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संपादकीयः सबका साथ

आखिरकार जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर विधेयक पर राज्यसभा की मुहर लग गई। यही नहीं, जिस सदन में विधेयक सत्तापक्ष का बहुमत न होने के चलते अटका हुआ था, वहां यह सर्वसम्मति से पारित हुआ।

Author August 5, 2016 3:16 AM
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आखिरकार जीएसटी यानी वस्तु एवं सेवा कर विधेयक पर राज्यसभा की मुहर लग गई। यही नहीं, जिस सदन में विधेयक सत्तापक्ष का बहुमत न होने के चलते अटका हुआ था, वहां यह सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसका अर्थ यह नहीं कि जीएसटी के प्रावधानों को लेकर किसी को कोई एतराज नहीं रह गया था। सदन में हुई चर्चा बताती है कि कई दलों और अनेक सदस्यों को जीएसटी को लेकर शंकाएं थीं। पर असल में कोई नहीं चाहता था कि आर्थिक सुधार के एक बड़े काम में वह बाधक माना जाए। इसलिए विपक्षी सदस्यों के भाषणों में भले संदेह और सवाल उठाए गए, विरोध में एक भी वोट नहीं पड़ा।

राज्यसभा में विधेयक का आम राय से पारित होना निश्चय ही सरकार की एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि है। उद्योग जगत की अपेक्षाओं के अनुरूप मोदी सरकार का पहला बड़ा कदम भूमि अधिग्रहण कानून में फेरबदल का अध्यादेश लाना था, पर विपक्षी दलों से लेकर किसान संगठनों तक, तीखे विरोध के कारण वह स्थायी कानूनी शक्ल अख्तियार नहीं कर सका। ऐसे कई और प्रस्ताव संसदीय समितियों के हवाले हो गए। जीएसटी के लिए संसदीय सहमति हासिल कर मोदी सरकार आर्थिक सुधार की दिशा में एक ऐतिहासिक काम का श्रेय ले सकती है। पर यह दिलचस्प है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जीएसटी के खोट गिनाती और उसमें अड़ंगे लगाती नहीं थकती थी। साल भर से कांग्रेस बाधा बनी हुई थी, जिसने पहली बार जीएसटी विधेयक लाने की पहल की थी। वह तभी राजी हुई जब उसे अलग-थलग पड़ जाने का डर सताने लगा। जीएसटी का सोलह साल का लंबा सफर कुछ मतभेदों और राज्यों के अंदेशों के अलावा दूसरे के सिर सेहरा न बंधने देने और खुद श्रेय लूटने के खेल की ओर भी इशारा करता है।

बहरहाल, राज्यसभा से पारित होने के बाद, जीएसटी विधेयक बाद में हुए संशोधनों के कारण दोबारा लोकसभा में जाएगा और तमाम दलों के रुख को देखते हुए कहा जा सकता है कि वहां भी इस पर सर्वसम्मति की मुहर लग जाएगी। और कम से कम पंद्रह राज्यों की विधानसभाओं का आवश्यक समर्थन भी मिल जाएगा। पर नई कर प्रणाली को अमल में लाने के लिए संसद को दो और विधेयक पारित करने होंगे, तथा राज्यों को अपने-अपने जीएसटी कानून बनाने होंगे। इसलिए हो सकता है जीएसटी अगले साल अप्रैल से लागू न हो पाए, इसकी तारीख आगे खिसकानी पड़े। बहरहाल, नई कर प्रणाली जब से भी लागू होगी, देश भर में अप्रत्यक्ष कर संग्रह की एक समग्र व्यवस्था होगी जो सेवाओं तथा वस्तुओं के निर्माण, बिक्री और उपभोग पर लागू होगी।

उम्मीद की जा रही है कि प्रस्तावित कर प्रणाली से करोबार में सुगमता होगी और कर-चोरी पहले से मुश्किल हो जाएगी, वहीं यह अंदेशा भी जताया जा रहा है कि कई चीजें और सेवाएं महंगी हो जाएंगी। अलबत्ता फिलहाल यह तय नहीं है कि जीएसटी की दर क्या होगी। इसके बारे में निर्णय जीएसटी परिषद में होगा, जिसमें राज्यों के दो तिहाई वोट का प्रावधान रखा गया है। यह भी ध्यान में रहे कि राज्यों के आग्रह पर कई अप्रत्यक्ष करों को जीएसटी में शामिल नहीं किया गया है और पेट्रोलियम पर लगने वाले टैक्स की बाबत फैसला जीएसटी परिषद में होगा। राज्यों को मनाने के लिए केंद्र ने उन्हें संभावित नुकसान की पांच साल तक सौ फीसद भरपाई करने की मांग मान ली है। इस तरह आम सहमति बनाने की कीमत केंद्र को कुछ सालों तक अतिरिक्त वित्तीय भार उठाने के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

 

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