ताज़ा खबर
 

देशभक्ति को सम्मान

हाल में सिने अभिनेता और निर्देशक मनोज कुमार को दादा साहेब फाल्के सम्मान देने की घोषणा हुई है।मनोज कुमार देशप्रेम से ओत-प्रोत फिल्में बनाने के लिए मशहूर रहे हैं। इस मौके पर उनके फिल्मी करिअ‍ॅर पर रोशनी डाल रहे हैं अभिजीत राय।

Author March 13, 2016 2:15 AM

देश के सैंतालीसवें दादासाहेब फाल्के सम्मान पाने वाले मनोज कुमार हिंदी फिल्म जगत में एक ऐसे बहुआयामी कलाकार के तौर पर जाने जाते हैं, जिन्होंने फिल्म निर्माण की प्रतिभा के साथ-साथ निर्देशन, लेखन, संपादन और बेजोड़ अभिनय से भी दर्शकों के दिल में अपनी खास पहचान बनाई है। 24 जुलाई 1937 को पाकिस्तान के एबटाबाद में जनमें मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गोस्वामी है। उनकी दस वर्ष की आयु में उनका पूरा परिवार राजस्थान के हनमुानगढ़ जिले में आकर बस गया था। बचपन से ही दिलीप कुमार के अभिनय से प्रभावित रहे मनोज कुमार ने उनकी अभिनीत फिल्म शबनम के किरदार के नाम को ही अपना फिल्मी नाम रख लिया। दिल्ली के मशहूर हिंदू कॉलेज से स्नातक की शिक्षा पूरी करने के बाद अभिनेता बनने का सपना लेकर वे मुंबई गए।

बतौर अभिनेता मनोज कुमार ने अपने सिने करिअ‍ॅर की शुरुआत 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘फैशन’ से की, लेकिन कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण फिल्म नकार दी गई। फिल्म में उन्होंने नब्बे साल के बूढ़े का किरदार निभाया था। 1957 से 1962 तक मनोज कुमार फिल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे। फैशन के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली वह उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने कांच की गुड़िया, रेशमी रूमाल, सहारा, पंयायत, सुहाग सिंदूर, हनीमून, पिया मिलन की आस जैसी कई बी ग्रेड फिल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म सफल नहीं हुई।

उनके अभिनय का सितारा निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट की 1962 में प्रदर्शित क्लासिक फिल्म हरियाली और रास्ता से चमका। फिल्म में मनोज कुमार के विपरीत माला सिन्हा थीं। मनोज कुमार और माला सिन्हा की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। 1964 में मनोज कुमार की एक और सुपरहिट फिल्म- ‘वह कौन थी’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में उनकी नायिका की भूमिका साधना ने निभाई। रहस्य और रोमांच से भरपूर इस फिल्म में साधना की रहस्यमय मुस्कान के दर्शक दीवाने हो गए। 1965 में ही मनोज कुमार की एक और सुपरहिट फिल्म गुमनाम भी आई। इस फिल्म में रहस्य और रोमांस के ताने-बाने से बुने मधुर गीत-संगीत और ध्वनि का कल्पनामय इस्तेमाल किया गया था।
1965 में ही मनोज कुमार को विजय भट्ट की फिल्म हिमालय की गोद में काम करने का मौका मिला जो टिकट खिड़की पर सुपरहिट साबित हुई। इस फिल्म में भी मनोज कुमार की नायिका माला सिन्हा थीं।

1965 में प्रदर्शित फिल्म शहीद मनोज कुमार के सिने करिअरॅ की महत्त्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। देशभक्ति के जज्बे से परिपूर्ण इस फिल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह की भूमिका को रुपहले परदे पर जीवंत कर दिया। फिल्म में मनोज कुमार के कहने पर गीतकार प्रेम धवन ने न सिर्फ इस फिल्म के गीत लिखे साथ ही फिल्म का संगीत भी दिया। उनके रचित गीत ‘ऐ वतन… और मेरा रंग दे बसंती चोला’, आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उस दौर में थे।

