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संपादकीयः असुरक्षित मिग 21

वायुसेना प्रमुख पहले भी मिग विमानों के पुराने पड़ने और वायुसेना के आधुनिकीकरण का मसला उठाते रहे हैं। लेकिन वायुसेना की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि उसके पास पर्याप्त लड़ाकू विमान नहीं हैं। ऐसे में मिग विमानों से ही काम चलाना पड़ रहा है चाहे पायलटों का प्रशिक्षण हो या फिर सैन्य अभियान। पिछले कुछ सालों में हुए मिग हादसों में भारत ने कई जांबाज पायलटों का खोया है।

Author Published on: August 22, 2019 2:23 AM
आज दुनिया के बड़े देश अंतरिक्ष युद्ध की तैयारियों में लगे हैं। हाल में भारत ने अंतरिक्ष में निशाना साधने में कामयाबी हासिल की है। पर विडंबना यह है कि एक ओर हम अंतरिक्ष की ताकत बनने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर हमारी वायुसेना के पास जरूरत भर के भी विमान नहीं हैं।

भारत के वायुसेना प्रमुख बीएस धनोआ ने एक बार फिर मिग-21 विमानों के इस्तेमाल को लेकर जो चिंता व्यक्त की है, उससे यह साफ है कि ये विमान अब किसी भी रूप में सुरक्षित नहीं रह गए हैं। इसीलिए उन्हें यह कहना पड़ा है कि इतनी पुरानी तो हम कार भी नहीं चलाते हैं जितने पुराने मिग विमान उड़ा रहे हैं। वायुसेना अध्यक्ष की यह फिक्र वाकई जायज है, क्योंकि शायद ही कोई महीना बीतता हो जब मिग के दुर्घटनाग्रस्त होने की कोई खबर न आ जाती हो। पिछले कुछ सालों में मिग विमानों के हादसे जिस तेजी से बढ़े हैं, उससे यह सवाल उठना लाजिमी है कि कब तक हमारे लड़ाकू पायलट अपनी जान जोखिम में डाल कर इन विमानों को उड़ाते रहेंगे। लेकिन वायुसेना में अभी भी जिस बड़ी संख्या में, भले ही मजबूरी में इन विमानों का उपयोग किया जा रहा है, वह गंभीर चिंता का विषय है। हकीकत यह है कि आज भी मिग-21 विमान ही वायुसेना की रीढ़ बने हुए हैं। सिर्फ भारत ही दुनिया में एकमात्र देश है जो पचास साल पुराने मिग विमानों के दम पर अपनी वायुसेना को धकेले जा रहा है।

वायुसेना प्रमुख पहले भी मिग विमानों के पुराने पड़ने और वायुसेना के आधुनिकीकरण का मसला उठाते रहे हैं। लेकिन वायुसेना की सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि उसके पास पर्याप्त लड़ाकू विमान नहीं हैं। ऐसे में मिग विमानों से ही काम चलाना पड़ रहा है चाहे पायलटों का प्रशिक्षण हो या फिर सैन्य अभियान। पिछले कुछ सालों में हुए मिग हादसों में भारत ने कई जांबाज पायलटों का खोया है। पिछले चार दशकों में पांच सौ से ज्यादा मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं और दो सौ से ज्यादा पायलट मारे जा चुके हैं। पायलटों का मारा जाना वायुसेना के लिए मिग खोने से भी ज्यादा बड़ा नुकसान होता है। हालांकि वायुसेना प्रमुख कह चुके हैं कि रफाल विमान मिलने के बाद मिग विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। रफाल विमानों की पहली खेप भारत को अगले महीने मिलेगी और अगले तीन साल में छत्तीस रफाल विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में होंगे। इस तरह पहले चरण में 2022 तक मिग-21 विमान हटाए जाएंगे और 2030 तक मिग-27 और मिग-29 विमान भी हटा दिए जाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या 2030 तक वायुसेना पुराने मिग विमानों का ही उपयोग करती रहेगी और हम अपने लड़ाकू पायलटों को खोते रहेंगे?

आज दुनिया के बड़े देश अंतरिक्ष युद्ध की तैयारियों में लगे हैं। हाल में भारत ने अंतरिक्ष में निशाना साधने में कामयाबी हासिल की है। पर विडंबना यह है कि एक ओर हम अंतरिक्ष की ताकत बनने की बात कर रहे हैं और दूसरी ओर हमारी वायुसेना के पास जरूरत भर के भी विमान नहीं हैं। अभी वायुसेना को युद्धक विमानों के बयालीस बेड़ों (स्क्वाड्रन) की जरूरत है, जबकि उसके पास सिर्फ इकतीस बेड़े ही हैं और वे भी पुराने विमानों के। हालांकि पिछले एक दशक में मिग विमानों को बायसन मानकों के अनुरूप उन्नत बनाने का काम तो हुआ है और इनमें राडार, दिशासूचक प्रणाली आदि को बेहतर किया गया है। लेकिन पुराने विमानों को अद्यतन करने भर से विमान सुरक्षित हो जाएंगे, इसकी क्या गारंटी है? रक्षा विशेषज्ञ भी मिग विमानों को उन्नत बना कर काम में लेने पर इसलिए चिंता जताते रहे हैं कि विमानों की भी एक उम्र होती है और उसके बाद वे काम लायक नहीं रह जाते हैं। ऐसे में वायुसेनाध्यक्ष का यह कहना कि इतनी पुरानी तो कोई कार भी नहीं चलाता है जितने पुराने हम विमान उड़ा रहे हैं, क्या गलत है!

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