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संपादकीयः दावोस के रास्ते

स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सालाना सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था, संरक्षणवाद, आतंकवाद और जलवायु संकट जैसे जो गंभीर वैश्विक मुद्दे उठाए हैं, उनका सरोकार न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के सभी मुल्कों से है।

Author January 25, 2018 2:52 AM
दावोस में पीएम मोदी

स्विट्जरलैंड के दावोस शहर में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सालाना सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अर्थव्यवस्था, संरक्षणवाद, आतंकवाद और जलवायु संकट जैसे जो गंभीर वैश्विक मुद्दे उठाए हैं, उनका सरोकार न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया के सभी मुल्कों से है। ऐसे में इस वैश्विक मंच से की गई अपीलें और आह्वान काफी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। विश्व आर्थिक मंच का यह सम्मेलन दुनिया के नेताओं और कारोबारियों का ऐसा बड़ा जमावड़ा है, जहां मुख्य रूप से अर्थव्यवस्था और कारोबार से संबंधित मुद्दे केंद्र में रहते हैं। इसलिए दुनिया के कारोबारियों और कंपनियों को भारत में निवेश के लिए न्योता देने का यह एक बड़ा मौका है। मोदी ने सम्मेलन के पहले दिन अपने संबोधन में दुनिया भर के कारोबारियों से कहा कि भारत आइए और कारोबार कीजिए। बाहर के कारोबारियों के लिए अब कोई अड़चन नहीं रह गई है। पहले लालफीताशाही की जो अड़चन थी, वह अब नहीं है। दूसरे देशों के कारोबारियों के लिए भारत में लाल कालीन बिछा है। दावोस सम्मेलन में पहुंचे भारत के दिग्गज कारोबारियों के मन में उन्होंने यह भरोसा पैदा करने की कोशिश भी की कि आर्थिक मुद्दों को लेकर सरकार गंभीर है और किए गए वादों पर अमल को लेकर भी।

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पिछले बीस साल में पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने दावोस के मंच से वैश्विक कंपनियों से निवेश का आह्वान किया है। यह भारत की बड़ी जरूरत भी है। आर्थिक सुधारों को जारी रखने और उसकी रफ्तार बढ़ाने के लिए विदेशी निवेश की अहमियत से इनकार नहीं किया जा सकता। पिछले ढाई साल के दौरान देश की अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती निवेश में ठहराव है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) के आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 की पहली तिमाही में मौजूदा मूल्य निवेश अनुपात 30.4 फीसद था, जो 2017-18 की दूसरी तिमाही में घटता हुआ 26.4 फीसद पर आ गया। इतना ही नहीं, इस पूरे साल कमोबेश यही स्थिति रहनी है। आखिर निवेश में आई यह कमी कहीं न कहीं परियोजनाओं से जुड़ी है, जो या तो शुरू नहीं हो पार्इं या हुर्इं तो अधूरी पड़ी हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी के आंकड़े इसकी तसदीक करते हैं कि नई परियोजनाओं का क्या हश्र हो रहा है। इसीलिए निवेशक नई परियोजनाओं से दूरी बना रहे हैं। पहले से लटकी परियोजनाओं का क्या होगा, कोई नहीं जानता। ऐसे में हालात समझते हुए कोई विदेशी कंपनी क्यों आएगी निवेश करने? इसलिए यह चुनौती भरा काम है कि विदेशी निवेशकों के मन में यह बात गहरे पैठाई जाए कि आप यहां अपना पैसा लगाइए, कोई दिक्कत नहीं होगी।

हालांकि दावोस सम्मेलन के दौरान ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर जो अनुमान दोहराया है वह विदेशी कारोबारियों के संदेह को अब दूर करने में मदद कर सकता है। आइएमएफ ने कहा कि भारत आज दुनिया की तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है और इसकी वृद्धि तथा कामयाबी इस पर निर्भर होगी कि वह अपने यहां आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को किस तेजी से बढ़ाता है। ऐसे में भारत के लिए अवसरों के साथ चुनौतियां भी काफी हैं। आइएमएफ ने कहा है कि भारत को अपनी अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ानी होगी, तभी सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होगी। ऐसे में भारत दावोस मंच से कितना हासिल कर पाएगा और कैसे निवेशकों को आकर्षित कर पाएगा, यह सिर्फ आर्थिक सुधारों पर निर्भर करेगा।

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