीय समाज अभी तक आदिम समाज से चली आ रही जड़ता, फूहड़ता, मूल्यहीनता और लंपट चारित्रक दुर्बलता से उबर नहीं पाया है।

कमाल की बात यह है कि प्राचीन काल से लेकर अब तक स्त्रियों को यही सिखाया-समझाया जा रहा है कि उन्हें बचपन में पिता के अधीन, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र के अधीन रहना चाहिए। लेकिन मजेदार बात यह कि यह नियम पुरुष समाज पर लागू नहीं होता। क्या पुरुष को बचपन में मां के अधीन, जवानी में पत्नी और बुढ़ापे में पुत्रवधु के अधीन नहीं रहना चाहिए? लेकिन नहीं। यह नैतिकता सिर्फ स्त्रियों पर थोपे गए हैं। ‘जाति और योनि के कटघरे’ में डॉ लोहिया ने स्त्री को गुलाम बनाने वाली नैतिकता पर जोरदार प्रहार करते हुए सच ही लिखा है कि आध्यामिकता निरपेक्ष है , लेकिन नैतिकता सापेक्ष है। हरेक युग और आदमी को अपनी-अपनी नैतिकता खोजनी चाहिए।
लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण कि आधुनिक युग का पुरुषवादी समाज स्त्रियों के लिए नैतिकता के पैमाने गढ़ रखा है लेकिन उस कसौटी पर स्वयं खरा उतरने को तैयार नहीं। भयानक सच यह है कि इक्कीसवीं सदी में आने के बाद भी पुरुषवादी समाज का यौन संबंधी विचार और सोच आज भी उसी तरह सड़ा-गला है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह भी कि महिलाएं सिर्फ सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर ही असुरक्षित नहीं है। बल्कि वह अपने घर-परिवार और रिश्ते-नातेदारों की जद में भी असुरक्षित हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो उद्घाटित कर चुका है कि रिश्तेदारों द्वारा बलात्कार किए जाने की घटनाओं में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है। दुष्कर्म की घटनाओं में तकरीबन 95 फीसद मामलों में पीड़ित लड़की दुष्कर्मी को अच्छी तरह जानती-पहचानती है फिर भी उसके खिलाफ अपना मुंह नहीं खोलती। शायद उसे भरोसा नहीं होता है कि कानून और समाज उसे दंडित कर पाएगा। यूनिसेफ की हालिया रिपोर्ट ‘हिडेन इन प्लेन साइट’ से उजागर हुआ है कि भारत में 15 साल से 19 साल की उम्र वाली 34 फीसद विवाहित महिलाएं ऐसी हैं, जिन्होंने अपने पति या साथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा झेली हैं। इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 15 साल से 19 साल तक की उम्र वाली सतहत्तर फीसद महिलाएं कम से कम एक बार अपने पति या साथी के द्वारा यौन संबंध बनाने या अन्य किसी यौन क्रिया में जबरदस्ती का शिकार हुई हैं।

इसी तरह 15 साल से 19 साल की उम्र वाली लगभग 21 फीसद महिलाएं 15 साल की उम्र से ही हिंसा झेली हैं। 15 साल से 19 साल के उम्र समूह की 41 फीसद लड़कियों ने 15 साल की उम्र से अपनी मां या सौतेली मां के हाथों शारीरिक हिंसा झेली हैं जबकि 18 फीसद ने अपने पिता या सौतेली पिता के हाथों शारीरिक हिंसा झेली है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जिन लड़कियों की शादी नहीं हुई, उनके साथ शारीरिक हिंसा करने वालों में पारिवारिक सदस्य, मित्र, जान-पहचान के व्यक्ति और शिक्षक थे। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और वाशिंगटन स्थित संस्था ‘इंटरनेशनल सेंटर पर रिसर्च आॅन वुमेन’ (आईसीआरडब्ल्यू) से उद्घाटित हुआ है कि भारत में दस में से छह पुरुषों ने कभी न कभी अपनी पत्नी या प्रेमिका के साथ हिंसक व्यवहार किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह प्रवृत्ति उन लोगों में ज्यादा है जो आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक 52 फीसद महिलाओं ने स्वीकार किया है कि उन्हें किसी न किसी तरह हिंसा का सामना करना पड़ा है। इसी तरह 38 फीसद महिलाओं ने घसीटे जाने, पिटाई, थप्पड़ मारे जाने और जलाने जैसे शारीरिक उत्पीड़नों का सामना करने की बात स्वीकारी है। दरअसल महिलाओं के उत्पीड़नकर्ताओं के मन में सजा का भय ही नहीं है। यही वजह है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में वृद्धि हो रही है। गौर करें तो बलात्कार के मामलों में सजा की दर बेहद कम है। आंकड़े बताते हैं कि 2006 में यौन उत्पीड़न मामले में सजा की दर 51.8 फीसद, 2007 में 49.9, 2008 में 50.5 और 2009 में 49.2 फीसद रही। इन आंकडों से साफ है कि बलात्कार के अधिकतर मामले में अपराधी सजा से बचे जा रहे हैं।
यानी महिलाओं पर होने वाले समग्र अत्याचारों में सजा केवल 30 फीसद गुनहगारों को ही मिल रही है। ऐसे में अगर बलात्कारियों और यौन उत्पीड़नकर्ताओं का हौसला बुलंद होता है तो यह अस्वाभाविक नहीं है। इस समय देश में तकरीबन 95,000 से अधिक बलात्कार के मुकदमे अदालतों में लंबित हैं। इनका निपटरा कब होगा भगवान जाने। भारत में हर एक घंटे में बाईस बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस द्वारा दर्ज किए जाते हैं। अधिकांश मामले में तो पुलिस रिपोर्ट दर्ज करती ही नहीं है। दूसरी ओर लोकलाज के कारण भी ऐसे मामलों को पीड़िता के परिजनों द्वारा दबा दिया जाता है। जब तक यौन उत्पीड़न के मामले में शत-प्रतिशत गुनहगारों को सजा नहीं मिलेगा तब तक ऐसे दुष्कृत्य थमने वाले नहीं हैं। ०

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