ताज़ा खबर
 

संपादकीयः संदेश और सवाल

जब देश में एक फिल्म को सेंसर बोर्ड की मंजूरी और सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी मिल जाने के बाद भी सिनेमाघरों में दिखाया जाना मुश्किल हो रहा हो, तीखे विवाद और हिंसा हो रही हो, ऐसे में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम दिए राष्ट्रपति के संदेश पर ज्यादा गौर किए जाने की जरूरत है।

Author January 27, 2018 5:08 AM
राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद। (फाइल फोटोः निर्मल हरिंदरन/इंडियन एक्सप्रेस)

जब देश में एक फिल्म को सेंसर बोर्ड की मंजूरी और सर्वोच्च न्यायालय की हरी झंडी मिल जाने के बाद भी सिनेमाघरों में दिखाया जाना मुश्किल हो रहा हो, तीखे विवाद और हिंसा हो रही हो, ऐसे में गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम दिए राष्ट्रपति के संदेश पर ज्यादा गौर किए जाने की जरूरत है। इस संदेश में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी मुद्दे पर असहमति व्यक्त करना तो जायज है, लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाए कि इससे किसी की गरिमा को ठेस न पहुंचे और भावनाएं आहत न हों। इसके लिए मन से उदार बनना होगा और सौहार्द दिखाना होगा। तभी हम उस भाईचारे की भावना से युक्त समाज का निर्माण कर सकेंगे जिसकी कि आज देश को जरूरत है। हाल में जिस तरह की असहिष्णुता देखने को मिली, ‘गोरक्षकों’ द्वारा एक संप्रदाय विशेष को निशाना बनाने की घटनाएं सामने आर्इं, वे सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाने वाली थीं। और भी दुखद यह है कि हम अपने क्षुद्र हितों की खातिर न्यायपालिका का सम्मान करना भी भूलने लगते हैं। क्या यही कानून का शासन है? इस तरह लोकतंत्र कैसे चलेगा? लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि चुनाव होते रहें और राजनीतिक सत्ता में आते-जाते रहें। लोकतंत्र का कहीं ज्यादा मूल्यवान अर्थ यह है कि अभिव्यक्ति और असहमति के अधिकार समेत सारे नागरिक अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी हो। यही हमारे संविधान की बुनियाद भी है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार संविधान का बुनियादी ढांचा कहा है।

राष्ट्रपति ने एक अनुशासित और नैतिक राष्ट्र के निर्माण पर जोर देते हुए कहा कि अनुशासन और नैतिकता से पूर्ण संस्थाएं ही उन्नत राष्ट्र का निर्माण करती हैं। ऐसी संस्थाओं में पारदर्शिता, ईमानदारी, अनुशासन, मर्यादा और वहां काम करने वालों के बीच भाईचारा ही संस्थाओं को मजबूती और साख प्रदान करता है। इसलिए जरूरी है कि इनमें काम करने वाले भाईचारे की भावना का सम्मान करें और देशवासियों की उम्मीदों पर खरे उतरें। हाल में सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश और चार अन्य वरिष्ठ जजों के बीच विवाद और प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ विपक्ष द्वारा महाभियोग प्रस्ताव लाए जाने की खबरों के संदर्भ में राष्ट्रपति का यह संदेश काफी महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए। इस विवाद से न्यायपालिका को लेकर आमजन के मन में छवि कोई अच्छी नहीं बनी है।

राष्ट्रपति के संबोधन में गरीबों-वंचितों की सुध लेते हुए संपन्न तबके से अपील की कि वे वंचित समूहों के विकास के लिए दान दें और सरकार की ओर से मिलने वाले अनुदान को गरीबों के लिए छोड़ दें। असलियत यह है कि देश की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है। इस तबके का उत्थान तभी हो सकेगा जब संपन्न तबका उसके लिए सरकारी सुविधाएं और संसाधन छोड़े और परोपकार की भावना दिखाए। किसानों को लेकर भी राष्ट्रपति ने चिंता जताई है। पिछले तीन दशक में तीन लाख से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी है। यह तथ्य अपने आप में यह बताने के लिए काफी है कि किसान किस हालत में हैं। लेकिन खेती को पुसाने लायक बनाने के लिए क्या हो रहा है? राष्ट्रपति ने गरीबी मिटाने, वंचितों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने और शिक्षा तथा रोजगार जैसे सारे बुनियादी मसलों का जिक्र किया है। सवाल है कि सरकारें इन पर कुछ सार्थक कदम उठाएंगी, या बदस्तूर आंखें मूंदे रहेंगी!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App