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संपादकीयः आतंक का सिलसिला

ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठनों के बीच वर्चस्व के लिए कोई होड़ चल रही है, जिसके शिकार आम लोग हो रहे हैं। लेकिन इस आतंक से निपटने की रणनीति में वह कौन-सी कमी है जिसकी वजह से ऐसे संगठनों के आतंक पर लगाम नहीं लग पा रही है?

Author Updated: August 20, 2019 2:37 AM
अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक विवाह समारोह के दौरान आत्मघाती बम विस्फोट (Photo-Reuters)

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक विवाह समारोह के दौरान आत्मघाती बम विस्फोट में तिरसठ लोगों के मारे जाने और करीब दो सौ लोगों के बुरी तरह घायल होने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठा है कि वहां जिस शांति प्रक्रिया की कवायदें चलने की बातें की जा रही हैं, उनका हासिल क्या है! एक शादी और उसमें शामिल होने के लिए आए आम लोगों के लिए यह थोड़ा खुश होने का मौका था, लेकिन इस आतंकी हमले ने एक समारोह को मातम का आयोजन बना दिया। सवाल है कि अगर आतंकवादी संगठनों का कोई राजनीतिक मकसद है तो उसमें स्थानीय आबादी के लिए क्या जगह है? व्यापक पैमाने पर इस तरह की तबाही मचा कर वे लोगों के बीच अपने बारे में क्या संदेश छोड़ना चाहते हैं? ऐसी घटनाओं से साफ है कि इन आतंकी हमलों का मकसद सिर्फ आम लोगों की हत्या करना या उनकी जिंदगी को त्रासद बनाना है। अगर खौफ पैदा करके ये संगठन अपना दबदबा कायम करना चाहते हैं तो उसकी बुनियाद कैसी होगी!

दरअसल, अफगानिस्तान में अल कायदा और तालिबान के आतंक से उपजी समस्या लंबे समय से लगातार बनी हुई है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ अफगानिस्तान सरकार ने इन हमलों पर काबू पाने या रोकने की जितनी भी कोशिशें की हैं, वे आमतौर पर नाकाम हुई हैं। सही है कि अफगानिस्तान आज अगर आतंकवाद की मार से तबाह है तो उसमें तालिबान का रवैया सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। लेकिन हाल के वर्षों में आइएसआइएस ने भी वहां अपने पांव फैलाए हैं। यों कहीं भी कोई बड़ी आतंकवादी घटना होती है और उसमें ज्यादा लोग मारे जाते हैं तो उस इलाके में काम करने वाले आतंकी संगठनों के बीच इसका श्रेय लेने की होड़ मच जाती है। लेकिन काबुल में हुए ताजा आतंकी हमले की निंदा करते हुए तालिबान की ओर से यह बयान आया कि इसमें उसका कोई हाथ नहीं है तो घटना के बाद आइएस ने इसकी जिम्मेदारी लेने में कोई कोताही नहीं की। दूसरी ओर, हाल ही में काबुल में ही एक बम धमाके में चौदह लोगों की मौत हो गई और डेढ़ सौ लोग घायल हो गए थे और उस हमले की जिम्मेदारी तालिबान ने ली थी।

ऐसा लगता है कि अफगानिस्तान में मौजूद आतंकवादी संगठनों के बीच वर्चस्व के लिए कोई होड़ चल रही है, जिसके शिकार आम लोग हो रहे हैं। लेकिन इस आतंक से निपटने की रणनीति में वह कौन-सी कमी है जिसकी वजह से ऐसे संगठनों के आतंक पर लगाम नहीं लग पा रही है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि दुनिया भर में आइएसआइएस या तालिबान जैसे कोई भी संगठन, जो मजहबी आधार पर खुद को किसी खास समुदाय का चेहरा बताते हैं, उन्हें किसी धार्मिक त्योहार या सामाजिक समारोह में भी बड़े पैमाने पर आम लोगों की हत्या करने में संकोच नहीं होता। सच यह है कि नफरत या खौफ की राजनीति और निर्दोष लोगों की हत्या कर फैलाए गए आतंक के सहारे अपना प्रभाव बढ़ाने वाले किसी भी संगठन की नजर में वास्तव में धर्म की कोई अहमियत नहीं होती। विडंबना यह है कि ये हमले ऐसे हालात में हो रहे हैं जब तालिबान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता चल रही है, जिसका घोषित मकसद ही बीते दो दशक से जारी हिंसा और आतंकवाद को खत्म करना है। सवाल है कि जब दोनों पक्षों की ओर से बातचीत में सकारात्मक प्रगति का संकेत दिया जा रहा है, तो ऐसे समय में इन आतंकी हमलों और उनमें भारी तादाद में मासूम लोगों की हत्या के पीछे क्या वजहें हो सकती हैं?

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