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राजनीतिः भाषागत भेदभाव का संकट

प्रश्न यह है कि जब आधे से अधिक लोग हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं, विभिन्न परीक्षाओं में भी इसी माध्यम से सम्मिलित होते हैं, सिविल सेवा परीक्षा भी इसी माध्यम का चयन करके देते हैं तो उनकी सफलता दर आनुपातिक रूप से इतनी कम क्यों है?

सिविल सेवा परीक्षा में 2010 तक क्षेत्रीय भाषाओं के लिए परिस्थितियां आज से बहुत अलग और बेहतर थीं। फिर 2011 में इसके प्रारूप में थोड़े से बदलाव किए गए और सीसैट (सिविल सविर्सेज एप्टिट्यूड टेस्ट) की शुरुआत की गई। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

अनुराग सिंह

हाल में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के परिणाम घोषित हुए हैं। यह देश की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित मानी जाने वाली परीक्षा है जो प्रशासनिक अधिकारियों का चयन करती है। इस परीक्षा को पास कर लेना आज भी ज्यादातर युवाओं का सपना है। आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों से पढ़े युवा, मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को छोड़ कर आइएएस बनने का सपना पाले इसके पीछे भाग रहे हैं। लेकिन क्या यह सपना देखने वाला भारत का प्रत्येक युवा एक समान धरातल पर खड़ा है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए जो उत्तर हमें मिलता है, वह बेहद गंभीर है। इस पर एक बार फिर से विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। भारत में आधी से अधिक आबादी हिंदी का प्राथमिक भाषा के रूप में उपयोग करती है। इसके बाद द्वितीयक भाषा के रूप में क्षेत्रीय भाषाओं या अंग्रेजी का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न यह है कि जब आधे से अधिक लोग हिंदी को अपनी प्राथमिक भाषा के रूप में प्रयोग में लाते हैं, विभिन्न परीक्षाओं में भी इसी माध्यम से सम्मिलित होते हैं, सिविल सेवा परीक्षा भी इसी माध्यम का चयन करके देते हैं तो उनकी सफलता दर आनुपातिक रूप से इतनी कम क्यों है? इस बार के परिणामों की अगर बात करें तो लगभग तीन-चार प्रतिशत ही ऐसे अभ्यर्थी चुने गए जिन्होंने माध्यम के रूप में हिंदी या किसी क्षेत्रीय भाषा का चयन किया था। क्या यह चयन सवाल पैदा नहीं करता है? क्या यह अंग्रेजी के एकाधिकार को सिद्ध करता हुआ नहीं प्रतीत होता है?

सिविल सेवा परीक्षा में 2010 तक क्षेत्रीय भाषाओं के लिए परिस्थितियां आज से बहुत अलग और बेहतर थीं। फिर 2011 में इसके प्रारूप में थोड़े से बदलाव किए गए और सीसैट (सिविल सविर्सेज एप्टिट्यूड टेस्ट) की शुरुआत की गई। इस प्रारूप में लगभग दस प्रतिशत सवाल अंग्रेजी भाषा के होते थे। इसके बाद लगभग तीस प्रतिशत सवाल अपठित गद्यांश से होते थे। लेकिन इसके साथ दिक्कत यह होती थी कि अंग्रेजी का ऐसा यांत्रिक अनुवाद होता था जो बोझिल होता था, जिससे काफी असुविधा होती थी। एक उदाहरण के तौर पर देखें तो ‘स्टील प्लांट’ को स्टील का पौधा कहा जाने जैसा अनुवाद भी आया। किसी भी तरह की समस्या के लिए अंतिम निर्णय अंग्रेजी वाले पाठ के आधार पर ही किए जाने की बात लिखी होती है। इस प्रकार यहां कुछ गड़बड़ियां प्रारंभ में ही मौजूद थीं, इसीलिए इसके लिए देश भर में आंदोलन भी हुए। इन आंदोलनों की सफलता इस बात में रही कि जो सीसैट पहले वरीयता सूची तैयार करवाता था अब वह मात्र अर्हता तक सीमित रह गया।

लेकिन असल में समस्या यह नहीं है। समस्या तो प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा के साथ शुरू होती है। 2010 से पूर्व लगभग पिछले पच्चीस-तीस वर्षों तक मुख्य परीक्षा में हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों का प्रतिशत लगभग तीस से पैंतीस के बीच होता था, जो साक्षात्कार के बाद अंतिम रूप से चयन में लगभग पंद्रह प्रतिशत के आसपास बैठता था। मुख्य परीक्षा के हिसाब से हिंदी का प्रतिशत अच्छा था, परंतु अंतिम परिणाम में यह ठीक नहीं, लेकिन संतोषप्रद अवश्य था। फिर 2011 से लगातार परीक्षा के प्रारूप में परिवर्तन होते गए। 2011 में सीसैट लाया गया। 2013 में मुख्य परीक्षा में दो वैकल्पिक विषयों का प्रावधान हटा कर एक वैकल्पिक विषय कर दिया गया। लेकिन सामान्य अध्ययन के दो पेपर बढ़ा कर चार कर दिए गए। इन सब परिवर्तनों के बाद लगातार हिंदी के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय माध्यमों के परिणाम निराशाजनक थे। इन माध्यमों से चयनित अभ्यर्थियों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। संविधान की आठवीं अनुसूची के तहत किसी भी भाषा में मुख्य परीक्षा दी जा सकती है, लेकिन वर्तमान समय में लगभग पनच्यानवे प्रतिशत परिणाम अकेले अंग्रेजी भाषा में आ जाना आश्चर्यचकित करने वाला है।

