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संपादकीयः कर्जमाफी बनाम वित्त

कर्जमाफी को लेकर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का बयान, सरकार को भले रास न आया हो, पर वह हैरानी का विषय नहीं है, क्योंकि वित्त व्यवस्था से जुड़े कि सी भी शख्स की वैसी ही प्रतिक्रि या होगी।

Author April 8, 2017 05:12 am
रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल

कर्जमाफी को लेकर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल का बयान, सरकार को भले रास न आया हो, पर वह हैरानी का विषय नहीं है, क्योंकि वित्त व्यवस्था से जुड़े कि सी भी शख्स की वैसी ही प्रतिक्रि या होगी। पटेल का क हना है कि कर्जमाफी से ईमानदार ऋण संस्कृति कमजोर होती है और साथ ही कर्ज चुकाने का प्रोत्साहन घटता है; इससे आने वाले दिनों में क र्ज की लागत बढ़ती है यानी भविष्य में ग्राहकों को महंगी दरों पर क र्ज मिलता है। कुल मिलाकर पटेल का मानना है कि कर्जमाफी से अर्थव्यवस्था की सेहत तो बिगड़ती ही है, यह नैतिक रू प से भी गलत है। रिजर्व बैंक के गवर्नर का यह बयान ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश की नई सरकार राज्य के कि सानों के क र्जे माफ क रने का एलान क र चुकी है। पटेल से पहले, भारतीय स्टेट बैंक की अध्यक्ष अरुं धति राय का बयान कर्जमाफी के खिलाफ आया था। बैंकिंग व्यवस्था की इन दो आला शख्सियतों की साझा चिंता यही है कि क र्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ेगा।

कर्जमाफी पहले भी हुई है। मसलन, 2008 में यूपीए सरकार ने क रीब सत्तर हजार करोड़ रु पए के कृषिऋ ण माफ कि ए थे। 2014 में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना क ी सरक ारों ने भी ऐसा क दम उठाया था। हर बार वित्तीय प्रशासन के क र्णधारों की तरफ से आलोचना ही हुई, जो स्वाभाविक भी है। क र्जमाफी से वित्तीय अनुशासन बिगड़ने की उनकी चिंताओं को खारिज नहीं कि या जा सक ता। पर सवाल है कि यह चिंता तब क्यों नहीं सताती, जब कॉरपोरेट जगत के क र्ज माफ किए जाते हैं। सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ते-बढ़ते आज बेहद चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। एनपीए का बड़ा हिस्सा कं पनियों-उद्योगपतियों का ही रहता है। उनके खिलाफ क्या कार्रवाई होती है, जिससे वे वित्तीय अनुशासन क ा पाठ पढ़ें और दूसरों को भी उससे कु छ सबक मिले? उलटे, बड़े-बड़े बकाएदारों के क र्ज बट्टे-खाते में डाल दिए जाते हैं। कई मामलों में क र्ज को ‘पुनर्गठित’ क र राहत दी जाती है। विडंबना यह है कि बहुत सारा पुनर्गठित क र्ज भी नहीं लौटता। यही नहीं, क ई लाख क रोड़ रु पए की  राशि इस प्रकार डूब जाने के बाद भी, न तो बैंक हल्ला मचाते हैं न सरकार की नींद खराब होती है। सरकारी खजाने से ही, यानी क रदाताओं के पैसे से ही सहारा देक र डूबी हुई रक म की भरपाई की जाती है, और उसे आर्थिक विकास के लिए उठाया गया क दम बताया जाता है। लेकि न जब कि सानों के लिए क र्जमाफी होती है, तो वित्तीय अनुशासन के सारे सिद्धांत याद आते हैं।

हमारे वित्तीय नियामक और अर्थशास्त्री सचमुच वित्तीय अनुशासन के लिए चिंतित हैं तो उन्हें समूचे परिप्रेक्ष्य में, और निष्पक्ष ढंग से विचार क रना चाहिए। लेकि न हमारे राजनीतिकों को भी सोचना होगा कि क्या क र्जमाफी कि सी समस्या का समाधान है? उत्तर प्रदेश सरकार के ताजा फै सले के बाद अन्य राज्यों में भी कृ षिऋ ण माफ क रने की मांग उठ रही है और गुरु वार को राज्यसभा में भी इसकी गूंज सुनाई दी। कि सानों की खुदकु शी की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह ऋ ण चुका पाने की असमर्थता रही है। इसलिए कि सानों की क र्जमाफी को, विशेष परिस्थितियों में, एक जायज राहत के तौर पर देखा जा सक ता है। पर हमें यह भी देखना होगा कि क्यों कि सान हमेशा ऋ ण लेने को मजबूर होते हैं और उसे चुका पाने में असमर्थ। ऐसा इसलिए है कि लंबे समय से खेती घाटे का धंधा बनी हुई है। इसलिए असल सवाल यह है कि खेती कि स तरह पुसाने लायक बने।
कातिल और मकतूल

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