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संपादकीयः भूटान का पक्ष

भूटानी विदेश विभाग की वेबसाइट पर उनतीस जून को प्रकाशित हुआ यह बयान अब भी मौजूद है। फिर, डोकलाम को चीन का अंग मान लेने की भूटान की रजामंदी की बात कहां से आ गई?

Author August 12, 2017 3:51 AM

भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर जारी गतिरोध को करीब दो महीने होने जा रहे हैं। इस बीच चीन ने बराबर यही दोहराया है कि डोकलाम उसके भूभाग का हिस्सा है। पर वह यहीं तक नहीं रुका। हाल में उसने यह भी कहा कि भूटान ने माना है कि गतिरोध वाला क्षेत्र चीन का अंग है। पिछले दिनों बेजिंग गए भारतीय मीडियाकर्मियों के एक दल से बातचीत करते हुए सीमा संबंधी विषयों पर वहां के शीर्ष राजनयिक वांग वेनली ने कहा था कि भूटान ने राजनयिक माध्यम से अपना संदेश भेज कर यह स्वीकार किया है कि गतिरोध वाला इलाका उसका नहीं है। लेकिन भूटान के खंडन से चीन के इस दावे की कलई खुल गई है। भूटान ने कहा है कि डोकलाम उसका हिस्सा है, न कि चीन का है। उसे चीन का हिस्सा मान लेने की सहमति देने की बात सरासर है। भूटान के इस बयान से एक बार फिर यह जाहिर हुआ है कि चीन इस मामले में गलतफहमी फैलाने से बाज नहीं आ रहा है। कोई डेढ़ महीने पहले ही भूटान ने साफ कह दिया था कि डोकलाम क्षेत्र में निर्माण-कार्य पहले हुए समझौतों का उल्लंघन है।

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भूटानी विदेश विभाग की वेबसाइट पर उनतीस जून को प्रकाशित हुआ यह बयान अब भी मौजूद है। फिर, डोकलाम को चीन का अंग मान लेने की भूटान की रजामंदी की बात कहां से आ गई? भूटान के बयान में जिन समझौतों की तरफ इशारा है वे 1988 और 1998 में हुए थे। दोनों समझौतों का लब्बोलुआब यह था कि जब तक डोकलाम विवाद का हल नहीं निकल जाता, सीमा पर शांति और यथास्थिति बनाए रखी जाए। ऐसे में निर्माण-कार्य का प्रश्न ही नहीं उठता। पर चीन ने समझौतों का उल्लंघन तो किया ही, भूटान के पक्ष के बारे में गलतबयानी भी कर डाली। ऐसा उसने क्यों किया, यह कोई रहस्य की बात नहीं है। डोकलाम को चीन का हिस्सा मानने की भूटान की रजामंदी बताते ही भारत को अतिक्रमणकारी साबित करना आसान हो जाता है। चीन अपनी जनता की नजरों में और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच भी भारत की यही छवि पेश करना चाहता है, बल्कि सोलह जून से करता आया है। लेकिन भूटान ने अपने पहले के बयान को फिर दोहरा कर चीन के दावे को तार-तार कर दिया है। बेशक डोकलाम पर भूटान की तरह चीन भी अपनी दावेदारी जताता आया है। पर ऐसी सूरत में सारी दुनिया इस इलाके को विवादग्रस्त मानेगी। पहले के दोनों समझौतों से जाहिर है कि चीन ने भी ऐसा ही माना था। फिर डोकलाम में स्थायी निर्माण-कार्य शुरू करने का क्या औचित्य था?

भूटान की तरफ से भारतीय सैनिकों ने दखल तभी दिया जब चीन ने डोकलाम स्थित डोकोला से लेकर जोमपैलरी तक मोटर वाहन जाने लायक सड़क बनानी शुरू की। गौरतलब है कि जोमपैलरी में भूटानी सैनिकों का शिविर स्थल है। चीन ने वैसे भी सरहदी इलाकों में पिछले कुछ बरसों में भारी गाड़ियां जाने लायक सड़कें बड़ी तेजी से बनाई हैं। अपनी सेना की तेज आवाजाही और सेना के लिए शीघ्र आपूर्ति सुनिश्चित करने के सामरिक मकसद के सिवा और कौन-सा मकसद इसके पीछे हो सकता है? भूटान अपनी विदेश नीति और कूटनीतिक मामलों में भारत पर निर्भर है। इसलिए भारत को दखल देना पड़ा। पर यह चीन के किसी आंतरिक मामले में दखलंदाजी नहीं है। यह एक विवादित क्षेत्र को अपने ही ढंग से परिभाषित करने के चीन के हठ का विरोध है। अगर भूटान के साथ पहले हुए समझौतों का चीन सम्मान करे, तो बातचीत के जरिए गतिरोध आसानी से टूट सकता है।

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