ताज़ा खबर
 

राजनीतिः चंदे की पारदर्शिता का सवाल

बजट में कड़े प्रावधान लाए जाने के बाद माना जा रहा था कि राजनीतिक दलों के लिए चुनावी चंदे के स्रोत को छिपाना आसान नहीं होगा। चुनाव सुधार की दिशा में यह एक बड़ी और कारगर पहल थी, इससे लोगों की उम्मीद बढ़ी थी। लेकिन यह उम्मीद फलीभूत होती दिख नहीं रही है।

सर्वोच्च अदालत का यह आदेश उन राजनीतिक दलों के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करने वाला है जो पार्टी को मिले चंदे की जानकारी गोपनीय रखना चाहते हैं।

सर्वोच्च अदालत ने देश के सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि वे चुनावी बांड के जरिए मिले चंदे और दानकर्ता का ब्योरा सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को सौंपें। साथ ही यह भी कहा है कि राजनीतिक दल वित्त मंत्रालय द्वारा तय तारीख के मुताबिक चुनावी बांड से जो चंदा प्राप्त करने वाले हैं, उसका ब्योरा भी 30 मई तक चुनाव आयोग को उपलब्ध कराएं। हालांकि सर्वोच्च अदालत ने चुनावी बांड पर अंतरिम रोक नहीं लगाई गई है, लेकिन उसके भविष्य पर सवाल जरूर उठ खड़ा हुआ है। जानना आवश्यक है कि सर्वोच्च अदालत ने यह आदेश चुनावी बांड योजना पर रोक लगाने की मांग संबंधी गैर सरकारी संगठन- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) की याचिका पर सुनाया है। इसमें मांग की गई है कि चूंकि यह योजना अपारदर्शी है और चंदे में भ्रष्टाचार का खेल पहले की तरह जारी है, लिहाजा इस व्यवस्था को खत्म किया जाए। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह चुनावी बांड को लेकर आयकर, चुनाव और बैंकिंग कानूनों में किए गए बदलावों की विस्तृत जांच जरूर करेगा।

चुनावी बांड योजना दो जनवरी 2018 को अधिसूचित की गई थी। इसके मुताबिक कोई भी भारतीय नागरिक या भारत में स्थापित संस्था चुनावी बांड खरीद सकती है। तथ्य यह भी कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 29 ए के तहत पंजीकृत पार्टियां और पिछले आम चुनाव या विधानसभा चुनाव में कम से कम एक फीसद वोट हासिल करने वाली पार्टियां ही चुनावी बांड के जरिए पैसे ले सकती हैं। शर्त यह भी है कि पात्र राजनीतिक पार्टियां इस चुनावी बांड को सिर्फ अधिकृत बैंक में ही भुना सकती हैं। यहां जानना आवश्यक है कि चुनावी बांड की वैधता जारी होने के पंद्रह दिन तक ही रहती है और इसे जारी करने एवं भुनाने के लिए भारतीय स्टेट बैंक को अधिकृत किया गया है। अब देखना दिलचस्प होगा कि सर्वोच्च अदालत चुनावी बांड की व्यवस्था पर अपना अंतिम निर्णय क्या सुनाती है। लेकिन एक बात पूरी तरह साफ है कि यह व्यवस्था पहले की तरह ही अपारदर्शी है, इसलिए इस पर सवाल उठ रहे हैं। याद होगा जब 2017-18 के बजट में चुनावी बांड योजना की घोषणा की गई थी तब कहा गया था कि अब राजनीतिक दल दो हजार रुपए से अधिक का चंदा नगद में नहीं ले सकेंगे। उन्हें चेक के जरिए बांड खरीदना होगा और इस तरह यह चंदा राजनीतिक दलों के पंजीकृत खाते में चला जाएगा। वित्त मंत्री ने यह भी कहा था कि इस पहल से राजनीतिक दलों के खाते पर नजर रखने में मदद मिलेगी और आयकर विभाग भी उनके खातों की जांच आसानी से कर सकेगा। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। जाहिर है, चुनावी चंदे के खेल में अभी भी कालेधन का इस्तेमाल जारी है।

चुनावी बांड व्यवस्था से पहले राजनीतिक दल कुल चंदे की बीस फीसद राशि देने वाले दाताओं के नामों को उजागर करते थे। लेकिन अस्सी फीसद चंदा जो बीस-बीस हजार रुपए के कूपन बेच कर जुटाते थे, उन नामों का खुलासा नहीं करते थे। इसका कोई कानूनी प्रावधान भी नहीं था। लेकिन नए प्रावधानों के मुताबिक उनके लिए दो हजार रुपए से अधिक चंदा देने वालों के नामों का खुलासा करना अनिवार्य कर दिया गया है। यह माना गया गया था कि चुनावी बांड व्यवस्था से राजनीतिक दल आयकर विभाग की नजरों में रहेंगे। लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि चुनावी चंदा देने और लेने वाले दोनों ही आयकर विभाग की नजरों से बचे रहना चाहते हैं। ऐसा इसलिए कि आयकर की धारा 13ए में राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने के प्रावधान हैं। इसके तहत उन्हें चंदे से संबंधित बही-खाते एवं अन्य दस्तावेज रखने पड़ते हैं। लेकिन मजेदार बात यह है कि जनवरी 2018 में चुनावी बांडों के जरिए चंदा देने की अधिसूचना जारी होने के बाद से लेकर अब तक आयकर विभाग चंदे के रहस्यमय खेल को उजागर नहीं कर पाया है।