मुख्य परीक्षा में सामान्य अध्ययन के चार परचे समसामयिकता की विशेष मांग करते हुए दिखाई पड़ते हैं, जो बुरा नहीं है। लेकिन एक बेहद ग्रामीण पृष्ठभूमि के अभ्यर्थी के लिए वह अपेक्षाकृत मुश्किल है। लेकिन इसका यह कतई अर्थ नहीं है कि समसामयिकता के जोर को कम कर दिया जाए, वह भी आवश्यक है। आज सिविल सेवा परीक्षा में चयनित अभ्यर्थियों में शहरी पृष्ठभूमि के लोग ज्यादा हैं, ग्रामीण पृष्ठभूमि के कम। लेकिन हमारे देश की जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा है और शहरी क्षेत्रों में कम। इस प्रकार सिविल सेवा में अंग्रेजी के साथ-साथ शहरी वर्ग का भी वर्चस्व बना हुआ है। बचपन से ही अच्छे अंग्रेजी विद्यालयों में पढ़ने वाले व अच्छे हिंदी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों में यहां अंतर होता प्रतीत हो रहा है।

शासन का अर्थ अंग्रेजीदां हो जाना नहीं है। लेकिन दुर्भाग्य से भारत में शासन की भाषा को अंग्रेजी भाषा के तौर पर देखा जाता है। शासन आपको किस पर करना है? जिन लोगों पर आप शासन करने जा रहे हैं, जिनके अधिकारी बन कर आप उनकी सेवा में जा रहे हैं, अगर उन्हीं की भाषा से आएंगे तो इसमें कोई हर्ज नहीं है। लेकिन प्रशासन आज अंग्रेजी भाषा की तरफ झुका हुआ है। अधिकतर शहरी पृष्ठभूमि से आने वाले युवा ही आज प्रशासन संभाल रहे हैं। इसलिए भी प्रशासन में एक संतुलन की आवश्यकता अब महसूस होने लगी है। प्रशासन का वर्तमान चरित्र अभिजात्यवादी है जो लोकतांत्रिक प्रशासनिक ढांचे के अनुकूल नहीं है।

संघ लोक सेवा आयोग की दलील है कि अब हमें और अधिक अच्छे अधिकारियों की आवश्यकता है और समय की मांग है कि इस तरह से पाठ्यक्रम निर्धारित किया जाए ताकि ज्यादा अच्छे लोग देश को मिल सकें। लेकिन इस ज्यादा अच्छे की परिभाषा ऐसी क्यों बनाई गई जिसमें अंग्रेजी के लोग ही उपयुक्त साबित हों? क्या हिंदी माध्यम से पढ़ने-लिखने वाले मात्र दो प्रतिशत लोग रह गए हैं जो यूपीएससी की योग्यता पर खरे उतर रहे हैं? या यह भाषाई भेदभाव है? किसी भाषाई माध्यम को लेकर परिणाम जिस तरह से गिरे हैं उससे तो यही लग रहा है कि बात यहां क्षमता की नहीं, अपितु भाषाई भेदभाव की है। क्या हिंदी माध्यम का कोई भी अभ्यर्थी इतना अच्छा नहीं था कि उसे शुरू के सौ उम्मीदवारों में जगह मिल सके? सौ या दो सौ को छोड़िए, हिंदी माध्यम से परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी की पहली रैंक सामान्य रैंक में तीन सौ उनतालीसवीं है और अगर लोग इस पर सोचने को मजबूर नहीं होते हैं तो यह बेहद दुखद है क्योंकि प्रतिभाएं भाषा की मोहताज नहीं होती हैं। लेकिन यहां भाषा की मोहताज हैं ऐसा साफ-साफ प्रतीत हो रहा है।

भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की खूबी यह होती है कि हर क्षेत्र में देश की समूची जनता का लिंग, क्षेत्र व भाषा के आधार पर प्रतिनिधित्व सानुपातिकता में होना चाहिए। परंतु इस स्थिति में यहां पर ऐसा होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। यह निश्चित तौर पर एक उचित स्थिति नहीं है। यह एक जटिल समस्या है और इसका समाधान खोजे जाने की आवश्यकता है। वर्तमान प्रारूप में निश्चित तौर पर हर अभ्यर्थी दौड़ने के लिए तैयार तो है, लक्ष्य भी सबके एक समान ही हैं, लेकिन दौड़ शुरू होने से पूर्व सबको एक निश्चित रेखा पर खड़ा होना चाहिए था। लेकिन कुछ लोग बहुत आगे खड़े हैं तो कुछ बहुत पीछे। इस स्थिति पर सरकार व संघ लोक सेवा आयोग को साथ मिलकर विचार करना चाहिए और एक संतुलित निष्कर्ष तक पहुंचना चाहिए। जब इस परीक्षा को पास करने वाले लोगों में देश के सभी क्षेत्रों, भाषाओं व लिंग के लोगों का समावेश होगा, तभी यह सबके हित में होगा।

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