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संपादकीयः नाहक विवाद

आमतौर पर सेना की किसी मांग पर विवाद की स्थिति से बचने की कोशिश की जाती है। पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों को छोड़ दें तो कई बार ऐसी स्थितियां सामने आ जाती हैं, जिनमें सेना और सरकार किसी मुद्दे पर आमने-सामने हो जाती हैं।

Author January 13, 2018 1:58 AM
(express PHOTO)

आमतौर पर सेना की किसी मांग पर विवाद की स्थिति से बचने की कोशिश की जाती है। पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों को छोड़ दें तो कई बार ऐसी स्थितियां सामने आ जाती हैं, जिनमें सेना और सरकार किसी मुद्दे पर आमने-सामने हो जाती हैं। नौसेना अधिकारियों की ओर से दक्षिण मुंबई इलाके में आवासीय सुविधा मुहैया कराने की मांग पर फिलहाल केंद्र सरकार और नौसेना के बीच असहमति ने तीखा शक्ल अख्तियार कर लिया है। हालत यह है कि इस मसले पर जवाब देते हुए खुद केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी तल्ख हो उठे। पर जिस तरह सभी अधिकारियों के लिए इसी इलाके में फ्लैट या क्वार्टर बनाने की मांग की जा रही थी, उसका भी औचित्य समझना मुश्किल है। हालांकि नौसेना के कई अफसरों के आवास दक्षिणी मुंबई के संभ्रांत इलाके में स्थित हैं।

इसके अलावा, इसी क्षेत्र में कोलाबा के नेवी नगर में नौसेना के आवासीय क्वार्टर भी बने हुए हैं। लेकिन इसी को आधार बना कर सभी नौसेना अधिकारियों के लिए वहीं आवास की व्यवस्था की जाए तो उसके लिए न केवल बड़े पैमाने पर जमीन सहित बाकी आर्थिक संसाधनों की जरूरत पड़ेगी, बल्कि यह सवाल भी उठेगा कि भारतीय सेना के किसी खास हिस्से के लिए सरकार ऐसी सुविधा आखिर किन वजहों से मुहैया करा रही है! शायद भविष्य में कुछ ऐसे ही असुविधाजनक सवालों से बचने के लिए नितिन गडकरी ने उस प्रस्ताव पर विचार करने से इनकार कर दिया। मगर इसके लिए उन्हें भाषा के इस्तेमाल में सावधानी बरतनी चाहिए थी। उनका कहना था कि नौसेना को आवास बनाने के लिए दक्षिण मुंबई में एक इंच भी जमीन नहीं दी जाएगी; नौसेना के सभी अधिकारियों को आलीशान दक्षिण मुंबई इलाके में रहने की जरूरत क्यों आ पड़ी है, जबकि उन्हें पाकिस्तान की सीमा पर जाकर गश्त लगाना चाहिए। गडकरी ने नौसेना को आवास के लिए जमीन न देने का फैसला किया तो बेशक उसका कोई आधार होगा। पर एक सार्वजनिक समारोह में उन्होंने जिस भाषा में अपनी यह बात कही, क्या उसे उचित कहा जाएगा?

दरअसल, दक्षिणी मुंबई में मालाबार पहाड़ियों के बीच एक तैरने वाले जट्टी के निर्माण के अलावा सी-प्लेन सेवा शुरू करने की योजना थी। मगर नौसेना ने सुरक्षा कारणों का हवाला देकर इसकी अनुमति नहीं दी। खबरों के मुताबिक नौसेना की ओर से रोक लगाए जाने के बाद से ही केंद्रीय मंत्री नाराज चल रहे थे। पर दफ्तरी और तकनीकी नियम-कायदों के दायरे में पैदा हुई बाधा या विवाद से निपटने का तरीका क्या यह होगा कि सार्वजनिक मंचों से नौसेना को पाकिस्तानी सीमा पर गश्त लगाने की हिदायत दी जाए? हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि नौसेना के अधिकारियों ने अगर दक्षिण मुंबई में ही अपने लिए आवास की मांग उठाई तो इसके पीछे किसी पॉश इलाके में रहने की इच्छा के अलावा कोई मजबूत दलील नहीं है। सेना से जुड़े लोगों की सेवाओं के महत्त्व को देखते हुए ड्यूटी पर रहने से लेकर सहज रहन-सहन, यहां तक कि सेवानिवृत्ति के बाद के जीवन की सुविधाओं का भी खयाल रखा जाता है। इसलिए सरकार की कोशिश यही होनी चाहिए कि सेना की किसी मांग का परिपक्व तरीके से हल निकाला जाए। सार्वजनिक रूप से सेना को विवाद के घेरे में लेने से नाहक ही कई तरह की आशंकाएं सुर्खियां बनने लगती हैं, जिनका नुकसान कई स्तरों पर होता है, मगर कुछ हासिल नहीं होता है।

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