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संपादकीयः संजीदगी का संगीत

संगीत की दुनिया में जोर-आजमाइश करने से पहले खय्याम ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान एक सिपाही के तौर पर काम किया था।

‘पद्मभूषण’ से सम्मानित हो चुके खय्याम को ‘उमराव जान’ में बेहतरीन संगीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया और वे संगीत नाटक अकादमी सम्मान से भी नवाजे गए।

सही है कि संगीत की दुनिया में शब्दों को अपनी धुनों से जिंदगी देने वाले मोहम्मद जहूर खय्याम हाशमी अकेले शख्स नहीं थे। लेकिन अपने जीते-जी उन्होंने इस मामले में जितना और जैसा दिया, उसने न केवल उन गीतों को अमर कर दिया, बल्कि खुद उन्हें भी संगीत के हर पल दर्ज हो रहे इतिहास के पन्नों पर शानदार अक्षरों में दर्ज कर दिया। संगीत को अगर सुकून की शक्ल में कहीं खोजा जाएगा तो वहां खय्याम की धुनों से लैस शब्दों वाले गीतों का सहारा लेना किसी भी संगीत से मुहब्बत करने वालों की मजबूरी होगी। हालांकि मजबूरी कोई अच्छी बात नहीं है, लेकिन खय्याम की धुनों की पनाह में जाकर वहां उठी लहरों में डूबते-उतरते हुए कोई इंसान शायद खुद को निहाल हुआ महसूस करे। यह दिलचस्प है कि संगीत की दुनिया में जोर-आजमाइश करने से पहले खय्याम ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान एक सिपाही के तौर पर काम किया था। यानी यह माना जा सकता है कि गोलीबारी, धमाकों और तबाही से दो-चार दुनिया की त्रासदी और उसका हासिल देख लेने के बाद उन्होंने जिंदगी का रास्ता चुना और उसमें संगीत के जरिए अलग-अलग रंग भरे, जिसने अपने हर सुनने वाले को अपना हिस्सा बनाया!

दरअसल, पंजाब में एक पारंपरिक जीवन-शैली वाले परिवार में जन्मे खय्याम ने किशोरावस्था पार करने के बाद जब सामने की दुनिया को देखना शुरू किया तो उस दौर में उन पर गायक और अभिनेता बनने का सुरूर चढ़ा। इसी जुनून ने उन्हें घर की दीवारों से आजाद कर दिया और फिर वे पहले दिल्ली और बाद में मुंबई पहुंच गए। लेकिन अभिनय के शौक से शुरू हुई बात आखिर संगीत सीखने तक पहुंची और फिर वही उनका सफर बन गया। फिल्मी दुनिया के अपने शुरुआती दिनों में खय्याम संगीतकार रहमान के साथ मिल कर संगीत तैयार करते थे और उनकी जोड़ी का नाम शर्मा जी और वर्मा जी था। लेकिन बाद में रहमान पाकिस्तान चले गए और फिर खय्याम ने अपने बूते संगीत की दुनिया में अपनी जगह बनाई। 1947 में ‘हीर रांझा’ से अपना सफर शुरू करने वाले खय्याम बाद के दिनों में ‘रोमियो जूलियट’ से आगे बढ़ते हुए ‘कभी-कभी’ और ‘उमराव जान’ जैसी फिल्मों तक पहुंचे, जिन्होंने उन्हें ऐसी ऊंचाई पर खड़ा कर दिया जो अब हमेशा उनकी जगह बनी रहेगी। इसके अलावा, सत्तर और अस्सी के दशक के दौरान ‘त्रिशूल’, ‘खानदान’, ‘नूरी’, ‘थोड़ी-सी बेवफाई’, ‘दर्द’, ‘आहिस्ता-आहिस्ता’, ‘दिल-ए-नादान’, ‘बाजार’, ‘रजिया सुल्तान’ जैसी फिल्में उनकी धुनों में मौजूद जिंदगी की गवाह हैं।

हालांकि एक समय यह कहा जाता था कि खय्याम एक बहुत बदकिस्मत इंसान हैं, जिनका संगीत हिट तो होता है, मगर जुबली के मोर्चे पर कामयाब नहीं हो पाता। लेकिन उसी दौर में उन्होंने ‘कभी-कभी’ का संगीत तैयार किया और अपने से जुड़ गई इस बेमानी धारणा को भी तोड़ दिया। इस फिल्म के गीत आज अपनी धुनों की वजह से कैसा असर रखते हैं, यह शायद अलग से बताने की जरूरत नहीं है। ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित हो चुके खय्याम को ‘उमराव जान’ में बेहतरीन संगीत के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार दिया गया और वे संगीत नाटक अकादमी सम्मान से भी नवाजे गए। अपने संगीत में संजीदगी और गहराई का जादू उतारने वाले खय्याम की शख्सियत का एक खास पहलू यह भी था कि उन्होंने अपनी जिंदगी भर की कमाई को एक ऐसे ट्रस्ट के नाम करने का ऐलान किया था, जो जरूरतमंद कलाकारों की मदद करता है। जाहिर है, एक शानदार संगीतकार और बेहद संजीदा इंसान के तौर पर सबके बीच मौजूद रहे खय्याम की कमी अब संगीत से मुहब्बत करने वाले हर शख्स को महसूस होगी।

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