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संपादकीयः स्वच्छता बनाम संजीदगी

कचरा प्रबंधन के मामले में सरकारें कितनी गंभीर हैं, इसका अंदाजा सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र की ओर से दाखिल आठ सौ पैंतालीस पृष्ठों के हलफनामे से लगाया जा सकता है।

Author February 8, 2018 05:53 am
Illustration by C R Sasikumar

कचरा प्रबंधन के मामले में सरकारें कितनी गंभीर हैं, इसका अंदाजा सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र की ओर से दाखिल आठ सौ पैंतालीस पृष्ठों के हलफनामे से लगाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने बीते दिसंबर में केंद्र सरकार से पूछा था कि सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ठोस कचरा प्रबंधन नियम 2016 के तहत परामर्श बोर्ड गठित करने की दिशा में क्या प्रगति है। उस पर केंद्र की तरफ से हलफनामे का यह पुलिंदा पेश किया गया, जिससे चिढ़ कर अदालत ने कहा कि हम इससे संतुष्ट नहीं हैं। उसने सख्त लहजे में निर्देश दिया है कि तीन हफ्ते के भीतर इस संबंध में एक चार्ट पेश किया जाए। हैरानी की बात है कि इस संबंध में केंद्र की ओर से पेश हुए वकील के पास अदालत के पूछे एक भी सवाल का जवाब नहीं था। कचरा निपटान देश भर में एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। खासकर ठोस कचरे के उचित निपटारे को लेकर अब तक कोई व्यावहारिक उपाय नहीं तलाशा जा सका है, जिसके चलते बहुत सारे लोग सार्वजनिक जगहों, नदियों के किनारे आदि पर इसका निपटान कर मुक्ति पा लेते हैं। हालांकि करीब छह साल पहले राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने ऐसी गतिविधियों पर लगाम लगाने के मकसद से कड़े नियम बनाए थे, पर समुचित व्यवस्था न होने के कारण स्थिति पर काबू पाना कठिन बना हुआ है।

करीब तीन साल पहले केंद्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया था। इस मद में भारी मात्रा में धन का आबंटन भी किया गया। पर हकीकत यह है कि ठोस कचरा प्रबंधन की दिशा में कोई संतोषजनक काम नहीं हो पाया है। महानगरों में कचरा निपटान के लिए जो जगहें निर्धारित हैं, वे पर्याप्त नहीं हैं। फिर उनमें सिर्फ घरेलू और कुछ हद तक औद्योगिक कचरा ही पहुंच पाता है। भवन निर्माण, कारखानों आदि से निकलने वाले ठोस और अगलनीय कचरे के निपटान पर न तो ठीक से निगरानी की जा पाती है और न उसके लिए कोई व्यावहारिक तंत्र विकसित हो पाया है। दिल्ली में अनेक स्थानों पर यमुना के किनारे इसलिए उथले होते और सिकुड़ते गए हैं कि नियम-कायदों की परवाह किए बगैर बहुत सारा ठोस कचरा वहां डाल दिया जाता है। यही हाल दूसरी नदियों का भी है। औद्योगिक और चिकित्सीय ठोस कचरे का निपटान ठीक से न हो पाने की वजह से कई खतरनाक बीमारियां पांव पसारने लगती हैं। इसलिए इस मामले में बरती जाने वाली लापरवाही पर सर्वोच्च न्यायालय की तल्खी समझी जा सकती है।

राज्यों और सभी केंद्र शासित प्रदेशों में ठोस कचरा प्रबंधन के मद्देनजर परामर्श बोर्ड गठित करने के पीछे मकसद है कि वह अपने संबंधित क्षेत्रों में कचरा निपटान के मामले में व्यावहारिक उपाय तलाशने में मदद करेगा। पर्यावरण प्रदूषण रोकने संबंधी प्रयासों को आगे बढ़ाएगा और राज्य सरकारों पर इसके लिए लगातार दबाव बनाएगा। मगर केंद्र की ओर से अब तक इस दिशा में कोई प्रगति नहीं हुई है। उल्टा, सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती पर भारी-भरकम हलफनामा पेश कर उस पर परदा डालने का प्रयास दिखाई दिया है। इसी तरह नदियों की सफाई के मामले में वर्षों से कागजी खानापूर्ति चली आ रही है, जिसका नतीजा सामने है कि गंगा और यमुना लगातार और गंदी होती गई हैं। कचरा प्रबंधन के मामले में भी वही शिथिलता दिख रही है। अगर इस समस्या से निपटने में संजीदगी नहीं बरती गई तो स्वच्छता अभियान महज नारा साबित होगा।

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