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संपादकीयः महाराजा की विदाई

बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी स्वामित्व वाली एअरलाइंस यानी एअर इंडिया के विनिवेश के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी, और इसी के साथ एअर इंडिया की विदाई तय हो गई है।

Author Published on: June 30, 2017 4:12 AM
एयर इंडिया का विमान (प्रतीकात्मक तस्वीर)

बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी स्वामित्व वाली एअरलाइंस यानी एअर इंडिया के विनिवेश के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी, और इसी के साथ एअर इंडिया की विदाई तय हो गई है। विनिवेश उदारीकरण का एक प्रमुख घटक है। इसलिए सरकार के इस फैसले को स्वाभाविक ही उदारीकरण या आर्थिक सुधार की दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखा जाएगा। लेकिन एअर इंडिया को निजी हाथों में सौंपने का फैसला केवल नीतिगत आग्रह से नहीं हुआ होगा। दरअसल, एअर इंडिया की बरसों से जो खस्ता हालत चली आ रही है उसे देखते हुए इससे पिंड छुड़ाना ही सरकार को सबसे अच्छा विकल्प दिख रहा था। काफी समय से इसका विनिवेश करने के सुझाव दिए जा रहे थे। बहुत सारे सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो गया, जिनमें लाभ में चलने वाले उपक्रम भी थे, पर सरकारी एअरलाइंस विनिवेश से बची हुई थी, तो शायद इसीलिए कि राजनीतिक और नौकरशाह इसे सरकारी नियंत्रण में बनाए रखने में ही अपनी सुविधा और फायदा देखते थे।

लेकिन इसे करदाताओं के पैसे से राहत की खुराक दे-देकर कब तक चलाया जाता? सरकारी स्वामित्व की एअरलाइंस की वित्तीय हालत का अंदाजा इसी तथ्य से लग जाता है कि इस पर पचास हजार करोड़ से ज्यादा का कर्ज है। इसे बचाने के लिए कई बार बेलआउट पैकेज दिया गया।
यूपीए सरकार के समय भी एअर इंडिया का विनिवेश करके इससे छुट्टी पा लेने का प्रस्ताव कई बार आया था, क्योंकि इसके पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने तक को पैसे नहीं थे। पर आर्थिक सुधार के चैंपियन समझे जाने वाले मनमोहन सिंह एअर इंडिया का विनिवेश नहीं कर सके, शायद गठबंधन सरकार की मजबूरी के कारण। उलटे उनकी सरकार को एअर इंडिया की खातिर, एक दशक के लिए, कोई तीस हजार करोड़ रुपए का बेलआउट यानी बचाव का पैकेज मंजूर करना पड़ा, जिसमें से लगभग चौबीस हजार करोड़ रुपए इसे दिए जा चुके हैं।

मोदी सरकार को ठीक ही लगा कि सफेद हाथी बन चुकी इस कंपनी पर और खर्च करने की जरूरत नहीं है; इसे पूर्ण पेशेवर हाथों में सौंप देना चाहिए। वित्तमंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में एक समिति महाराजा की विदाई की प्रक्रिया तय करेगी। विनिवेश एक ही बार में सौ फीसद हो, या इक्यावन फीसद तथा छिहत्तर फीसद के क्रम से, बोली लगाने की प्रक्रिया और इसमें शामिल होने वालों की पात्रता की शर्तें क्या हों, कर्मचारियों के हितों की रक्षा कैसे हो, आदि मुद््दों पर समिति को विचार करना है।

एअर इंडिया के पायलटों ने तो निजीकरण के फैसले का विरोध नहीं किया है, पर कर्मचारियों ने, जिनकी संख्या हजारों में है, विरोध की आवाज उठाई है। विलय, अधिग्रहण और निजीकरण के कई फैसले विवाद का भी विषय बने हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में परस्पर विरोधी हित काम कर रहे होते हैं। बोली लगाने वालों की दिलचस्पी कमाई के अवसरों और संपदा में होती है, देनदारियां और अन्य सिरदर्द वे हरगिज नहीं लेना चाहते। एअर इंडिया के पास एक सौ दस विमान हैं, घरेलू हवाई सफर में चौदह फीसद और अंतरराष्ट्रीय हवाई सफर में सत्रह फीसद हिस्सेदारी है। मध्य मुंबई में बेशकीमती बत्तीस एकड़ जमीन और नरीमन पाइंट पर सोलह सौ करोड़ की कीमत वाले मुख्यालय समेत उसके पास देश-विदेश में काफी अचल संपत्ति है। इस सबके मद््देनजर कारोबारी बोली लगाने को उत्सुक होंगे, पर देनदारियां कैसे चुकता होंगी, और हजारों कर्मचारियों के भविष्य का क्या होगा!

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