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संपादकीयः सजा या दिखावा

यह किसी से छिपा नहीं रहा है कि लश्कर और जैश जैसे कई आतंकवादी संगठन पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करते थे। इस मसले पर बेजिंग में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी पाकिस्तान को फजीहत झेलनी पड़ी थी। लेकिन हर बार आश्वासन के बावजूद पाकिस्तान का कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आ सका था।

Author Published on: February 14, 2020 3:19 AM
पाकिस्तानी आतंकी हाफिज सईद (फाइल फोटो)

लाहौर की आतंकवाद निरोधी अदालत ने हाफिज सईद को जो सजा सुनाई है, उससे प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि पाकिस्तान ने इस मामले में आखिरकार सख्ती दिखाई है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि पर नजर डालने पर फिलहाल यह सिर्फ औपचारिकता ही दिखाई देती है। अदालत ने हाफिज सईद को प्रतिबंधित संगठन से जुड़ाव और आतंकवाद के लिए गैर-कानूनी तरीके से धन मुहैया कराने के दो मामलों में साढ़े पांच साल जेल की अलग-अलग सजा सुनाई है। इसके अलावा, पंद्रह हजार रुपए जुर्माना भी लगाया है। अब तक जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद की कारगुजारियों के जगजाहिर होने के बावजूद पाकिस्तान में उसके खिलाफ कोई कार्रवाई करने को लेकर जिस तरह का टालमटोल देखा गया था, उससे यही लग रहा था कि उसे बचाने की कोशिश शीर्ष स्तर से की जा रही है। लेकिन यह तभी तक संभव था, जब तक कि पाकिस्तान के इस रुख का असर उसके खिलाफ बनने वाले वैश्विक माहौल और उसे होने वाले व्यापक नुकसान के रूप में सामने नहीं आ रहा था। जाहिर है, जब इसकी शुरुआत हो गई, तब जाकर पाकिस्तान को शायद इस मसले की गंभीरता का अंदाजा हुआ।

दरअसल, चंद रोज बाद पेरिस में फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स यानी एफएटीएफ की बैठक होने वाली है और इसी के मद्देनजर पाकिस्तान इस बात से आशंकित था कि कहीं उसे ह्यकाली सूची में न डाल दिया जाए। एफएटीएफ ने अपनी पिछली बैठक में साफ लहजे में कहा था कि धनशोधन और आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकने के मामले में पाकिस्तान ने अगर समय रहते पर्याप्त कदम नहीं उठाया तो उसे ह्यकाली सूची में डाल दिया जाएगा। एफएटीएफ ने इसके लिए पाकिस्तान को इस साल फरवरी तक का समय दिया था, मगर उसे निगरानी सूची में बनाए रखा गया। सिर्फ निगरानी सूची में आने पर पाकिस्तान को हर साल दस लाख डॉलर का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर उसे ह्यकाली सूची में डाल दिया गया तो उस पर लगने वाले आर्थिक प्रतिबंधों के बाद क्या खमियाजा भुगतना पड़ सकता है। जाहिर है, अब हाफिज सईद को जिस तरह की सजा सुनाई गई है, उसके मद्देजनर कहा जा सकता है कि पाकिस्तान विश्व समुदाय को बताना चाहता है कि वह आतंकवाद के खिलाफ सक्रिय और सख्त है और एफएटीएफ पाकिस्तान के बारे में अपने रुख में बदलाव करे।

यह किसी से छिपा नहीं रहा है कि लश्कर और जैश जैसे कई आतंकवादी संगठन पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करते थे। इस मसले पर बेजिंग में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भी पाकिस्तान को फजीहत झेलनी पड़ी थी। लेकिन हर बार आश्वासन के बावजूद पाकिस्तान का कोई स्पष्ट रुख सामने नहीं आ सका था। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस आतंकवाद की मार से पाकिस्तान खुद भी मुक्त नहीं है और वहां भी आए दिन आतंकी हमलों में तमाम लोग मारे जाते रहे हैं, उसके खिलाफ सख्त रवैया अख्तियार करना उसने जरूरी नहीं समझा। मुंबई में आतंकी हमले का सरगना माने जाने वाले हाफिज सईद पर कार्रवाई को लेकर भारत ने न जाने कितनी बार पाकिस्तान को आगाह किया था, लेकिन उसने शायद ही कभी उसे सुनने की जरूरत समझी। सवाल है कि पाकिस्तान ने समय रहते यह समझना जरूरी क्यों नहीं समझा कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई करके वह दुनिया के दूसरे देशों सहित खुद को भी न केवल राजनीतिक रूप से, बल्कि आर्थिक रूप से भी सुरक्षित घेरे में खड़ा करेगा।

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