1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की समाप्ति के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश में किसानों और जवानों की अहम भूमिका को देखते हुए जय जवान- जय किसान का नारा दिया और मनोज कुमार से इस पर फिल्म बनाने की पेशकश की। बाद में मनोज कुमार ने ुिफल्म उपकार बनाई। 1967 में प्रदर्शित ‘उपकार’ में मनोज कुमार किसान की भूमिका के साथ ही जवान की भूमिका में भी दिखाई दिए। फिल्म में उनके चरित्र का नाम भारत था, बाद में इसी नाम से वह फिल्म उद्योग में मशहूर हो गए। इस फिल्म को बॉक्स आॅफिस पर अच्छी सफलता मिली। इस फिल्म से अपने समय के लोकप्रिय अभिनेता प्राण ने जहां खलनायकी छोड़ चरित्र अभिनेता के तौर पर पदार्पण किया, वहीं प्रेम चोपड़ा जैसे बेहतरीन कलाकार को खलनायक के तौर पर मुकाम दिला दिया।

फिल्म का एक गाना- मेरी देश की धरती सोना उगले… तो मानो देशगान जैसा बन गया। 1970 में मनोज कुमार के निर्माण और निर्देशन में बनी एक और सुपरहिट फिल्म ‘पूरब और पश्चिम’ प्रदर्शित हुई। फिल्म के जरिए मनोज कुमार ने ऐसे लोगों की कहानी दिखाई जो दौलत के लालच में अपने देश की मिट्टी को छोड़कर पश्चिम में पलायन कर गए। 1972 में मनोज कुमार की एक और खास फिल्म ‘शोर’ प्रदर्शित हुई। आर्थिक तौर पर बहुत सफल न होते हुए भी शोर को ‘कल्ट-फिल्म’ माना जाता है। 1974 में ‘रोटी कपड़ा और मकान’ ने काफी ऊंचाई दी। इसके जरिए मनोज कुमार ने समाज की अर्थव्यवस्था पर गहरी चोट की। साथ ही आम आदमी की जिंदगी में जरूरी रोटी कपड़ा और मकान के मुद्दे को उठाया। 1976 में प्रदर्शित ‘दस नंबरी’ की सफलता के बाद मनोज कुमार ने लगभग पांच वर्षों तक फिल्म उद्योग से किनारा कर लिया। 1981 में उनकी ‘क्रांति’ ने दूसरी पारी शुरू की।

दिलचस्प है कि इसी फिल्म के जरिए मनोज कुमार के आदर्श दिलीप कुमार ने भी अपने सिने करिअ‍ॅर की दूसरी पारी शुरू की थी। ‘देशभक्ति’ के जज्बे से परिपूर्ण फिल्म में मनोज कुमार और दिलीप कुमार की जोड़ी को जबरदस्त सराहना मिली। 1983 में अपने पुत्र कुणाल गोस्वामी को स्थापित करने के लिए मनेज कुमार ने ‘पेंटर बाबू’ का निर्माण किया लेकिन कमजोर पटकथा और निर्देशन के कारण वह औंधे मुंह गिरी। फिल्म की असफलता से आहत मनोज कुमार ने लगभग छह साल तक फिल्म निर्माण से किनारा कर लिया।

1989 में उन्होंने एक बार फिर से फिल्म निर्माण और निर्देशन के क्षेत्र में वापसी की ‘क्लर्क’ का निर्माण किया। यह फिल्म भी टिकट खिड़की पर असफल रही। 1999 में प्रदर्शित फिल्म जय हिंद बतौर निमार्ता-निर्देशक मनोज कुमार के सिने करिअ‍ॅर की अंतिम फिल्म साबित हुई, जो टिकट खिड़की पर बुरी तरह नकार दी गई। उन्हें सात फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। इन सबके साथ ही फिल्म के क्षेत्र में मनोज कुमार के उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए 2002 में पद्मश्री, 2008 में स्टार स्क्रीन लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिला। और अब जाकर उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। फिलहाल वे फिल्म जगत में सक्रिय नहीं हैं। ०

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App