ऐसा माना गया था कि चुनावी बांड व्यवस्था लागू होने से सर्वाधिक असर उन क्षेत्रीय दलों पर पड़ता जो चुनावी चंदा तो इकठ्ठा करते हैं, लेकिन चुनाव नहीं लड़ते हैं और न ही बताते हैं कि कितना चंदा मिला। लेकिन ऐसे दलों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही। पिछले दस सालों में सभी राजनीतिक दलों को 11367.34 करोड़ रुपए का चंदा मिला है जिसमें से 7832.98 करोड़ रुपए बेनामी स्रोत से मिले हैं। यानी 1835.63 करोड़ रुपए का चंदा ही मात्र ज्ञात है।

चुनाव आयोग ने तय कर रखा है कि कोई भी उम्मीदवार निर्धारित सीमा से अधिक खर्च नहीं कर सकता। लेकिन देखा जाता है कि उम्मीदवार चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित धनराशि से कई गुना अधिक धन खर्च करते हैं। जबकि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 (1) में स्पष्ट उल्लेख है कि सभी उम्मीदवारों के लिए चुनाव खर्च का हिसाब रखना अनिवार्य है और धारा 77 (3) के मुताबिक खर्च निर्धारित राशि से अधिक नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि 1975 में सर्वोच्च न्यायालय ने लोकसभा सदस्य अमरनाथ चावला की सदस्यता इसी आधार पर समाप्त कर दी थी कि उन्होंने निर्धारित सीमा से अधिक खर्च किया था। इस मामले में अदालत ने यह व्यवस्था भी दी थी कि अत्यधिक संसाधन की उपलब्धता किसी उम्मीदवार को दूसरों के मुकाबले अनुचित लाभ प्रदान करती है। चुनाव में चंदे की भूमिका पर भी सर्वोच्च न्यायालय कठोर टिप्पणी कर चुका है कि चुनाव के पहले दिया गया चंदा चुनाव के बाद वायदे के रूप में कार्य करेगा जिससे आम आदमी के हितों पर कुठाराघात होगा। इसका असर विधायी प्रक्रियाओं पर उतना नहीं होगा जितना कि कानून और प्रशासनिक एवं नीतिगत निर्णयों को लागू करने पर।

चुनाव आयोग और न्यायालय द्वारा कई बार ताकीद किए जाने के बाद भी राजनीतिक दल चुनावी चंदे के मामले में यथास्थिति बनाए रखने के पक्षधर हैं। बजट में कड़े प्रावधान लाए जाने के बाद माना जा रहा था कि राजनीतिक दलों के लिए चुनावी चंदे के स्रोत को छिपाना आसान नहीं होगा। चुनाव सुधार की दिशा में यह एक बड़ी और कारगर पहल थी, इससे लोगों की उम्मीद बढ़ी थी। लेकिन यह उम्मीद फलीभूत होती दिख नहीं रही है। अभी तक जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था जो राजनीतिक दलों को सही खाता रखने को मजबूर करे। लेकिन अब नए प्रावधानों के मुताबिक राजनीतिक दलों को हर साल अपनी रिटर्न भरनी होगी। लेकिन यह स्थिति तब होगी जब चुनावी बांड की खरीद पारदर्शिता के दायरे में होगी।
सरकार राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता के लिए ठोस कानून बनाने के साथ-साथ राज्यपोषित कोष भी बनाए, ताकि राजनीतिक दलों को चुनाव लड़ने के लिए बेनामी चंदा उगाही की जरूरत ही न पड़े। 1998 में तत्कालीन गृहमंत्री के नेतृत्ववाली एक संसदीय समिति ने राज्यपोषित कोष से चुनाव खर्च वहन करने की सिफारिश की थी। लेकिन सियासी जमात उसके लिए तैयार नहीं हुई। कुछ दल तो इस तरह के सुझाव को सिरे से खारिज कर उससे उत्पन होने वाली समस्याओं को प्रेत की भांति खड़ा करने से भी नहीं चूके। दरअसल, उनकी मंशा और नीयत में खोट है। वे नहीं चाहते हैं कि चुनाव में सुधार हो। और वे चाहेंगे भी क्यों? जब उनके चुनावी खर्च को कॉरपोरेट घराने वहन करने को तैयार हैं और बदले में राजनीतिक दल उनका हित पोषण करने को तैयार हैं तो फिर उनके लिए चुनाव सुधार की जरूरत ही क्या है?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीयः हिंसा का चुनाव